Sunday, 5 April 2026

एकांकीः चेकमेट

प्रतीकात्मक चित्र


पात्र परिचय:

अविनाश (क़रीब 29-30 वर्ष)।

(शिक्षित, बेरोज़गार लेकिन महत्वाकांक्षी। वह इंस्टाग्राम और रीयल्स की दुनिया से प्रभावित है और एक उत्तम जीवन चाहता है।)

 बाबूजी (58 वर्ष): अविनाश के पिता।

(पुराने ख़्यालात के, जो मानते हैं कि शादी के बाद सब ठीक हो जाता है।)

माँ (52 वर्ष): अविनाश की माता।

(ममतामयी, लेकिन पोता-पोती के सुख के लिए सदैव चिंतित रहने वाली।)

पप्पू (25 वर्ष): अविनाश का दोस्त।

(वह जुगाड़ और छोटी-मोटी नौकरी करके ख़ुश रहने का नाटक करता रहता है।)

पंडित जी

महदेले साहबः कन्या के पिता

डॉक्टर

दृश्यः एक

(शहर किनारे एक चाय की दुकान। बेंच टूटी हुई है। उस पर बैठा अविनाश चाय और सिगरेट पी रहा है। अविनाश हाथ में अपनी फ़ाइल दबाए बैठा है, जिसमें उसकी डिग्रियाँ हैं। पप्पू एक वीडियो व्लॉग बनाने की कोशिश कर रहा है।)

पप्पू: (फोन के कैमरे में देखते हुए) हेल्लो फ़्रेंड्स! वेलकम बैक टू माय चैनल। आज हम बात करेंगे सक्सेस की। देखिए मेरे दोस्त अविनाश को, जो आज फिर एक इंटरव्यू से हारकर... मेरा मतलब है, सीखकर आए हैं।

अविनाश: (झुँझलाकर) बंद कर यह तमाशा यार पप्पू! तुझे शर्म नहीं आती? शहर में लोग बेरोज़गार घूम रहे हैं और तू व्यूज के लिए मेरी ग़रीबी का तमाशा बना रहा है।

पप्पू: (कैमरा बंद करते हुए) शर्म? भाई, शर्म तो तब आती जब जेब में पैसे होते। जब पेट ख़ाली हो और जेब फटी हो, तो सिर्फ़ अटेंशन ही है जो हमें ज़िन्दा रखती है। इससे डोपामाइन मिलता है.. डोपामाइन। तू इन काग़ज़ों (फ़ाइल की ओर इशारा करते हुए) को छाती से लगाए बैठा है, इनसे तुझे क्या मिला? कम-से-कम मैं रील्स बनाकर तुझसे ज़्यादा पैसे तो कमा लेता हूँ।

(पप्पू चाय वाले को पैसा देते हुए) भइया, एक सिगरेट मुझे भी दे दो। और हाँ, ये अविनाश भाई का पैसा भी इसी से काट लेना। डिग्रीधारी बेरोज़गार है मेरा दोस्त।

अविनाश: (अपनी फ़ाइल की ओर इशारा करते हुए) ये काग़ज़ नहीं हैं पप्पू भाई, मेरी पंद्रह-सोलह सालों की मेहनत है। रात-रात भर जागकर पढ़ा था कि एक दिन बड़ा आदमी बनूँगा। छोटे शहर का लड़का जब घर से बाहर कमाने के लिए निकलता है न, तो पूरे खानदान की उम्मीदें उसके कंधे पर होती हैं। पर यहाँ क्या है? एक ढंग की नौकरी नहीं मिल रही है। मिलेगी भी तो सेल्स की नौकरी, दस हज़ार की सैलरी और दस घंटे की ग़ुलामी! इसमें मैं अपना पेट पालूँ या पैसे जोड़ूँगा।

पप्पूः अबे तुझे नौकरी मिल गयी क्या जो जोड़ने की बात सोचने लगा? बेरोज़गार ही है बेटा अभी तू। भाई, तू बहुत ज़्यादा सोचता है। देख, ग्लोबलाइजेशन ने हमें एक चीज़ तो दे दी- सपना। हम देखते हैं दुबई के बुर्ज़ ख़लीफ़ा को और रहते हैं इस सीलन भरे तंग शहर में। हमारी समस्या यह नहीं है कि हमारे पास पैसा नहीं है, हमारी समस्या यह है कि हमें अमीर दिखना है। तू शादी क्यों नहीं करना चाहता? क्योंकि तुझे डर है कि तू उसे आईफ़ोन नहीं दिला पाएगा, उसे स्टारबक्स की कॉफ़ी नहीं पिला पाएगा।

