हमसे
ही बनती है सत्ता, हमसे ही पहचान है,
हम
ही इस माटी का कल हैं, हम ही हिंदुस्तान हैं।
आँखें
खोली हैं हमने, अब न ख़ामोश रहेंगे,
कुर्सी
पर जो बैठे हैं, उनसे हिसाब हम लेंगे।।
रातों
की जो नींद गँवाई, पन्नों पर जो साल ढले,
आशाओं
के बदले आँखों में, आँसू-बम से छाल मिले।
मेहनत
का जब मोल नहीं, तो ये ख़ामोशी टूटेगी,
हक़
की ख़ातिर इन सड़कों पर, अब आवाज़ें गूँजेंगी।।
सपनों
की जो बलि चढ़ाई, उसका जवाब हम लेंगे
कुर्सी
पर जो बैठे हैं, उनसे हिसाब हम लेंगे...
वादों
का अब दौर गया, बस काम का लेखा-जोखा दो,
लोकतंत्र
की इस चौखट पर, सच कहने का मौक़ा दो।
जनता
से ही बनी हुकूमत, जनता ही मुख़्तार है,
सेवा
का जो फ़र्ज़ भूल गए, लानत ऐसी सरकार है।।
संविधान
को कुतर गए जो, इंक़लाब ले लेंगे
कुर्सी
पर जो बैठे हैं, उनसे हिसाब हम लेंगे...
रोके
से न रुकेगी अब ये, सोच नई, ये दौर नया,
अपने
हक़ की ख़ातिर जागा, भारत का हर एक युवा।
हाथों
में ले सत्य का परचम, राह नई बनाएँगे,
झूठी
सत्ता की चौखट में, सच का दीप जलाएँगे।।
संसद
के इस अँधियारे में, आफ़ताब भर देंगे
कुर्सी
पर जो बैठे हैं, उनसे हिसाब हम लेंगे...
