Wednesday, 6 January 2016

पत्रकारों का इम्तिहान




यूं तो आज के कौशलवादी मानसिकता के दौर में लगभग प्रत्येक क्षेत्र के कॅरियर अथवा कामकाज में ज़ूमिंग अर्थात् दृष्टि-विशेष देखने को मिल रही है। चाहे वो बाल काटने की कला हो, गीत गाने की कला हो, अभिनय हो, कपड़ों को डिज़ाईन करना हो, घर का नक्शा कैसा होगा ये तय करना हो या फ़िर पार्टियों में म्यूज़िक प्लेयर कौन और किस पैमाने पर प्ले करेगा इसका निर्धारण करना हो। अब हर क्षेत्र में विशेषज्ञ की मांग है और इन साब कामों के लिए लोग इन विशेषज्ञों को  भारी से भारी रक़म भी चुकाते हैं। वहीं दूसरी तरफ़ कहीं न कहीं इन सभी कार्यों के बरक्स संप्रेषण, पत्र-व्यवहार या संवाद जैसे गम्भीर और सावधानी पूर्वक किये जाने वाले काम की बात करें, जिसके लिए सरकार ने विशेष विश्वविद्यालय खोले हैं, भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने एक स्वायत्तशाषी भारतीय संस्थान भी स्थापित किया है जिसे पत्रकारिता के मक्का आदि की संज्ञा भी दे दी गई है और यह अपने आप में पत्रकारिता के लिए एशिया का एक अति महत्वपूर्ण संस्थान भी है, इसके अलावा तमाम निजी संस्थान भी कम समय में शीघ्र व अधिक उत्पादन की कला सहित समावेशी ज्ञान और कौशल देकर पत्रकारो को तैयार करता है, फिरी इनकी पूछ नौकरशाही मानसिकता की बदौलत कूड़े के भाव कर दी गई है। एक पत्रकार के भीतर छिपी ढेरों संभावनाओं को दर किनार करते हुए उसके तमाम अधिकारों पर लालफीताशाही का जटिल मकड़जान फैलाकर अतिक्रमण किया गया है। इससे न सिर्फ़ पत्रकारों के अधिकारों का हनन हुआ है बल्कि  देश का विकास रुका है, समाज की गतिशीलता रुकी है और एक सकारात्मक दृष्टिकोंण को बनाने के प्रयासों पर प्रहार भी किया गया है। शायद इसी लिहाज से इस बार के सातवें वेतन आयोग में वेतन वृद्धि के अलावा नौकरशाही में सुधार के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए हैं। तमाम वरिष्ठ पदों पर विशेषज्ञों की सीधी नियुक्ति की सिफारिश भी की गई है। क्योंकि अभी अधिकतर पदों पर आईएएस अफ़सरों का ही कब्ज़ा है, भले ही वहां विशेषज्ञों की ज़रूरत हो। यदि आयोग की अनुशंसाओं को अमली जामा पहनाया गया तो नौकरशाही में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन आ सकता है।
बात चाहे सार्वजनिक क्षेत्र की हो अथवा निजी क्षेत्र की आज एक पत्रकार का काम किसी संवेदनशील दिहाड़ी मजदूर से कम नहीं है, जो अपने तमाम अनुभवों और कौशल के दम पर इस डर के साथ कि हर एक छोटी ग़लती पर उसकी नौकरी कभी भी छीन ली जा सकती है, वह पूरी लगन के साथ काम करता रहता है और यदि पूरे महीने का औसत निकाल कर बात करें तो मात्र 500 से 800 रुपये लेकर वह पराए शहर में पड़ा अपनी दो जून की रोटी के इतज़ाम का ख़्याल करता अपने झूठे आशियाने की ओर हर रोज़ दफ़्तर का बोझ लिए वापस लौटता है। ये सब इसलिए है क्योंकि उसके अधिकारों पर, उसके लिए निर्धारिक की गई जगहों पर और उसकी प्रगति के रास्तों पर कुछ लोग सर्प पिण्डली मार कर बैठे हैं।  
यद्यपि कोई अन्य कथित विद्वानों की तरह भले ही किसी उच्च स्तरीय संस्थान से गुणवत्तापरक शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल लेकर निकला हो, लेकिन पत्रकारों की जात में उसका भी हाल दिहाड़ी सा ही है। वास्तव में ये हाल एक अदने से पत्रकार से लेकर एक आईआईएस अधिकारी तक का है जो कभी पत्रकारिता का विद्यार्थी रहा हो। यूँ तो आईआईएस के हक़ों में भी इन सफ़ेद कॉलर वालों के द्वारा निब और स्याही को क्रमशः कुण्ठित और खुरदुरी बनाने का काम किया गया है जिससे उसका रंग चढ़ाए न चढ़े और लिपि में धुंधली काया सी पड़ जाए, जहाँ विशेषज्ञों को मात्र शगुन के तौर पर रखा गया है और पूरी बारात किन्हीं औरों से ही सजायी गयी है। तो फ़िर हमें इसके दुष्परिणाम भी देखने को मिलते हैं। अभी  हाल ही में पीआईबी की घटना को ही ले लीजिए। दिसम्बर के शुरुआती दिनों में बाढ़ से बेहाल चेन्नई का हवाई जायजा लेने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तमिलनाडु पहँचे थे। पीआईबी में बैठे पेशेवर अपरिपक्व गैर विशेषज्ञ और कथिक अधिकारी जनों की भारी भूल का ही परिणाम थी वो फोटोशॉप वाली घटना, जिसके ऊपर उन दिनों खूब हो-हल्ला हुआ था। चिन्ता इस बात की है कि जब सरकार के पास पेशेवर कौशल रखने वाले, विशेषज्ञ और इस विधा में  ख़ासा अनुभव रखने वाले कम्युनिकेशन के जानकार लोग हैं तो फिर ऐसी लीपापोती क्यूं की जा रही है। क्या यह मान लिया जाए कि मौजूदा सरकार भी ब्यूरोक्रेसी के पूर्वाग्रहों से ग्रस्त है या फिर से सच में कौशल का अमल करती है, अन्यथा इसके कौशल-विकास के पहल पर भी प्रश्नवाचक चिह्न खड़ा हो रहा है।  
यद्यपि ऐसा बिल्कुल नहीं है कि इसके लिए भारत सरकार का सूचना और प्रसारण मंत्रालय ज़िम्मेदार नहीं है। सच त यह है कि उसे सब पता रहता है। क्योंकि यदि हम कुछ साल पहले गुड़गांव में घटी हॉण्डा वाली घटना का विश्लेषण करें जिसमें कम्पनी के लेबर यूनियन के मजदूरों और प्रबन्धन के बीच मनमुटाव हो गया था। सरकार की ओर से मध्यस्थता स्वरूप संवाद न स्थापित करने से वो मजदूर और भी ज़्यादा आक्रामक होते-होते हिंसक भी हो गए थे और वह इस क़दर कि इसका परिणाम यह हुआ कि प्रबन्धन की ओर से उस हिंसक झड़प में एक प्रबन्धन अधिकारी को जान से हाथ धोना पड़ गया था। इस पेर मामले में पुलिस को लाठी चार्ज भी करनी पड़ी थी, जिसकी बाहर मीडिया में खूब आलोचना भी हुयी थी, जबकि वास्तव में यह एक संवाद हीनता के कारण घटी घटना थी। इस पूरे मामले को भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने गम्भीरता पूर्वक लिया और इसके बाद सूचना और प्रसारण मंत्रालय को इसकी पूरी जनकारी देते हुए सलाह दी कि पब्लिक क्षेत्र में कुशल संवाद और सही सूचनाएं एक निश्चित समय पर न होने के कारण इस तरह की हिंसक घटना घटी। इसलिए क्यों न अति शीघ्र ऐसे तमाम सार्वजनिक संस्थानों में सरकार पीआरओ जैसे पदों का निश्चय करे और इन पदों पर विशेषज्ञों को नियुक्त करने के प्रयासों में तेज़ी लायी जाए। हांलाकि, इस घटना के सालों बीत जाने के बावजूद भी सम्बन्धित मंत्रालय की ओर से इस दिशा में अब तक कोई पहल नहीं की गई है और न ही कोई अन्य ज़रूरी क़दम भी उठाए गए हैं। ऐसे में इसका सटीक अर्थ यही निकाला जा सकता है कि सरकार का यह तंत्र ऐसी हिंसक या इससे भी विनाशकारी घटनाओं के घटने के आमंत्रण स्वरूप इन्तज़ार में अब तक हाथ पर हाथ धरे बैठा है, अन्यथा इससे सम्बन्धित कार्यों की पहल न करने का इसका कोई भी कारण समझ से परे है।