अविनाश: (चिल्लाकर) तो क्या ग़लत है इसमें? क्या मैं अपनी पत्नी को वह जीवन दूँ जो मेरी माँ ने जिया? साड़ी फट जाती थी तो उस पर पैच लगाकर पहनती थीं मेरी माँ। साल में एक बार मेला देखने जाते थे, वही हमारा वेकेशन था। नहीं पप्पू, मैं वह निम्न-मध्यमवर्गीय नरक आगे नहीं देखना चाहता। आख़िर फिर मेरी पढ़ाई-लिखाई का क्या मतलब होगा? अगर मैं अपने माँ-बाप और पत्नी को एक औसत बढ़िया जीवन नहीं दे सकता हूँ तो फिर मुझे हक़ नहीं है किसी की ज़िदगी बर्बाद करने का। पत्नी लाने और शादी करने का कोई मतलब नहीं जान पड़ता मुझे।

पप्पू: (गंभीर होकर) पर भाई, इस क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ के चक्कर में तू लाइफ़ को ही मिस कर रहा है। देख, कल को जब हम साठ साल के होंगे, तो हमारे पास बैंक बैलेंस तो शायद हो, पर पानी पिलाने वाला कोई नहीं होगा अविनाश। क्या तुझे डर नहीं लगता कि हमारा समाज एक ऐसे बूढ़ों के द्वीप में बदल जाएगा जहाँ कोई बच्चा नहीं रोएगा? तेरे जैसे लोग शादी से ही मुँह तोड़ने लग जाएँ तो फिर ये दिन दूर भी नहीं बेटा।

अविनाश: पर तू ये भी तो जानता है कि बेरोज़गारी के चलते मेरे जैसे लाखों लड़के इसी उधेड़बुन में कुँवारे बैठे हैं। लड़कियों के बाप को सरकारी दामाद चाहिए या बिजनेसमैन। हम जैसे स्किल्ड बेरोज़गार कहाँ जाएँ? हम न घर के रहे, न घाट के। हमारी शादियाँ नहीं हो रहीं, यह सिर्फ हमारी निजी समस्या नहीं है, यह इस मुल्क का भविष्य है जो धीरे-धीरे बाँझ हो रहा है।

पप्पू: देखो अविनाश, मैं तुम्हारा द्वंद्व...

अविनाश: (बात काटकर) मेरा द्वंद्व जाएज़ है भाई। मैं शादी करूँ तो समाज मुझे ज़िम्मेदार कहेगा, लेकिन मेरा भविष्य मुझे ग़ुनाहगार... अगर बच्चा हुआ और मैं उसे अच्छी शिक्षा न दे सका, तो वह मेरा गला पकड़ेगा। वह मुझसे पूछेगा- जब ख़ुद के ठिकाने नहीं थे, तो मुझे इस नरक में क्यों लाए? मेरे पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं रहेगा पप्पू भाई।

(पप्पू अपना मोबाइल निकालकर उसका वीडियो बनाने लगता है।)

पप्पू: वाह.. क्या बोलता है यार तू। भाई तू ऐसी ही बड़ी-बड़ी बातें किया कर- मैं शादी करूँ तो समाज मुझे ज़िम्मेदार कहेगा, लेकिन मेरा भविष्य मुझे ग़ुनाहगार...। वाह... छा जाएगा भाई, क्या बोलता है बे तू अविनाश। मैं तेरा वीडियो अपने चैनल में डालूँगा। ज़बरदस्त व्यूज़ आएँगे यार... छा जाएगा-छा जाएगा।

अविनाशः (पप्पू से उसका मोबाइल छीनकर) भाई मज़ाक चल रहा है क्या यार... तू मेरी बातों को गंभीरता से ही नहीं ले रहा है। पप्पू भाई समझ, हम वह पीढ़ी हैं जो मानव इतिहास में सबसे ज़्यादा शिक्षित है और सबसे ज़्यादा डरी हुई भी। हम डिज़िटल वर्ल्ड के राजा तो हैं, लेकिन रियल वर्ल्ड के भिखारी।

