अरे
राम! छाती फाटि गई माटी कै, रोवैं नदियाँ धार!
जो
पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार!!
पाताल
फोरि के पानी खींचेव, सीना दीन्हो चीर!
धरती
मइया सूखि के काँपैं, आँखिन मा बचा न नीर!!
जस-जस
समरसेबल बाजैं, तस-तस कोखिया सूखै!
माटी
नीचे धसक गई, अब कहे बरै अस भूखै!!
रे
पापी! सुनि-सुनि फाट कपार...
जो
पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।
पोखर
ताला सूखि गए सब, तरसैं ढोर-डँगरवा!
घूँट
एक जल बिनु तडपैं, पसु पच्छिन कै जियरवा!!
नलका
खोल के मुस्की छेड़ैं, अइसे ढीठ गँवार!
का
कइहौ नातिन-पोतन का, जब पूछी सूखी धार!!
रे
भैवा! तड़पत जियरा हमार...
जो
पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।
छत
की बरखा रोकौ भइया, घर-घर कुंड खनाओ!
गाँव
का पानी गँवहिं रोकौ, दस-दस पेड़ लगाओ!!
बूँद-बूँद
जो जोरि लेहो तो, हँसिहैं धरती माई!
अमरित
हैं ईं जल की बूँदें, कसम भवाई खाई!!
रे
भइया! नहिं मरिहैं संसार...
जो
पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।

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