Saturday, 1 August 2026

तरसिहौ जार-जार

 


अरे राम! छाती फाटि गई माटी कै, रोवैं नदियाँ धार!

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार!!

 

पाताल फोरि के पानी खींचेव, सीना दीन्हो चीर!

धरती मइया सूखि के काँपैं, आँखिन मा बचा न नीर!!

जस-जस समरसेबल बाजैं, तस-तस कोखिया सूखै!

माटी नीचे धसक गई, अब कहे बरै अस भूखै!!

रे पापी! सुनि-सुनि फाट कपार...

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।

 

पोखर ताला सूखि गए सब, तरसैं ढोर-डँगरवा!

घूँट एक जल बिनु तडपैं, पसु पच्छिन कै जियरवा!!

नलका खोल के मुस्की छेड़ैं, अइसे ढीठ गँवार!

का कइहौ नातिन-पोतन का, जब पूछी सूखी धार!!

रे भैवा! तड़पत जियरा हमार...

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।

 

छत की बरखा रोकौ भइया, घर-घर कुंड खनाओ!

गाँव का पानी गँवहिं रोकौ, दस-दस पेड़ लगाओ!!

बूँद-बूँद जो जोरि लेहो तो, हँसिहैं धरती माई!

अमरित हैं ईं जल की बूँदें, कसम भवाई खाई!!

रे भइया! नहिं मरिहैं संसार...

जो पानी का ध्यान न धरिहो, तो तरसिहौ जार-जार।

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