पप्पूः हुँह... (पप्पू मुँह बनाकर चला जाता है।)

पटाक्षेप

दृश्य-दो

[अविनाश के घर के बैठक (ड्राइंग रूम) का दृश्य। सुबह का समय। मंच पर मध्यवर्गीय घर का सेटअप है। बाबूजी चाय पीते-पीते अख़बार पढ़ रहे हैं, माँ धूप-दीप जलाकर पूजा-पाठ कर रही हैं। अविनाश सोफ़े पर बैठकर अपने मोबाइल में मग्न है। बीच-बीच चाय की चुस्कियाँ भी ले रहा है। कमरे के एक कोने में पेंट उखड़ी हुई है, जिसे एक महँगे कैलेंडर से ढका गया है। कुछ और ऐसी विसंगतियाँ जो मध्यम वर्ग की स्थिति को दिखाती हैं।]

बाबूजी: (अख़बार से सिर उठाकर) अरे अविनाश! पंडित जी का फोन आया था। वो कह रहे थे कि जंघेल साहब अपनी बिटिया के लिए रिश्ता लेकर आ रहे हैं आज। बता रहे थे कि बिटिया होनहार है। सागर विश्वविद्यालय से बीए है। लड़का-लड़की एक बार एक-दूसरे को देख लें, तो कह रहे थे कि बात तेज़ी से आगे बढ़वा देंगे।

अविनाश: (बिना मोबाइल से नज़र हटाए) बाबूजी, कौन से जंघेल साहब? वही, जिनकी बेटी अभी बीएड कर रही है?

बाबूजी: अरे सागर विश्वविद्यालय से पढ़ी है।

 अविनाश: (बात काटकर) देखिए, मुझे अभी ये सब नहीं करना बाबूजी।

माँ: (पूजा से उठकर आरती लाते हुए) क्यों नहीं करना रे? तीस का होने को आया है। नरवरिया जी का बेटा तो अब बाप भी बन गया। तू कब तक इस अँगूठे से बस केवल अपनी मोबाइल का स्क्रीन घिसकाता रहेगा?

अविनाश: मोबाइल में केवल रील्स नहीं देखता रहता हूँ मैं। इधर-उधर कहीं नौकरी की भी तलाश किया करता हूँ माँ। आप समझती क्यों नहीं?

माँ: (अविनाश के हाथ से मोबाइल छीनकर टेबल में रखकर उसकी हथेली में प्रसाद देते हुए) अरे, तो क्या हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा? उम्र निकल रही है तेरी। कल को हम नहीं रहेंगे, तो इस सूने घर में दीवारों से बातें करेगा? घर में चहचहाहट होनी चाहिए, रौनक होनी चाहिए अविनाश बेटा।

अविनाश: भूखे पेट रौनक नहीं, सिर्फ़ विलाप होता है माँ। ये भी तो देखिए कि महँगाई कहाँ जा रही है। अभी पेट्रोल 100 के पार है, आटा 40 रुपये किलो। ढंग का लो तो 45 रुपये से एक कौड़ी भी कम नहीं। मेरे पास ख़ुद के खर्चे के लिए पैसे नहीं हैं, किसी और की ज़िम्मेदारी कैसे उठा पाउँगा भला?

बाबूजी: हम भी तो पाल रहे हैं न तुझे? हमने क्या भूखे मरने दिया है तुझे कभी? अरे संघर्ष ही तो जीवन है बेटा।

अविनाश: (तल्खी से) बाबूजी, आपका ज़माना अलग था। तब दाल-रोटी में जीवन कट जाता था। सच तो ये है कि इतना ही नसीब हो जाए, तब लोगों का संघर्ष ही केवल इसीलिए था। क्योंकि तब इतना भी कहाँ किसी को मयस्सर था। अब ज़माना बदल गया है बाबूजी। आज दाल-रोटी का संघर्ष नहीं बचा। चुनौतियाँ इससे आगे की हैं। शादी और बच्चे हो गए होते मेरे तो आज मुझे अपने बच्चों को इंगलिश मीडियम स्कूल में पढ़ाना था। वो भी ढंग के... इंटरनेशनल स्कूल टाइप में भेजता। क्योंकि अब अँग्रेज़ी आएगी, तभी कायदे की नौकरी भी है, नहीं तो फिर मास्टर बनकर ही ख़ुश रहे इंसान। अरे भाई मास्टर भी कितने आदमी बनेंगे? मास्टर के अलावा..? उसके आगे कहीं भी अच्छी जगह उठना-बैठना भी है न, तो अंग्रेज़ी आना बड़ा ज़रूरी है बाबू जी। इसीलिए ज़रूरी है कि बच्चों को अच्छे अंग्रेज़ी मीडियम में पढ़ाना पड़ेगा। कैसे पढ़ा सकूँगा? कैसे दूँगा बेहतर जीवन अपनी पत्नी को?