ये हाल सिर्फ़ निजी क्षेत्रों का ही नहीं है। सरकारी संस्थाओं की जानकारी तो हैरान ही कर देने वाली है। स्वयं भारत के लोक सेवा प्रसारक कहे जाने वाले आकाशवाणी और दूरदर्शन में ही अकेले कार्यक्रम  निष्पादकों (पेक्सों) के आधे से भी अधिक पद रिक्त पड़े हैं जबकि हर साल पर्याप्त मात्रा में कुशल पत्रकार सम्बन्धित मंत्रालय को मिलते हैं। एक आरटीआई संख्या ए-11070/78/2015-कर्म-3/3343में आरटीआई एक्टीविस्ट नरेन्द्र कुमार तिवारी को मिले जवाब से साफ होता है कि देश भर में दूरदर्शन के सभी केन्द्रों में कुल 225 प्रोग्राम एग्ज़िक्यूटिव (पैक्स) हैं और 229 प्रोग्राम एग्ज़िक्यूटिव (पैक्स) के पद रिक्त हैं। यानी आवश्यक पैक्सों में आधे से अधिक कार्यक्रम निष्पादकों की भर्ती ही नहीं की गई है और जो कार्यरत हैं भी तो उनमें भी सम्भवतः कईयों के कार्यकाल समाप्त हो गए हैं, लेकिन फिर भी वे सब अभी तक इस संस्थानों में घइस रहे हैं। इसके अलावा भी जो अन्य शेष कार्यरत पैक्स हैं उनमें से यह देखना दिलचस्प होगा कि कितनों के पास पत्रकारिता की डिग्री, डिप्लोमा और अनुभव है। वास्तव में जब देश का पत्रकार अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठा रहा हो, सन्घर्ष कर रहा हो और उसे एक दिहाड़ी मजदूर के दाम पर काम करने की मजबूरी हो तो ऐसी स्थिति में इन पदों की भर्ती क्यूं नहीं की जा रही है। इस बात का जवाब मंत्रालय के पास नहीं है और यदि जवाब है भी तो यह सिद्ध मानिए कि वह अकर्मण्य है।
इस आरटीआई में ही कार्यक्रम निष्पादकों के कार्यों का विवरण भी मांगा गया है, जिसके जवाब कुछ इस प्रकार हैं कि प्रोग्राम एग्ज़िक्यूटिव (पैक्स) का काम कार्यक्रम के विभिन्न पहलुओं पर और मार्गदर्शी सिद्धान्तों पर दर्शकों, दूरदर्शन के अन्य केन्द्रों और महानिदेशालय से पत्राचार करना हैं, तथा यदि अपेक्षा हो तो प्रसारण की विशिष्ट प्रकृति की बाबत पम्फलेट और पुस्तिकाएं निकलवाना होता है। इसी आरटीआई में प्रोग्राम एग्ज़िक्यूटिव (पैक्स) के और कामों की रूपरेखा में कहा गया है कि दूरदर्शन केन्द्र में प्रस्तुतकर्ता/कार्यक्रम निष्पादक द्वारा किए जाने वाले कृत्यों का दूसरा महत्वपूर्ण प्रवर्ग जनसम्पर्क का क्षेत्र है। यह ऐसे कलाकारों और वक्ताओं से व्यवहार करने का है जो बुक किए जाते हैं। ऐसे सार्वजनिक क्रियाकलापों और समारोहों में उपस्थित होना जो, साहित्य, कला, उद्योग, समाज कल्याण, राष्ट्रीय विकास आदि दोनो में होते हैं। ऐसे क्रियाकलाप जिनमें कार्यक्रम निष्पादक/प्रस्तुतकर्ता को निकट सम्पर्क में रहना चाहिए ताकि वो किसी न किसी रूप में कार्यक्रम में प्रतिबिम्बित हो सकें। उस कार्यक्रमों के बारे में लोगों की पत्रों में व्यक्त, बातचीत में व्यक्त या प्रेस के माध्यम से व्यक्त प्रतिक्रिया की भी जानकारी रखनी चाहिए।
वास्तव में उक्त समस्त कार्यों के लिए विशेषज्ञ के तौर पर मास कम्युनिकेशन के विशेषज्ञों की आवश्यकता होती है।  इसलिए अब सूचना और प्रसारण मंत्रालय को यह स्वयं देख लेना चाहिए कि कार्यरत कार्यक्रम निष्पादकों में कितनों ने पत्रकारिता की शिक्षा और उसका प्रशिक्षण लिया है, जोकि एक कम्युनिकेशन के विद्यार्थी के लिए आवश्यक होता है और जो उनको अपने क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाता है।
ऐसे ही रेलवे के क्षेत्र में भी तमाम ऐसे पद हैं जो एक कम्युनिकेशन के विद्यार्थी की ही मांग पर बने हैं और उन्हे इनकी ज़रूरत भी है, लेकिन आज भी वहां गैर विशेषज्ञ लोग ही कुर्सी गरम करने में लगे हुए हैं। रेलवे में एक एडीजी-पीआर का पद होता है, जो पूरे देश के रेलवे नेटवर्क को कम्युनिकेट करता है, जो एक आईआईएस होता है और इस पद के लिए एक कम्युनिकेशन के विशेषज्ञ की ज़रूरत होती है, जबकि आज इसके लिए एक गणित विषय से एमएससी-एमफिल की अर्हता रखने वाले व्यक्ति को ऐसे संवेदनशील पद पर नियुक्त कर रखा गया है। वास्तव में यहां किसी तर्क-शक्ति की नहीं बल्कि संवाद और कुशल पत्राचार के कौशल की आवश्यकता है।
ऐसे ढेरों मामले अकेले रेलवे में ही सरकार की नाक के नीचे ढंके की चोट पर यूं ही पड़े हैं और इनके कान पर है कि जूँ तक नहीं रेंगती। ऐसे ही मामले गृह मंत्रालय, पुलिस विभाग, विश्वविद्यालय और तमाम स्थानीय सार्वजनिक उपक्रमों से जुड़े हुए हैं जहाँ पर एक स्पोक पर्सन और सही व आवश्यक सूचनाएं देने वाले या संवाद स्थापित करने वाले अधिकारी और पब्लिक से डीलिंग करने सम्बन्धी तमाम कामकाज के लिए एक विशेषज्ञ की अत्यन्त आवश्यकता है, और इस आवश्यकता को एक प्रशिक्षित पत्रकार ही पूरा कर पाने में सक्षम है। लेकिन इतना ही नहीं खजूर नज़दीक मिले तो दूर क्या जाना। एक कथित आईआईएस अधिकारी  मात्र एमए की शिक्षा लेकर भारत के जाने-माने लोक सेवा प्रसारक के बड़े केन्द्र का निर्देशन कर रहे हैं। इनकी गुस्ताख़ी यहीं पर आकर नहीं रुक जाती है। आजकल तो ये उस आईआईएमसी को डायरेक्शन देने के लिए सूची में अग्रणी चल रहे हैं और न सिर्फ़ आगे चल रहे हैं बल्कि ऊपर के आकाओं को अपने विश्वास में लेने की फ़िराक में अपनी एड़ी-चोटी का बल भी लगा रहे, जिन्होने आईआईएस की ट्रेनिग के दैरान सन् 2003 में आईआईएमसी का सिर्फ़ तीन दिन (25-08-2003 से 27-08-2003 तक) ही मुंह देखा था। अब भला ऐसे में कोई भी पत्रकारिता का विद्यार्थी या उससे जुड़ा कोई भी शख़्स इस कैसे बर्दास्त कर सकता है। यह तो वैसे ही है जैसे अपना चूल्हा अपनी आँखों के सामने फुंकते देखना।

