Saturday, 1 August 2026

सत्ता में बदलाव के दिन

 


गाड़ी रोए, जेब भी रोए, रोए आम इंसान रे

कैसा यह सब खेल तुम्हारा, कैसा है विधान रे!

टैक्स-टोल सब पूरा भरके, हम लाचार खड़े हैं

सत्ता में बदलाव के दिन, अब ये आन पड़े हैं!

 

घोल दिया एथेनॉल तेल में, लूटी जेब हमारी

गाड़ी-इंजन तबाह हो गए, रोती जनता सारी!

एपस्टीन फाइलों वाले भी, सिंहासन चढ़े हैं

सत्ता में बदलाव के दिन, अब ये आन पड़े हैं!!

सौ-सौ साल पुराने पुल तो, खड़े हैं सीना ताने

आज हाईवे-पुल ढह जाते, दुनिया सब-कुछ जाने!

गड्ढों वाली सड़कों पर भी, टोल के नियम कड़े हैं

सत्ता में बदलाव के दिन, अब ये आन पड़े हैं!

 

राशन महँगा हुआ इलाज, महँगी हुई पढ़ाई

ख़ून-पसीने की कमाई पर, टैक्स पे टैक्स चढ़ाई!

अपने हक़ की ख़ातिर देखो, दर-दर लोग खड़े हैं,

सत्ता में बदलाव के दिन, अब ये आन पड़े हैं!!

तरसिहौ जार-जार

 


अरे राम! छाती फाटि गई माटी कै, रोवैं नदियाँ धार!

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार!!

 

पाताल फोरि के पानी खींचेव, सीना दीन्हो चीर!

धरती मइया सूखि के काँपैं, आँखिन मा बचा न नीर!!

जस-जस समरसेबल बाजैं, तस-तस कोखिया सूखै!

माटी नीचे धसक गई, अब कहे बरै अस भूखै!!

रे पापी! सुनि-सुनि फाट कपार...

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।

 

पोखर ताला सूखि गए सब, तरसैं ढोर-डँगरवा!

घूँट एक जल बिनु तडपैं, पसु पच्छिन कै जियरवा!!

नलका खोल के मुस्की छेड़ैं, अइसे ढीठ गँवार!

का कइहौ नातिन-पोतन का, जब पूछी सूखी धार!!

रे भैवा! तड़पत जियरा हमार...

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।

 

छत की बरखा रोकौ भइया, घर-घर कुंड खनाओ!

गाँव का पानी गँवहिं रोकौ, दस-दस पेड़ लगाओ!!

बूँद-बूँद जो जोरि लेहो तो, हँसिहैं धरती माई!

अमरित हैं ईं जल की बूँदें, कसम भवाई खाई!!

रे भइया! नहिं मरिहैं संसार...

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।