इतना ही नहीं, उन्हें वेकेशन पर भी ले जाना है। यानी छुट्टियों पर कहीं घुमाने। क्योंकि जब तक घूमेंगे-फिरेंगे नहीं, देश-दुनिया नहीं देखेंगे तब तक उनमें इस दुनिया को झेलने की समझ नहीं आ पाएगी। मैं उन्हें अब वैसा जीवन नहीं दे सकता, जो हम लोग जी रहे हैं या जीकर आए हैं। बाहर निकलो तो समझ में आता है कि जीवन जीने का औसत स्तर क्या है। मुझे लगता है कि हम अभी उस औसत स्तर पर नहीं है बाबू जी। सच जानने और फिर उसे मानने में भी भलाई है हमारी। इसलिए पहले मेहनत करके कहीं नौकरी का प्रबंध हो जाए, फिर देखेंगे शादी-वादी। नहीं तो औलाद लाकर यहाँ दुनिया में उसे धकेल देना कोई बड़ी समझदारी की बात नहीं है।

(तभी पप्पू का प्रवेश होता है। वह एक अजीब सी चमकीली शर्ट पहने हुए है।)

पप्पू: अरे चाचा, प्रणाम! अविनाश भाई, चलो बाहर चलते हैं। सुना है शहर के नए कैफ़े में ब्लू लैगूनमॉकटेल मिलता है। इंस्टा पे फोटो डालेंगे, आग लग जाएगी! (अविनाश के कंधे से कंधा टकराकर दबी ज़बान से) स्नैप-चैट पर भी तो डालेंगे न...

बाबूजी: (चिढ़कर) हाँ, बस तुम दोनों यही करो। आग लगा दो अपनी जिंदगी में! नौकरी का ठिकाना नहीं और पीना है मॉकटेल, वो कौन सा.. बैगन...।

पप्पू: ब्लू लैगून चाचा।

बाबूजी: हाँ-हाँ जो भी है लैगून-फैगून, दुनिया का तोहफ़ा।

पप्पू: (अपनी जेब से आईना निकालकर उसमें देखते हुए अपने बालों और दाढ़ी में उँगलियाँ फेरते हुए) चाचा, टेंशन मत लो। नौकरी नहीं तो क्या, अपनी पर्सनालिटी तो है न!

बाबूजी: पप्पू, तुझे डर नहीं लगता? तेरी भी नौकरी पक्की नहीं है, तूने भी शादी नहीं की। तू सारा दिन ये तमाशा कैसे कर लेता है?

पप्पू: (हँसते हुए) डर? चाचा, डर तो तब लगेगा जब मैं सच देखूँगा। मैंने सच देखना छोड़ दिया है। मैं फ़िल्टर्स में जीता हूँ। दुनिया को लगता है मैं ख़ुश हूँ, मुझे लगता है दुनिया ख़ुश है। बस, जब मैं और दुनिया सभी ख़ुश हैं तो फिर टेंशन किधर है। किधर है टेंशन हाँ.. किधर है.. किधर है... (पप्पू इधर-उधर टेंशन को खोजने की नौटंकी करता है।)

बाबूजी: शादी?

पप्पूः शादी? चाचा, शादी के लिए साहस चाहिए, साहस।

बाबू जीः हाँ, और तुम युवाओं का साहस तुम्हारे डाटा पैक के ख़त्म होते ही ख़त्म हो जाता है आजकल।

पप्पूः सही पकड़े हैं.. (अविनाश पप्पू को एक तमाचा जड़ देता है और वह गोल-गोल घूम जाता है।)

(लड़की वालों का आगमन)

(पंडित जी और कन्या के पिता का आगमन होता है। बाबूजी उन्हें बैठाते हैं। चाय और समोसे आते हैं। अविनाश बेमन से बैठा है।)

कन्या के पिता: देखिए महदेले साहब, हमें तो लड़का पसंद है। कुछ पंडित जी ने बता ही रखा था। बाकी का बचा हमने सामने से देखकर मानों पक्का कर दिया। बस, एक छोटी सी बात हम यह जानना चाहते है कि लड़का आगे का क्या प्लान रखता है?

