ये
कंचन सी काया ये मखमली बदन,
तुझे
पाकर सुलगने लगा है ये मन।
तेरी
आँखों में गहरा कोई जाम है,
तेरा
हर अंग जैसे लखनवी शाम है।।
तेरी
जुल्फ़ों से छनती है काली घटा,
तेरी
कटि की बलखाती ये क़ातिल अदा।
होठों
पर तुम्हारे है शबनम की नमी,
तू
जो है सामने तो है फिर क्या कमी?
तेरी
गर्दन सुराही सी, बाहें हसीं,
तुझे
देख के ठहर जाती ज़मीं।
उठन
ये उरोजों की इक साज़ है,
तेरी
धड़कन में जाने ये क्या राज़ है?
संगमरमर
सी ठंडक तेरे रूप में ,
सर्दियों
में सुहानी नमक धूप में।
तेरे
हुस्न की लौ में है जलना मुझे,
तेरी
आगोश में है पिघलना मुझे।।

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