मृदु करतल की कोमलता तो, केवल एक कहानी है,
खुरदुरी गादी ही निज, घर-आँगन की कल्याणी है।
त्याग-तपस्या कर्म-योग की, यह अनुपम सौगात यहाँ,
धन्य-हथेली के चंदन से, महके हर दिन-रात यहाँ।।
कंचन-गादी वाली नारी, महलों की बस शान रही,
श्रम-विहीन वह कोमल काया, मूरत-सी निष्प्राण रही।
जिसने चूल्हा-चौका फूँका, निशदिन पीसा अन्न यहाँ,
उस गृहणी के पुरुषार्थ की, गाथा अति बलवान रही।।
चाम हुआ है कड़ा भले ही, पर अंतस वरदानी है... (1)
खुरदुरी गादी ही निज, घर-आँगन की कल्याणी है,
मृदु करतल की कोमलता तो, केवल एक कहानी है।
मार्जनी-मंथन, जल की गागर, निशदिन का उत्सर्ग जहाँ,
स्वेद-कणों से सिंचित आँगन, तीरथ-सा संसर्ग जहाँ।
तवे की आँच ने झुलसा डाला, जिन उँगलियों के पोरों को,
उन्हीं करों की एक छुअन में, बसता सुख का स्वर्ग यहाँ।।
बाँट रही जो सच्चा नेह, वह ममता की ही खानी है... (2)
खुरदुरी गादी ही निज, घर-आँगन की कल्याणी है,
मृदु करतल की कोमलता तो, केवल एक कहानी है।
कोरी चिकनाई पर रीझे, ऐसा ओछा बोध नहीं,
यह तो लक्ष्मी रूपा देवी, इस पर कोई क्रोध नहीं।
इसके त्यागमयी अंचल का, जग में कोई जोड़ नहीं,
शीश झुकाकर करो वंदना, इसमें कोई निरोध नहीं।।
जग को जो है पाल रही, वह त्याग की अमिट निशानी है... (3)
खुरदुरी गादी ही निज, घर-आँगन की कल्याणी है,
मृदु करतल की कोमलता तो, केवल एक कहानी है।

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