अविनाश: (शांति से) मेरा प्लान? अंकल, मेरा प्लान है फ़िनांशियल फ़्रीडम।

कन्या के पिताः मतलब।

अविनाशः मतलब साफ़ है कि मैं तब तक शादी नहीं करना चाहता, जब तक कि मेरा बैंक बैलेंस सात अंकों में न हो और मेरे पास कम-से-कम एक प्रीमियम एसयूवी न हो।

पंडित जी: (हँसकर) बेटा, गाड़ी तो आती-जाती रहती है। घर बस जाए तो लक्ष्मी अपने आप आती है।

अविनाश: पंडित जी, लक्ष्मी जी क्रेडिट कार्ड के बिल नहीं भरतीं। आज की तारीख़ में एक बच्चे की डिलीवरी का ख़र्चा एक लाख आता है। अगर मैं बेरोज़गार रहा, तो क्या मेरी पत्नी और बच्चे भी ग़रीबी का शिकार नहीं होंगे?

बाबूजी: (गुस्से को दबाते हुए) चुप कर अविनाश! (कन्या के पिता से उम्मीद के साथ) महदेले साहब, इम्तिहान की तैयारी कर रहा है हमारा बेटा। बड़े पद की तैयारी है। बस समझो होने ही वाला है।

अविनाश: (बीच में टोकते हुए) कुछ नहीं होने वाला है, अंकल। सच तो ये है कि मैं एक एजुकेटेड अनएम्प्लॉयड हूँ यानी पढ़ा-लिखा बेरोज़गार। क्या ही करें हम। हमारी ज़िन्दगी प्रयोगशाला जो बन चुकी है सरकारों के लिए। पहले नौकरी का फॉर्म निकलता है। फिर परीक्षा होती है, पेपर लीक हो जाता है। इसके बाद वो भर्ती कोर्ट में चली जाती है। सालों बाद फिर से परीक्षा होती है। कोर्ट केस में है, तो उस पर फैसला आता है कि परीक्षा निरस्त है। फिर से फॉर्म भरने होंगे। फिर से यही चक्रण चलता है। कुछ ऐसा ही जीवन है हमारा। इसीलिए सच यही है कि कम-से-कम मुझे शादी करने में डर लगता है।

पंडित जी: अरे बेटा, डर कैसा? भगवान सबको दाना-पानी देता है।

अविनाश: (आवेश में) कौन से भगवान पंडित जी? वो जो प्राइवेट अस्पतालों के बाहर बिल न भर पाने के कारण मरते लोगों को देखते हैं? या वो जो महँगाई के कारण आत्महत्या करते किसानों को देखते हैं? महदेले अंकल, आप अपनी बेटी मुझे देंगे? मान लीजिए कल को उसे कोई बीमारी हो जाए और मेरे पास अस्पताल का बिल भरने के पैसे न हों, तब क्या आपकी बेटी मेरा महज मेरा प्यार खाकर ठीक हो जाएगी?

कन्या के पिता: (हैरान होकर) तुम तो बहुत ही नेगेटिव बातें कर रहे हो।

अविनाश: नहीं अंकल, मैं प्रैक्टिकल बातें कर रहा हूँ। हम आज की पीढ़ी के युवाओं का दर्द आप लोग नहीं समझ सकते हैं। हमारा जीवन ही एक प्रयोगशाला बन गया है। एक हमे छोड़कर जिससे सारी दुनिया प्रयोग कर रही है।  अब देखिए न, ग्लोबलाइजेशन ने हमें सपने दिखाए न्यूयॉर्क सिटी के और औकात दी साला टियर-थ्री सिटी के किराएदारों वाली। लिहाज़ा, हे अभिभावकों! हाथ जोड़ता हूँ। मैं अपनी आने वाली पीढ़ी के साथ गद्दारी नहीं कर सकता। उन्हें मैं ग़रीबी को विरासत में नहीं देना चाहता।

बाबू जीः (आगबबूला होकर) अविनाश!!!

