Thursday, 25 June 2026

सुरभि

 


हे सुरभि! तू मनमोहक सुकुमारी,

जग को व्याकुल करने वाली!

 

अवनि के उर से उठ अकुलाती,

तू कौन अगोचर बाला है?

मलय-पवन के कंधों पर चढ़,

किसने मधु-पाश को डाला है?

कलियों के घूँघट से छनकर,

तू मन्द-मन्द मुस्काती है।

सोए पल्लव के कोनों में,

कोई मूक संदेश सुनाती है।

 

नयन मूँदकर भी दिखती तू,

यह कैसा तेरा माया-जाल?

छू जाती अंतस की वीणा,

कर जाती प्राणों को बेहाल।

 

तू तरल तरंगमयी है प्यारी,

चंचलता कस्तूरी की।

तू मौन निमंत्रण देती है,

पर दुःख भी देती दूरी की।

 

किस विरही के उच्छवासों से,

तेरा यह कोमल गात बना?

तू छुअन मात्र से कह जाती,

जो कह न सकी कोई रसना।

शून्य गगन में बिखर-बिखर,

तू ढूँढ़ रही किसका आँचल?

हे री मयी चंचल कलिका!

क्यों मन को कर देती विह्वल?

 

तू गंध-मयी स्पंदनदात्री

स्निग्ध सुघर तरुनाई है,

इस नीरवता के मानस में,

तू शालि बरे पुरवाई है।

कामिनी

 


ये कंचन सी काया ये मखमली बदन,

तुझे पाकर सुलगने लगा है ये मन।

तेरी आँखों में गहरा कोई जाम है,

तेरा हर अंग जैसे लखनवी शाम है।।

 

तेरी जुल्फ़ों से छनती है काली घटा,

तेरी कटि की बलखाती ये क़ातिल अदा।

होठों पर तुम्हारे है शबनम की नमी,

तू जो है सामने तो है फिर क्या कमी?

 

तेरी गर्दन सुराही सी, बाहें हसीं,

तुझे देख के ठहर जाती ज़मीं।

उठन ये उरोजों की इक साज़ है,

तेरी धड़कन में जाने ये क्या राज़ है?

 

संगमरमर सी ठंडक तेरे रूप में ,

सर्दियों में सुहानी नमक धूप में।

तेरे हुस्न की लौ में है जलना मुझे,

तेरी आगोश में है पिघलना मुझे।।

Tuesday, 16 June 2026

बतियाँ मैं कैसे कहूँ...

 

पहली छवि


बतियाँ मैं कैसे कहूँ, कही ही न जाए।

कहत बरे ज्यों ख्याल करत हौं

मनवा बेग बढ़ाए।।

 

का करूँ? पिया जू प्रान हमारी,

प्रान लिहो, मोहि चित से उतारी।

जाको दरस परस दिन राती,

ओहि बिन जिया न जाए...

 

बतियाँ मैं कैसे कहूँ, कही ही न जाए।

कहत बरे ज्यों ख्याल करत हौं

मनवा बेग बढ़ाए।।

 

पल-पल छिन-छिन तन काँपत है,

औषध आवस दर नापत है।

मुकुर मोर चिटकन लाग्यो है,

अँसुअन अमित बहाए...

 

बतियाँ मैं कैसे कहूँ, कही ही न जाए।

कहत बरे ज्यों ख्याल करत हौं

मनवा बेग बढ़ाए।।