इसके अलावा कुछ बातें और जो गम्भीर हैं और सोचने वाली भी हैं, कि जब एक मेडिकल स्टोर की दुकान खोलने के लिए फॉर्मासिस्ट की डिग्री का होना अनिवार्य है तो फिर एक पीआर की एजेन्सी चलाने वाले के लिए पत्रकारिता की डिग्री या डिप्लोमा का होना अनिवार्य क्यूं नहीं होता? जबकि एक कुशल पत्रकार पहले पत्रकारिता की शिक्षा लेता है, आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करता है। इसके बाद वह इण्डस्ट्री के भीतर जाकर पेशेवर प्रशिक्षण (इंटर्नशिप) प्राप्त करने के बाद वही पत्रकार कहलाता है। बज़ाहिर, इंटर्नशिप के दौरान हर काम के लिए एक ख़ास तरह के प्रशिक्षण की ज़रूरत होती है। आख़िरकार पत्रकारों के साथ ये छलावा कब तक। ऐसे में जो लोग भी पत्रकारों के हितों को चकनाचूर करते हुए देश को धोखा दे रहे हैं, शायद उन्हें इस बात का भी भान नहीं है कि हुनरबंद बनने के लिए काम करना ज़रूरी है, न कि चंद किताबों की घुट्टी पीकर एक दिन-विशेष को इम्तिहान पास करके अपनी कॉलर टाईट कर लेना। वास्तन में इन सबको याद रखना होगा कि एक पत्रकार हर दिन इम्तिहान देता है, ...हर दिन।

संचार छात्रों के रोजगार अवसरों के प्रमुख क्षेत्र जहाँ गैर-पेशेवर हावी हैं

• भारतीय जन सूचना सेवा, ग्रुप-ए
• राज्यों के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग
• भारतीय प्रसारण (कार्यक्रम) सेवा
• प्रसार भारती के कार्यक्रम अधिशाषी
• विभिन्न मंत्रालयों के अन्तर्गत आने वाले जनसम्पर्क तंत्र एवं मीडिया सेल
• विदेश मंत्रालय के तहत विभिन्न देशो में कार्यरत सूचना केन्द्र
• केन्द्रीय विश्वविद्यालयों, सार्वजनिक उपक्रमों, न्यायालयों और विभिन्न प्राधिकरणों/आयोगों के संचार तंत्र