अविनाश: चिल्लाने से कुछ नहीं होगा बाबूजी, आज साफ़ बात होगी। (मेहमानों से) आप अपनी बेटी की शादी मुझसे कर देंगे, लेकिन क्या आप चाहेंगे कि वह अगले 10 साल तक पुराने कपड़े पहने और बस के धक्के खाए? नहीं न? तो फिर क्यों एक बेरोज़गार के गले में फाँस डाल रहे हैं?

कन्या के पिताः (अपनी जगह पर तेज़ी से खड़े होकर पहले अविनाश और फिर बाद में अविनाश के पिता की ओर ग़ुस्से में देखते हैं।) देख रहे हैं आप। मेरी बेटी गले का फाँस है।

पंडित जीः (अविनाश के पिता से) आपका बेटा बहुत आगे की सोचता है यजमान। ये शादी नहीं करेगा किसी से। संभालो भाई इसे...

(कन्या का पिता तेज़ी से घर से बाहर जाने लगता है। पंडित जी उसके पीछे-पीछे अपनी पोथी उठाकर दौड़ते हैं।)

पंडित जीः अर्रे ठहरिए महदेले साहब....

(मेहमान अपमानित महसूस कर चले जाते हैं। मंच पर सन्नाटा छा जाता है।)

(मेहमानों के जाने के बाद अविनाश की माँ और उसके पिता भी वहाँ से उठकर चले जाते हैं। अविनाश चिंता और द्वंद्व से घिर जाता है। बेसुध होकर वह कमरे में पड़ी कुर्सी पर पसर जाता है। बैठे-बैठे शाम ढलने को होती है।)

अविनाशः (स्वगत) लोग कहते हैं शादी कर लो, वंश बढ़ाओ। (गुस्से में दर्शकों की ओर बढ़ते हुए) कौन सा वंश? बेरोज़गारों की एक नई फ़ौज? तंगहाली में सिसकते हुए बचपन? मैंने देखा है कि एक ढंग का स्कूल, एक ढंग का इलाज और एक ढंग की छत के लिए इंसान को अपनी रीढ़ की हड्डी बेचनी पड़ती है। मैंने फैसला किया कि मैं यह सौदा नहीं करूँगा। यह मेरा नहीं, बल्कि हक़ीक़त बयाँ है।

(द्वंद्व में) अगर शादी कर लूँ, तो समाज ख़ुश, माँ ख़ुश। पिताजी भी ख़ुश। लेकिन मेरा क्या? मेरा आने वाला बच्चा एक तंगहाली की ज़िंदगी जिएगा और बीवी भी। लेकिन अगर नहीं की, तो फिर क्या ही बीवी और क्या ही बच्चा। मैं तो अकेला रह जाऊँगा। ओह्ह नहीं। उफ़्फ़... यह कैसा चक्रव्यूह है?

जापान और चीन जैसे देशों में भी आज जनसंख्या गिर रही है क्योंकि युवाओं को उनका भविष्य डरावना लग रहा है। क्या मेरा शहर भी वही बन जाएगा? क्या हम धीरे-धीरे एक ऐसी सभ्यता बन रहे हैं जो केवल क्वालिटी ऑफ़ लाइफ़ के पीछे भागते-भागते ख़ुद को ही ख़त्म कर लेगी? नहीं-नहीं... ये आधा सच है।

(दर्शक दीर्घा की ओर आगे बढ़कर दर्शकों से) आप सब देख रहे हैं? मेरी उम्र के लाखों नौजवान छोटे शहरों और क़स्बों की गलियों में यही गणित लगा रहे हैं। हम शादी नहीं कर रहे क्योंकि हमें डर है। पर शायद हम यह भूल रहे हैं कि एक वक़्त बुढ़ापा का भी आएगा। तब कोई हाथ नहीं होगा, जो गिरते हुए बूढ़े बाप को थाम सकेगा।

(अविनाश थककर बैठ जाता है) मगर हम करें तो करे क्या। इस बात से कैसे मुँह मोड़ें कि महँगाई हमारी जेब काटती ही जा रही है, बेरोज़गारी हमारे सपने हमसे छीनती जा रही है। यही कारण है कि एक बेहतर जीवन पाने का जो हमारे भीतर डर है, उसने हमारी जड़ें ही काट दी हैं। शायद हम वह आख़िरी पीढ़ी हैं जो अपने पूर्वजों का तर्पण करेगी, क्योंकि हमारे बाद... (लंबा मौन)... हमारे बाद कोई नहीं होगा।

पटाक्षेप

दृश्यः तीन

(अचानक माँ के चिल्लाने की आवाज़ आती है। दूसरे कमरे से अविनाश दौड़कर आता है। बाबूजी सीने पर हाथ रखकर फर्श पर गिरे हैं।)

अविनाश: बाबूजी! बाबूजी!! क्या हुआ?

