| पहली छवि |
बतियाँ मैं कैसे कहूँ, कही ही न जाए।
कहत बरे ज्यों ख्याल करत हौं
मनवा बेग बढ़ाए।।
का करूँ? पिया जू प्रान हमारी,
प्रान लिहो, मोहि चित से उतारी।
जाको दरस परस दिन राती,
ओहि बिन जिया न जाए...
बतियाँ मैं कैसे कहूँ, कही ही न जाए।
कहत बरे ज्यों ख्याल करत हौं
मनवा बेग बढ़ाए।।
पल-पल छिन-छिन तन काँपत है,
औषध आवस दर नापत है।
मुकुर मोर चिटकन लाग्यो है,
अँसुअन अमित बहाए...
बतियाँ मैं कैसे कहूँ, कही ही न जाए।
कहत बरे ज्यों ख्याल करत हौं
मनवा बेग बढ़ाए।।
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