• स्थानीय निकायों की जनसम्पर्क इकाईयाँ आदि।

ई-हॉस्पिटल से स्मार्ट बनता स्वास्थ्य-तंत्र



ज़िन्दगी की बदलती चाल-ढाल को देखते हुए और विकास की ओर मुँह करके खड़े होने पर आज हमें लगभग सभी क्षेत्रों में कुछ बदलाव की गुञ्जाईश दिख रही है जोकि समस्त दशाओं की अनुकूलता का परिणाम ही है। यही कारण है कि हम आज शहर सहित तमाम क्षेत्रों के स्मार्ट बनने की बात करते हैं। इसी स्मार्टनेस की ओर बढ़ने के एक क़दम में डिजिटलाईजेशन का भी पड़ाव आता है। इस दिशा में विशेष रूप से मौजूदा सरकार ने कई महत्वपूर्ण और आवश्यक क़दम भी बढ़ाए हैं। जहाँ आज हम ई-टिकटिंग, ई-कॉमर्स और ई-बैंकिंग जैसी तमाम डिजिटल सेवाओं का लाभ ले भी रहे हैं, जहाँ अब गांव-गांव में इण्टरनेट की पहुँच को आसान बनाने के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबिल बिछाई जा रही हैं, जो कहीं न कहीं मौजूदा सरकार की डिजिटल सोच और उस ओर बढ़ाए गए आवश्यक क़दम के परिणाम हैं। वहीं अब इस दिशा में हम स्वास्थ्य-क्षेत्र में भी ई-हॉस्पिटल का नाम सुन रहे हैं।
ई-हॉस्पिटल अस्पताल और मरीजों से सम्बंधित समस्त छोटी-बड़ी सुविधाओं, प्रबंधन और उनके प्रशासन को सरल, सुगम, अधिक सुविधाजनक एवं उसकी बेहतरी के लिए बनाई गई एक स्वचालित प्रणाली है जो हेल्थ मैनेजमेण्ट इन्फ़ॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) और HL7 डेवेलपमेण्ट फ़्रेमवर्क पर आधारित है। HL7 हेल्थकेयर सिस्टम और मेडिकल डिवाइसों में बाधआरहित अन्तरकार्यकारी कार्यों को निष्पादित करता है, यानी ये तमाम अस्पतालोंओं के मध्य परस्पर निर्बाध डाटा स्थानान्तरण का काम सुगमता से करता है। इसे सरकार की डिजिटल इण्डिया योजना की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा हैं। भारत-नीति के राष्ट्रीय संयोजक अनूप काईपल्ली ने बताया कि हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के बेहतर प्रशासन के लिए किये जा रहे प्रयासों को आगे बढाने में ई-हॉस्पिटल JAM (जनधन, आधार और मोबाईल) के तहत एक महत्वपूर्ण पहल है, जो समाज के उन वंचित और ज़रूरतमंदों के लिए एक क्रांतिकारी पहल है, जो अब तक चिकित्सा के क्षेत्र में उसके सहज उपयोग के साधन न होने और उसकी जटिलता के कारण गुणवत्तापरक चिकित्सकीय सुविधाएं लेने में असमर्थ रहे हैं।
वास्तव में ई-हॉस्पिटल की शुरुआत, विकास और इसका कार्यान्वयन अगरतला गवर्नमेण्ट मेडिकल कॉलेज और जीबीपी टीचिंग हॉस्पिटल- त्रिपुरा में एनआईसी, त्रिपुरा स्टेट सेण्टर द्वारा सन् 2009 में हुआ। इसके बाद एनआईसी के एक समूह ने इसकी और अधिक बेहतरी के लिए बाद में जमकर काम किया और ई-गवर्नेन्स के माध्यम से इसके लिए एक किफ़ायती  एवं निःशुल्क नीति को तैयार किया, जिसमें हम e-hospital@nic के नाम से जानते हैं। इसको बाद में लोगों से बहुत अच्छी प्रतिक्रियाएं मिलीं जो आज भी बदस्तूर ज़ारी है क्योंकि ई-हॉस्पिटल के यूज़र इण्टरफ़ेसों औऱ सूचनाओं को आसानी से प्रयोग में लाया जा सकता है।
जनसंख्या वृद्धि के बहुत अधिक दबाव होने से बढ़े हुए कामकाज के भार को ई-हॉस्पिटल ने कम किया है, जिससे लोगों के कार्य-प्रवाह में तेज़ी आयी है और उनको आसानी से स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ भी मिल रहा है। इसके अलावा ई-हॉस्पिटल को उपयोग करने वाला जन अस्पताल की आवश्यकताओं और अन्य छोटी-मोटी ज़रूरतों तक भी आसानी से पहुँच सकता है। ई-हॉस्पिटल की सेवाओं का लाभ प्राप्त चुके दिव्यांशु बताते हैं कि ई-हॉस्पिटल प्रणाली एक वरदान की तरह है। दिव्यांशु को फ़ियोक्रोमो सायटोमा नाम की बीमारी थी, जिसका इलाज उन्होने ई-हॉस्पिटल के जरिए कराया है। वह कहते हैं कि मेरा ई-हॉस्पिटल की सेवा का अनुभव बहुत ही अच्छा रहा है। इससे मैं बीमारी के दौरान होने वाले भारी तनाव और अतिरिक्त परेशानियों से बच गया हूँ। इस सेवा के लाभ से किसी मरीज के साथ लगने वाले लगभग किसी तीमारदार की काफी हद तक ज़रूरत कम हुई है और स्वयं मरीज को भी आवाजाही से छुटकारा मिल गया है। मुझे अपने ट्रीटमेण्ट के दौरान तमाम काग़जातों को संभालने के लिए कोई रिस्क नहीं था, क्योंकि इससे पहल मेरे साथ पिछले कई मामलों में ऐसा भी हुआ है कि कई बार अस्पतालों से हमें मिलने वाले पर्चे पानी में धुलकर ख़राब हो गए, वो सड़ गए तो कई बार उनको चूहों ने भी कुतर डाला था। लेकिन इस ई-ह़स्पिटल की सेवा को पाकर मैं इस दफ़ा ऐसे तनावों और रिस्कों से भी दूर था। डॉक्टरों में भी मुझे ईलाज के दौरान अतिरिक्त रोमांच देखने को मिला। मैं इस सेवा का लाभ लेकर बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूँ और लोगों को भी सलाह दूंगा कि लोग अधिक से अधिक इस सेवा का लाभ लेकर अपना कीमती समय और पैसा दोनो बचाएं?’   
वास्तव में ई-हॉस्पिटल एक वृहद संरचना में तैयार की गयी प्रणाली है जो कुछ विशेष मूलभूत उपागमों के अतिरिक्त तमाम अतिरिक्त सेवाओं से सम्बंधित उपागमों से सजा एक तंत्र है। मूलभूत उपागम सभी अस्पतालों में अनिवार्य रूप से उपलब्ध होते हैं। इसमें सबसे पहले मरीजों के पंजीकरण और अस्पताल में उनके अप्वाइंटमेण्ट से सम्बंधित सुविधाएं दी गयी है। इसके अन्तर्गत मरीज पंजीकरण उसके समस्त ब्यौरों के साथ किया जाता है, जिससे मरीज को प्रशासनिक कार्यों और देखरेख प्रक्रिया में सुगमता मिलती है।
दूसरा, वाह्य रोगी प्रबंधन की सुविधाओं के अन्तर्गत भी मरीजों को चिकित्सकों की उपलब्धता की व्यवस्था की गयी है। इस मॉड्यूल में सभी मरीजों और उनकी रोग-सम्बन्धी सूचनाएं त्वरित उपलब्ध होने से चिकित्सकों को मरीजों की प्रशासनिक जानकारियां हासिल करने और उनकी देखभाल दोनों प्रक्रियाओं में सुगमता होती है। इसके अलावा मूलभूत उपागम के अन्तर्गत ही मरीजों की दीर्घकालिक एवं तत्कालिक सभी प्रकार की बिलिंग का भी निराकरण किया जाता है। इस मॉड्यूल में बिलिंग प्रक्रियाओं के समस्त प्रकार जैसे- वाह्य-रोगी, अन्तरिक रोगी और रेफ़रल रोगियों को भी सम्मिलित किया जाता है। इसके अन्तर्गत अस्पताल से सम्बंधित सभी भुगतान जैसे- बेड चार्ज, लैब परीक्षण, औषधियां, चिकित्सकीय शुल्क, भोजन आदि के बिल शामिल जाते हैं। इन सबके लिए भीड़-भाड़ की रेलमपेल से निजात पाने में ई-हॉस्पिटल बेहद उपयुक्त है जो इन सबके अतिरिक्त धन और समय दोनो को भी बचाता है।