(माँ एक हाथ के सहारे अपनी गोद में अनिवाश के पिता को थामे है और दूसरे हाथ से अविनाश का शर्ट पकड़कर घसीट रही है।)

माँ: (रोते हुए) इन्हें दिल का दौरा पड़ा है! तेरी बातों ने इनका कलेजा छलनी कर दिया। बगल वाले डॉक्टर अंकल को फोन करके बुला ले...

(माँ बिलखकर रोने लगती है। अविनाश डॉक्टर को फोन करके बुलाता है।)

अविनाशः (किंकर्तव्यविमूढ़ होकर) नमस्ते अंकल। बाबूजी को हार्टअटैक... घर पर... ...जी।

(अविनाश रोते हुए घुटने के बल बैठ जाता है और अपनी बिलखती माँ से लिपटकर उन्हें चुप कराता है। अविनाश अपने पिता के सीने पर हाथ रगड़ता है गोया वह इससे ठीक हो जाएँगे। थोड़ी ही देर में डॉक्टर का प्रवेश होता है।)

अविनाश: (डॉक्टर को देखते ही) डॉक्टर साहब! बाबूजी ठीक तो हो जाएंगे न? उन्हें बस एक छोटा सा दौरा पड़ा है... वो... वो शायद किसी चीज़ से घबरा गए होंगे।

डॉक्टरः घबराओ नहीं, हिम्मत से काम लीजिए।

माँ: (हाथ जोड़कर) उन्हें बचा लीजिए भइया।

(डॉक्टर बाबूजी का परीक्षण करता है।)

डॉक्टर: आई एम सॉरी। बहुत बड़ा अटैक था। शायद कोई गहरी चिंता खा रही थी उन्हें। ज़रा सा भी वक़्त नहीं था उनके पास। अब वो नहीं रहे..

(डॉक्टर की बात सुनकर अविनाश और माँ आर्तनाद के साथ रोते हैं।)

डॉक्टर: (अपना चश्मा निकालकर आँख पोछते हुए) ऐसे अटैक्स को दवा से एकाध बार बचाया जा सकता था। लेकिन उनके जीने की इच्छा.. विल पॉवर ही ख़त्म हो चुकी थी। वे अंदर से टूट चुके थे। हार्ट फेलियर तो सिर्फ़ एक बहाना है, उनकी असली मौत निराशा से हुई है।

माँ: (रोकर सिसकते हुए गहरी साँस लेकर) मेडिकल साइंस शरीर का इलाज कर सकती है डॉक्टर साहब, आत्मा का नहीं। आप ठीक ही कह रहे हैं।

अविनाशः माँ...

माँ: (एक ठंडी, रूह कंपा देने वाली आवाज़ में) तू सही कह रहा था अविनाश। यह दुनिया रहने लायक नहीं बची। तूने भविष्य बचाया, लेकिन अपना आज खो दिया। तेरे बाबूजी अपना कल तुझमें देख रहे थे, तूने वो कल ही मार दिया। अब किस बात की महँगाई? अब किसका डर? भविष्य की चिंता में तूने वर्तमान को ही मार डाला बेटा। इंसान के पास पैसा हो या न हो, परिवार का सहारा होना चाहिए। अब मैं किसके सहारे जियूँगी?

