हे
सुरभि! तू मनमोहक सुकुमारी,
जग
को व्याकुल करने वाली!
अवनि
के उर से उठ अकुलाती,
तू
कौन अगोचर बाला है?
मलय-पवन
के कंधों पर चढ़,
किसने
मधु-पाश को डाला है?
कलियों
के घूँघट से छनकर,
तू
मन्द-मन्द मुस्काती है।
सोए
पल्लव के कोनों में,
कोई
मूक संदेश सुनाती है।
नयन
मूँदकर भी दिखती तू,
यह
कैसा तेरा माया-जाल?
छू
जाती अंतस की वीणा,
कर
जाती प्राणों को बेहाल।
तू
तरल तरंगमयी है प्यारी,
चंचलता
कस्तूरी की।
तू
मौन निमंत्रण देती है,
पर
दुःख भी देती दूरी की।
किस
विरही के उच्छवासों से,
तेरा
यह कोमल गात बना?
तू
छुअन मात्र से कह जाती,
जो
कह न सकी कोई रसना।
शून्य
गगन में बिखर-बिखर,
तू
ढूँढ़ रही किसका आँचल?
हे
री मयी चंचल कलिका!
क्यों
मन को कर देती विह्वल?
तू
गंध-मयी स्पंदनदात्री
स्निग्ध
सुघर तरुनाई है,
इस
नीरवता के मानस में,
तू
शालि बरे पुरवाई है।

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