इसके अतिरिक्त सेवा सम्बंधी मूलभूत उपागम भी ई-हॉस्पिटल की सेवाओं में शामिल हैं। इसके अन्तर्गत अस्पताल से सम्बंधित सभी सुविधाओं और सेवाओं की व्यवस्था उपलब्ध हो जाती हैं। साथ ही सुरक्षा कार्य-प्रवाह अथवा प्रयोगकर्ता प्रबंधन भी ई-हॉस्पिटल की सेवाओं से जुड़े अस्पतालों में हमें मूलभूत रूप से मिल जाते हैं। इसका मुख्य काम अप्लीकेशन में उपलब्ध सूचनाओं की पहुँच की सुरक्षा पर नियंत्रण करना है।
इन तमाम मौलिक उपागमों के अतिरिक्त कुछ अतिरिक्त उपागम भी ई-हॉस्पिटल की सेवाओं से जुड़े हैं। यद्यपि सभी अस्पतालों में समस्त सुविधाएं प्राप्त होती हैं, फिर भी ई-हॉस्पिटल की अतिरिक्त सुविधा यही है कि यदि कोई सेवा जो आपको चाहिए आपके द्वारा पंजीकृत अस्पताल में उपलब्ध नहीं है तो ई-हॉस्पिटल से जुड़े दूसरे अस्पताल से वह सेवा लेकर आपको उपलब्ध करा दी जाती है। तो यह कहना कोई अतिशयोक्ति न होगी कि ई-हॉस्पिटल से स्वास्थ्य-तंत्र स्मार्ट बन रहे हैं। फिर भी एक नज़र ई-हॉस्पिटल के द्वारा उपलब्ध अतिरिक्त उपागमों पर फेर लेनी चाहिए।
सबसे पहले फ़ॉर्मेसी के अन्तर्गत सामान्य कार्यप्रवाह और प्रशासनात्मक प्रबंधन का स्व-चालन होता है। औषधियों को मरीजों तक पहुँचाने के लिए बार-कोड का प्रयोग होता है। प्रयोगशाला सूचना प्रणाली के तहत सम्बन्धित डॉक्टर अपने अनुभाग से प्राप्त परीक्षण प्रस्ताव और उत्पादित परिणामों को प्रेषित करता हैं। डॉक्टर ऑनलाईन प्रस्ताव के माध्यम से प्रयोगशाला कर्मचारी को सम्बन्धित रिपोर्ट बनाने की सूचना देता है। इसके अंतर्गत बायोमेट्रिक, कोशा-विज्ञान या साइटोलॉजी, माइक्रोबायोलॉजी, न्यूरोलॉजी और रेडियोलॉजी आदि से सम्बंधित परीक्षणों की व्यवस्था उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त रेडियोलॉजी प्रबंधन के अन्तर्गत एक्स-रे, स्कैनिंग और अल्ट्रासाउण्ड आदि की सुविधाएं भी ई-हॉस्पिटल में दी जाती हैं।
दूसरा, ई-हॉस्पिटल के उपागमों में इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (EMR) की भी अतिरिक्त व्यवस्था है। यह पूर्ण रूप से समाकलित ज्ञान-कोष होता है जिसमें मरीज के क्लीनिकल रिकॉर्ड्स और अन्य सम्बन्धित सूचनाएं सुरक्षित रहती है। इस पर सभी सम्बंधित अनुभागों से प्राप्त सूचनाएं जैसे- चिकित्सकीय परीक्षण, निदान, निदान का इतिहास या पूरा ब्यौरा और परीक्षण रिपोर्ट आदि उपलब्ध होती हैं। इसके अलावा आहार सम्बंधी मॉड्यूल भी ई-हॉस्पिटल की अतिरिक्त सेवाओं का हिस्सा है। इस मॉड्यूल पर अस्पताल प्रबंधन प्रणाली सॉफ्टवेयर में अस्पताल के रसोई घर से रोगी को दिए जाने वाले आहार की रूपरेखा और उसकी मात्रा डाईटीशियन के निर्देशानुसार संग्रहीत रहती हैं। इसके साथ ही हाउस कीपिंग यानी साफ़-सफ़ाई की भी बेहतर व्यवस्था होती है। इस मॉड्यूल के अन्तर्गत अस्पताल के बेड, कमरों और अन्य सम्बन्धित कक्षों की साफ़-सफ़ाई से सम्बन्धित सूचनाएं अस्पताल प्रबंधन प्रणाली सॉफ्टवेयर में संग्रहीत रहती हैं। साथ ही यदि हम नर्सिंग मॉड्यूल की बात करें तो इसमें अस्पताल प्रबंधन प्रणाली सॉफ्टवेयर में मरीज की देखरेख और उसकी गुणवत्ता को बढ़ाने सम्बन्धी सूचनाएं नर्सों को नियमित रूप से प्राप्त होती रहती हैं।
ई-हॉस्पिटल में आपातकालीन प्रबंधन की भी अतिरिक्त व्यवस्था की गयी है। आपातकालीन मॉड्यूल में अस्पताल प्रबंधन प्रणाली सॉफ्टवेयर मरीज को अतिशीघ्र पंजीकरण कराने की सहूलियत देता है तथा मरीजों कों बहुत सी विशेष पंजीकरण सूचनाएं यथा सांख्यिकी सूचनाएं आदि प्राप्त हो जाती हैं। इसमें तमाम मशीनों और उपकरणों के रख-रखाव एवं रख-रखाव सम्बन्धी समय-सारणी की जानकारी अस्पताल प्रबंधन प्रणाली सॉफ्टवेयर पर उपलब्ध होती हैं। इसके अलावा एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उपागम ई-हॉस्पिटल के अन्तर्गत आता है, और वह है CSSD यानी सेण्ट्रल स्टेरिल सप्लाई डिपार्टमेण्ट। ये मध्यम और बड़े अस्पतालों हेतु एक अत्यंत महत्वपूर्ण उपागम है। कुछ देशों में तो ये उपागम अस्पताल लाइसेंस प्राप्त करने हेतुअनिवार्य भी है। इसके अलावा पिक्चर आर्चीविंग एण्ड कम्युनिकेशन सिस्टम (PACS) भी ई-हॉस्पिटल के गुणों को बढ़ाने का काम करता है, जो एक मेडिकल इमेजिंग प्रौद्योगिकी है और इसमें हम किसी इमेज के तमाम रूपों पर वृहद रूप से अध्ययन और उसका विश्लेषण कर सकते हैं।
ई-हॉस्पिटल के अतिरिक्त उपागमों में रक्त-कोष की भी अच्छी व्यवस्था है, जिसके अन्तर्गत E-HMS पर व्यापक रुप से रक्तदान देने वाले रक्तदाता एवं ग्राही की समस्त सूचनाएं संग्रहीत रहती हैं। यहाँ वित्तीय लेख-जोखा की भी सुगम व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत कैश, बैंक रसीद, भुगतान, बाउचर व कैशबुक आदि से सम्बन्धित सूचनाएं संग्रहीत रहती है। साथ ही इसमें बैलेंस-शीट और लाभ-हानि की भी जानकारियां उपलब्ध होती हैं।
ई-हॉस्पिटल के अन्तर्गत किसी भी अस्पताल की निर्धारित या स्थिर सम्पत्ति का लेखा-जोखा भी आता है। यहाँ भुगतान रजिस्टर के अन्दर सैलरी स्लिप की रसीद, कैल्कुलेशन और सैलरी के प्रमाण-पत्र आदि के विवरण की भी पूरी जानकारी होती है। इसके अलावा ई-हॉस्पिटल के अन्दर मैनेजमेण्ट इनफ़ॉर्मेशन सिस्टम यानी डैशबोर्ड की भी सुविधा पायी जाती है। इस मॉड्यूल में किसी अस्पताल प्रबन्धन के अनुभागों से सम्बन्धित समस्त सूचनाएं उपलब्ध होती हैं, जिनका अस्पताल के शीर्ष प्रबन्धन समूह द्वारा निरीक्षण किया जाता है। अर्थात् ई-हॉस्पिटल का सम्पूर्ण जाल न सिर्फ़ एकहरा है जो मात्र मरीजों के लिए है बल्कि यह पूरी तरह से एक विशाल-तंत्र हैं जिसके अन्तर्गत सम्पूर्ण अस्पताल प्रबन्धन और उसका पूरा प्रशासन बल्कि यह भी कह सकते हैं कि कई अस्पतालों की श्रृंखला इसमें शामिल है। तो निश्चित रूप से ई-हॉस्पिटल ने हमें स्वास्थ्य-क्षेत्र में स्मार्ट बनाया है जहाँ हमें इससे जुड़ी तमाम सहूलियतें बड़ी आसानी से प्राप्त हो जाती हैं।
इसके अलावा नागरिकों के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने किलकारी, द रिवाइज़्ड नेशनल टीबी कंट्रोल प्रोग्राम (RNTCP), मोबाइल एकेडमी और एम-सशेशन (M-Cessation) जैसी चार महत्वपूर्ण योजनाएं भी हाल ही में घोषित की हैं, जो आईटी पर आधारित सेवाएं हैं। यानी सरकार अपनी पूरी कोशिश कर रही है कि स्वास्थ्य-सेवाओं का तंत्र ज़्यादा से ज़्यादा कैसे स्मार्ट बन सके।