अविनाश: माँ, मैं बस एक बेहतर भविष्य चाहता था।

माँ: (रोते हुए) यही तो विडंबना है! हमारे पूर्वज मिट्टी के घरों में खुश थे क्योंकि उनके पास भरोसा था। आज तुम्हारे पास बेहतरीन जीवन शैली की चमक है, इंटरनेट है, लेकिन भरोसा शून्य है। तुम लोग उस सभ्यता की ओर बढ़ रहे हो जहाँ इंसान केवल एक उपभोक्ता बनकर रह जाएगा।

अविनाश: (रोते हुए डॉक्टर का साथ पकड़कर) डॉक्टर साहब, महँगाई और बेरोज़गारी ने मुझे कायर बना दिया। क्या इसमें सिस्टम का कोई दोष नहीं। मैं तो मेहनत कर ही रहा था।

डॉक्टर: हाँ अविनाश, सिस्टम का दोष तो है ही, जिसने तुम्हें कायर तो नहीं, लेकिन मशीन ज़रूर बना दिया है। तुम भविष्य के उस डर में जी रहे हो जो अभी आया ही नहीं, और उस चक्कर में तुमने उस वर्तमान का गला घोट दिया जो तुम्हारे सामने खड़ा था। अगर तुम जैसे युवा इसी तरह परफेक्ट लाइफ़ के इंतज़ार में रुक गए, तो समाज का पिरामिड उल्टा हो जाएगा बेटा। बूढ़े ज़्यादा होंगे और उन्हें सहारा देने वाले हाथ कम। यह एक डेमोग्राफ़िक डिज़ास्टर है। अब संभालो अपने आप को और अपनी माँ को। मैं तुम्हारे बाबूजी के अंतिम संस्कार का बंदोबस्त करता हूँ।

(डॉक्टर वहाँ से चला जाता है।)

माँ: (बाबूजी की लाश से चिपककर कमज़ोर आवाज़ में) अविनाश... तेरे बाबूजी चले गए। मेरी दुनिया तो सूनी हो गई रे बेटा। (माँ को हिचकियाँ आती हैं।) काश तूने उनकी बात मान ली होती। वो तो बस अपनी आँखों के सामने तुझे बसता हुआ देखना चाहते थे। मैं भी चाहती थी कि तेरा घर बसे। बच्चे हों। तेरे बाबूजी को डर था कि हमारी नस्ल ख़त्म हो जाएगी... हमारा वंश रुक जाएगा। सब रुक गया..

(एक तेज़ की हिसकी के साथ माँ ने प्राण त्याग दिए।)

(अविनाश चीत्कार के रोता है।)

अविनाश: माँ.....!!!

(मंच की लाइट धीरे-धीरे लाल होती है, जो ख़तरे का संकेत देती है और फिर एकदम से अंधेरा छा जाता है। केवल एक नीली रोशनी अविनाश के चेहरे पर चमकती रहती है, जो एक ठंडे और यंत्रवत भविष्य का प्रतीक है।)

 

अविनाश: (हुए रो-रोकर माँ-माँ पुकारते हुए) (स्वगत) समाज कहता रहा कि शादी करो, जीवन का क्रम आगे बढ़ाओ। मेरा अर्थशास्त्र कहता रहा पैसे कमाओ, पैसा बचाओ, महँगाई से लड़ो। मैं इन दोनों के बीच पिस गया माँ.. मुझे साफ़ कर दो। मैंने सोचा था कि मैं अपने माँ-बाप, बीवी-बच्चों को जीवन का स्वर्ग दूँगा, लेकिन उस स्वर्ग की तलाश में मैंने अपना घर ही श्मशान बना लिया।

(अविनाश फफककर रोता है।)

अगर मैं शादी करता, तो शायद मेरे पास ग़रीबी होती। लेकिन शादी न करके मुझे मिला यह घनघोर सन्नाटा...

(अविनाश रोते हुए अपने घुटनों पर गिर जाता है।)

(अब मंच पर घुप्प अंधेरा छा जाता है। दीवार के दो कोनों में दो जलते हुए दीपक दिखाई देते हैं, जो अविनाश के माँ-बाप के प्रतीक हैं। घुटनों पर बैठे अविनाश के ऊपर बैगनी रंग का प्रकाश छाया है।)

पार्श्व स्वरः महँगाई और बेरोज़गारी केवल आर्थिक समस्या नहीं हैं। यह एक सामाजिक दीमक हैं जो आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगा रही हैं। आज के नौजवानों की अगर शादी नहीं हुई तो समाज नहीं बचेगा और अगर हुई तो जीवन की गुणवत्ता नहीं बचेगी। इसी द्वंद्व में आज की युवा पीढ़ी बेहाल है, जो उसे भीतर-भीतर ख़त्म कर रही है। सोचिए ज़रा.. ज़िन्दगी के इस चेकमेट का हल किसके पास है?

पटाक्षेप

(पर्दा गिरता है)

(इति)