मरीजो के स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की सुरक्षा का मुद्दाः

चूंकि क्लाउड कंप्यूटिंग आज के दौर का एक महत्वपूर्ण डाटा संचरण माध्यम बन चुका है। सुगमता, उपयोगिता और परस्परानुकूलता के कारण विभिन्न क्षेत्रों में इसका व्यापक पैमाने पर उपयोग हो रहा है। बहुत ही महत्वपूर्ण सुविधाएं इसी सुविधा की वजह से ई-घेरे में आयी हैं।  ई-हॉस्पिटल भी इन में से एक है जिसका पूरे विश्व के कई देशों में व्यापक पैमाने पर उपयोग हो रहा है। यद्यपि परिणाम स्वरुप कार्य प्रणाली में बदलाव होने से इसके कार्य प्रवाह में काफी तेज़ी आयी है, किन्तु ई-हॉस्पिटल प्रणाली के अंतर्गत संचरित होने वाला स्वास्थ्य डाटा कई मामलों में सुरक्षा दृष्टिकोणों से काफ़ी असुरक्षित भी है। विभिन्न प्रकार के साइबर क्राइम और अन्य माध्यमों से इस स्वास्थ्य सूचना का ग़लत उपयोग भी हो सकता है। चूंकि संचरित होने वाली सूचनाएं संवेदनशील हो सकती है, इसलिए इन सूचनाओं का दुरुपयोग सम्भव है। यह निजता कानून के ख़िलाफ है और इसके लिए आईटी सुविधादाताओं को कानूनी रुप से जुर्माना भी देना पड़ सकता है। जबकि लाभार्थी दिव्याशुं का इस मामले में मानना है कि सिक्योरिटी बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है। आज भी मरीजों को सही समय पर सुविधा जनक लाभ नहीं मिल पाता है और इसी को आसान बनाने के लिए आम लोगों के हित में ये सेवा लायी गयी है। वह कहते हैं कि मेरा मानना है कि जिनकी सिक्योरिटी का मुद्दा आता है उनके पास उनके निजी डॉक्टर होते हैं, उनके फ़ेमिली डॉक्टर होते हैं, तो यदि जहाँ तक सिक्योरिटी का मुद्दा है तो इससे आम लोगों का बहुत सरोकार नहीं जुड़ा हुआ है। यदि फिर भी कुछ रिस्क है तो वह इस सेवा के लाभ के सामने गौण ही सिद्ध है।
हालांकि, यद्यपि इस प्रक्रिया में ऐसे कुछ सामान्य ख़तरे ज़रूर हैं, लेकिन बावजूद इसके लिए तमाम विशेषज्ञों द्वारा कई महत्वपूर्ण तकनीकों के माध्यम से इसकी सुरक्षा के लिए ज़रुरी क़दम उठाए गए हैं और तमाम प्रयास लगातार ज़ारी भी हैं।

पंजीकरण प्रणालीः

चूंकि अस्पतालों में मरीज के रोग से सम्बन्धित अलग-अलग ओपीडी होती हैं और उनकी अपनी निर्धारित क्षमताएं भी होती हैं, इस लिहाज से प्रश्न खड़ा होता है कि क्या सामान्यतः अप्वाइंट मिलने में मरीजों को किसी तरह की असुविधा का भी सामना करना पड़ता है अथवा नहीं। इस मामले में अखिल भारतीय विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी संस्थान नई दिल्ली के मीडिया को-ऑर्डिनेटर राजीव मैखुरी का कहना है कि कई बार ऐसा होता है कि देश के दूर-दराज इलाकों से हमारे पास मरीज बिना अप्वाइंटमेण्ट के चले आते हैं और हमारे पास ओपीडी में जगह नहीं होती है तो उस मरीज को अगली बार का अप्वाइंटमेण्ट लेकर वापस जाना पड़ जाता है, जिससे उसको दिक्कत होती है। इस तरह हम देखते हैं कि पंजीकरण मरीज के लिए पहली सीढ़ी होती है जिसको वह आसानी से चढ़ जाना चाहता है, इस लिहाज से ई-हॉस्पिटल की सेवा लोगों को बहुत पसन्द आ रही है। हमारे पास अब मैनुअल मरीजों की संख्या में भी कुछ कमी देखने को मिल रही है, अधिकतम लोग ई-हॉस्पिटल की सेवा से लाभान्वित हो रहे हैं। उनकी और बेहतरी के लिए सरकार ने सभी क्षेत्रों में अलग-अलग ओपीडी की भी व्यवस्था कर दी है, तो लोगों को निश्चित रूप से ई-हॉस्पिटल का लाभ लेना चाहिए और लोग भारी मात्रा में इसका उपयोग कर भी रहे हैं।
ई-हॉस्पिटल में पंजीकरण के लिए ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन सिस्टम यानी ओआरएस (ORS) विकसित किया गया है जो संपूर्ण देश में आधार कार्ड पर आधारित पंजीकरण करता है। यानी आप मात्र अपने आधार नंबर को अंकित कर ई-हॉस्पिटल में अपना पंजीकरण करा सकते हैं। इसमें आउट पेसेण्ट डिपार्टमेंट (OPD) आदि कि सुविधाएं भी प्राप्त कर सकते हैं और अगर मरीज का मोबाइल नंबर यूनिक आईडेण्टिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया (UIADI) में दर्ज़ है तो ई-केवाईसी (e-KYC) के माध्यम से हम इस पोर्टल में विभिन्न अस्पतालों के तमाम विभागों में ऑनलाईन अप्वाइंटमेण्ट ले सकते हैं। लेकिन पुनः ध्यान रहे कि अगर मरीज का मोबाइल नंबर UIADI में पंजीकृत नहीं है तो उसके नाम के आधार पर पंजीकरण होता है। नए मरीज को अप्वाइंटमेण्ट के साथ-साथ एक यूनिक हेल्थ आईडेण्टिफिकेशन नंबर दिया जाता है। अगर आधार नंबर UIADI नम्बर से पहले से ही लिंक है तो अप्वाइंटमेण्ट नम्बर दिया जाता है और UIADI वही रहता है।
नए मरीज को अप्वाइंटमेण्ट लेने का तरीकाः
राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केन्द्र के वरिष्ठ तकनीकी निदेशक सुनील कुमार बताते हैं कि यदि आप रोगी हैं और एम्स या डॉ. राम मनोहर लोहिया, नई दिल्ली जैसे अस्पताल में दिखाना चाहते है तो आप ors.gov.in नामक पोर्टल पर जाकर पहले से ही अपॉइंटमेंट ले सकतें है जो आप को रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए लम्बी कतारों में खड़े होने से बचाएगा | आप आधार नंबर से या बिना आधार नंबर के अपॉइंटमेंट ले सकते हैं | इसके इलावा आप लैब-रिपोर्ट भी घर बैठे देख सकतें है | कुछ ब्लड बैंको में खून की उपलब्धता भी पता कर सकते हैं | आज तक इस पोर्टल के माध्यम से 15 अस्पतालों से 1.13 लाख से भी अधिक लोग अप्वाइंटमेण्ट ले चुके हैं।
यानी नए मरीज को ई-हॉस्पिटल सेवा का लाभ लेने के लिए सबसे पहले www.ors.gov.in पर जाना होगा। अगर आपके पास आपका आधार नम्बर है और आपका मोबाइल नम्बर आपके आधार से लिंक है तो आपके मोबाइल पर एक वन टाइम पासवर्ड यानी ओटीपी(OTP) प्राप्त होगा, फिर उसे आप वेबसाइट पर अंकित करके अपना अस्पताल चुनकर उसकी ओपीडी का अप्वाइंटमेण्ट ले सकते हैं और यदि आपके आधार कार्ड से आपका मोबाइल नंबर लिंक नहीं है तो उस स्थिति में आपको आधार कार्ड पर लिखित अपना नाम वेबसाइट पर भरना होगा और जनसांख्यिकीय प्रमाणीकरण के बाद आपको अपना मोबाइल नंबर और अन्य जानकारियां जैसे पता और उम्र आदि की जानकारीयां देनी होंगी। इसके अलावा यदि मरीज के पास आधार नंबर नहीं है तो उस स्थिति में वह ऑनलाईन अप्वाइंटमेण्ट तो कर सकता है लेकिन उसे सम्बन्धित अस्पताल के ओपीडी में जाकर अपने पहचान की पुष्टि करा कर ओपीडी-कार्ड प्राप्त करना होगा और इसके बाद मरीज को उसका अप्वाइंटमेण्ट स्टेटस एक एसएमएस के द्वारा प्राप्त हो जाएगा।

तालिका (क):-

ई-हॉस्पिटल के मुख्य आकर्षणः

ISO/IEC 9126 पंजीकृत
HDF (HL7 डेवेलपमेण्ट फ़्रेमवर्क) पर आधारित
∙ यूनीकोड आधारित भारतीय बहुभाषा समर्थन
∙ विभिन्न अनुकूलन मापदण्डों के आधार पर व्यापकता एवं सुगमता
∙ नियंत्रण और सुरक्षा आधार पर व्यापक महत्व
∙ डाटा सुरक्षा और गोपनीयता
∙ लेन-देन का अंकेक्षण
∙ शब्दकोष- ICD-9 & LOINC etc.
मरीजो के ब्यौरों की तीव्र एवं प्रभावशाली उपलब्धता
KIOSK टचस्क्रीन यूज़र इण्टरफेस
WINOWS और LINUX पर उपलब्धता
स्रोतः http//tsu.trp.nic.in/ehospital

 तालिका (ख):-

ई-हॉस्पिटल की अस्पतालों की मैनुअल सेवाओं से तुलनाः एक नज़र...

सेवा/सुविधाएं
मैनुअल प्रणाली में
(प्रति मरीज)
ई-हॉस्पिटल प्रणाली में (प्रति मरीज)
मरीज पंजीकरण
1 से 15 सेकण्ड
3 से 5 सेकण्ड
पुनः पंजीकरण
15 से 30 मिनट
15 सेकण्ड
भुगतान और नकद जमा
2 से 4 घण्टे
30 सेकण्ड
प्रयोगशाला परीक्षण रिपोर्ट (ओपीडी)
1 से 2 दिन
अधिकांशतः उसी दिन
रेडियोलॉजी परीक्षण रिपोर्ट (आरपीडी)
1 से 2 दिन
अधिकांशतः उसी दिन
आपातकालीन सेवाओं जैसे- एंबुलेंस/रक्त-कोष/OT
अप्रबंधित/कुछ विशेष केन्द्रों पर उपलब्ध
प्रबंधित और लगभग सभी केन्द्रों पर उपलब्ध
आहार सुविधाएं
अप्रबंधित आहार/प्रति आहार पैमाने पर ही वितरण
प्रबंधित आहार वितरण प्रणाली/प्रति आहार पैमाने पर विस्तृत सूची प्रणाली द्वारा वितरण
सामान-सूची
अप्रबंधित और महत्वपूर्ण भण्डार का दुरुपयोग
प्रबंधित/दुरुपयोग पर नियंत्रण
रक्त-कोष
मैनुअल और अपर्याप्त
रक्त उपयोगिता में बढ़ोत्तरी/रक्त की सूचना का प्रसारण और अतिरिक्त परीक्षणों की पुनरावृत्ति से बचाव/केन्द्रित रक्त सूची की उपलब्धता और धन की बचत
चिकित्सकों द्वारा देखभाल की योजना
मौका मिलने पर देखभाल और समय का अपव्यय
EMR होने से चिकित्सक को योजना निर्माण और निरीक्षण में सुगमता
स्रोतः informatics.nic.in जनवरी, 2014;

तालिका (ग):-

ई-हॉस्पिटल का कार्य-प्रवाह

अनुप्रयोग प्रबंधन
मरीजों का पंजीकरण
क्लीनिक
आईपीडी
प्रयोगशाला
आरआईएस और पीएसीएस
शल्य-क्रिया
बीमा और भुगतान
ईएमआर और सीडीए
फॉर्मेसी
नर्सिंग
एच.आर.
भण्डारण और सूची
उपकरण प्रबंधन

संरचना
सुगम उपयोगी
ISO/IEC9126 प्रमाणित
HL7 डेवेलपमेण्ट फ़्रेमवर्क
थर्ड पार्टी से जुड़ाव
PACS डिवाइसेस
बार-कोड डिवाइसेस
बायोमेट्रिक डिवाइसेस
लेब डिवाइसेस
अन्य
वाह्य प्रणाली अन्तरकार्यकारिता
इण्टरहॉस्पिटल
ईएमआर विनिमय
अन्य


तालिकाः(घ)

ई-हॉस्पिटल्स का विवरण

क्र. सं.
अस्पताल का नाम
पता
सम्पर्क
1.
गवर्नमेण्ट मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल
सेक्टर-32, चंडीगढ़
2.
पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल एजूकेशन और रिसर्च
सेक्टर-12, चंडीगढ़
3.
डायरेक्टरेट मेडिकल एण्ड हेल्थ सर्विस
सिलवासा, दादर एवं नगर हवेली
4.
अखिल भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (एम्स)
अंसारी नगर, नई दिल्ली
011-26588500, director@aiims.ac.in
5.
डॉ. राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल
कनॉट प्लेस, नई दिल्ली
011 2336 5525,
6.
कलावती सरण चिल्ड्रेन हॉस्पिटल
बांग्ला साहिब मार्ग, नई दिल्ली
23344160-Ext.-402 , drkksinghal@gmail.com
7.
लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज एण्ड श्रीमती सुचेता कृपलानी हॉस्पिटल
शहीद भगत सिंह मार्ग, दिल्ली
8.
राष्ट्रीय क्षय एवं श्वसन रोग संस्थान
दिल्ली
011-26854922 , v.vohra@nitrd.nic.in
9.
सफ़दरजंग हॉस्पिटल एण्ड वीएमएमसी
रिंग रोड, दिल्ली
01126176990 , ic.it@vmmc-sjh.nic.in
10.
स्पोर्ट्स इंजरी सेण्टर, सफ़दरजंग हॉस्पिटल
दिल्ली
098914 95930,
11.
पीएचसी एचसी सचिवालय
शिमला
12.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेण्टल हेल्थ एण्ड न्यूरो साइंस
बैंगलुरू

080-26995001,

13.
प्राइमरी हेल्थ सेण्टर वालसँग
सोलापुर, महाराष्ट्र
02172258026 , phcvalsang@gmail.com
14.
जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ़ पोस्टग्रेगुएट मेडिकल एजुकेशन एण्ड रिसर्च
पुडुचेरी

080-26995001,

15.
अगरतला गवर्नमेण्ट मेडिकल कॉलेज
कञ्जबन पोस्ट ऑफ़िस, अगरतला-त्रिपुरा
0381-235-7130, agmc@rediffmail.com
स्रोतः ors.gov.in/copp/more/jps

इसके अतिरिक्त कुछ और भी अस्पताल इस सेवा के साथ जोड़े गए हैं जो ई-हॉस्पिटल के साथ मिलकर काम कर रहे हैं-
∙ चरक पालिका हॉस्पिटल, मोतीबाग़, नई दिल्ली।
∙ सिविल हॉस्पिटल, सेक्टर-45, चंडीगढ़।
∙ पालिका हेल्थ कॉम्प्लेक्स, चाणक्यपुरी- नई दिल्ली।
∙ पालिका मेटरनिटी हॉस्पिटल, लोधी कॉलोनी-नई दिल्ली।
∙ रेफ़रल हॉस्पिटल सीएपीएफ़एस (CAPFs)