Wednesday, 2 March 2016

साक्षात्कार... डॉ. महेश चन्द्र शर्मा



 कोई चीज़ स्वदेशी है इतने मात्र से ही वह ग्राहीय नही होती हैं। विदेशी होने मात्र से त्याज्य और स्वदेशी होने मात्र से ग्राहीय ऐसा दीनदयाल जी नहीं मानते हैं। छुआछूत भी स्वदेशी है, लेकिन वह ग्राहीय तो नहीं है। इसलिए जो स्वदेशी है उसे युगानुकूल यानी युग के तर्क के अनुकूल बनाना और जो विदेशी है उसको देशानुकूल बनाना चाहिए।


पण्डित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राजनीति और इसके दर्शन का एक ऐसा नाम है जिसने जनसंघ के मंच से भारत को एकात्म मानववाद के दर्शन के साथ-साथ अर्थायाम् के रहस्य और राष्ट्र जीवन की दिशा को प्रदर्शित करने का सकारात्मक प्रयास किया है। उनके ये विचार और राज-व्यवस्था के पैमाने भारत की किसी भी सरकार के लिए अपनाना यहां की प्रजा के लिए एक सुखद व हितकर हो सकता है। यद्यपि भारतीय जनता पार्टी के उदय के साथ पं. दीनदयाल के विचारों का विकल्प गांधी को तलाश लिया गया, लेकिन अब एक बार फिर पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों पर राष्ट्र जीवन की दिशा तय की जा रही है और इसका सबसे जीता जागता उदाहरण हमें इस बार के बजट में देखने को मिला है, जिसमें पंण्डित दीनदयाल उपाध्याय के ग्रामोत्थान और अन्त्योदय के सिद्धान्तों पर अमल किया गया है जिससे यह बजट पूर्णतः किसान, कृषि और ग़रीबों के लिए माना जा रहा है। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को आत्मसात करने वाले एकात्म मानव दर्शन अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान के अध्यक्ष डॉ. महेश चन्द्र शर्मा के साथ दीनदयाल जी के विचारों की इस बजट से प्रसंगिकता का साझा विश्लेषण कर रहे हैं अमित राजपूत-

• इस बजट को आप पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के कितने नज़दीक देखते हैं?
मैं समझता हूँ कि दीनदयाल उपाध्याय जी ने भारत की राजनीति और अर्थनीति के लिए जो दिशा दी है, उस दिशा की ओर जाने वाला यह देश का पहला बजट है, क्योंकि भारत की अर्थनीति ग्रामाधारित है और ग्रामाधारित अर्थनीति की रीढ़ है कृषि। मैं समझता हूं कि कृषि पर जितना फोकस इस बार किया गया है उतना पहले कभी भी नहीं किया गया है। भारत की कृषि ही है जो देश को रोजगार प्रदान करती है। श्रीमान् नानजी देशमुख ने दीनदयाल जी के विचारों को एक नारे में व्यक्त किया है और वह उद्घोष है- हर खेत को पानी-हर हाथ को काम। दीनदयाल जी ये मानते हैं कि देश के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण है वह है शिक्षा, सुरक्षा और स्वावलम्बन।
• दीनदयाल जी के आर्थिक विचारों का केंद्र विकेंद्रीकरण है। बजट में घोषित तमाम योजनाओं को अन्तिम पंक्ति तक ले जाने के लिए आपको ये लगता है कि सरकार इसके लिए कोई ख़ास तरह की तैयारियाँ भी करेगी या फिर यह पूर्व की भांति हवा-हवाई ही होगा?
जहां तक मैं समझता हूं दीनदयाल जी विकेन्द्रीकृत व्यवस्था की ही बात करते हैं जिसको जनपदीय स्तर पर विकेन्द्रीकृत होना है। जब तक वह व्यवस्था नहीं आती है तब तक आज की सरकार को आज की व्यवस्था में ही काम करना होगा और इसके लिए सामान्यतः श्री नरेन्द्र मोदी जी ने इस बात का बार-बार आग्रह किया है कि हमारा जो फेडरेशन है वह कॉपरेटिव फेडरेशन है और इसलिए देश की सारी संस्थाएं जिसमें केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, पंचायतें सब मिलकर काम करती हैं। विकेन्द्रीकरण को ये सब संस्थाएं मिलकर ही ला सकती हैं, केवल केन्द्र सरकार ये काम नहीं कर सकती। इसलिए मैं आशा करता हूँ कि इस बजट की जो भावना है उस भावना के अनुकूल देश की सभी निकायें काम करेंगी।
• बजट पेश होते ही लोगों की दृष्टि कृषि की ओर मुड़ गई है। क्या इस बजट से कृषि में क्रान्ति आएगी?
क्या आएगा यह तो भविष्य कोई तय नहीं कर सकता है, पर इस बजट की ही यदि चलेगी तो कृषि में इतना सुधार होगा जो आज तक कभी नहीं हुआ।
• देश का युवा खेती की ओर कैसे उन्मुख हो सकता है?
खेती जब लाभप्रद होगी, खेती जब सम्मानजनक होगी तो युवा उस तरफ अवश्य झुकेगा। जो बजट की मंशा है समाज को भी अपनी मानसिकता उस तरफ करनी होगी, क्योंकि सम्मान तो समाज देता है और इसलिए यदि खेती की व्यवस्था को समाज सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेगा तो युवा उस ओर नहीं झुकेगा।
• कोई किसान सर उठाकर ये कब कह पाएगा कि हाँ, मैं किसान हूँ?
वह कह पाएगा क्योंकि जिस प्रकार से इस बजट में कृषि को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है उसी प्रकार से यदि व्यवस्था कृषि अभिकेन्द्रित रहेगी तो किसान जो आज लाचार दिखता है वह कल स्वाभिमानी हो जाएगा।
• अब तक देश में एक भी कृषि नीति नहीं बनाई गई है। क्या यह सरकार देश को कृषि नीति दे पाएगी?
सरकार को कृषि नीति देना चाहिए, अब सरकार इस दिशा में किस ढंग से काम कर रही है, वह इस बारे में किस तरह से क्या सोचती है ये तो सरकार ही बेहतर बता पाएगी, लेकिन मुझे कृषि और किसानों के लिए सरकार की मंशा सही दिशा में जान पड़ती है।
• बजट के बरक्स विपक्ष अपने पारम्परिक रवैये में नहीं दिखा। इस बात को आप किस तरह से देखते हैं?
ऐसा है कि सत्ता हो चाहे विपक्ष आख़िर दोनो देश के लिए काम करते हैं और इसलिए यदि देश आज सर्वानुमति व सर्वसम्मति से चलता है तो यह हमारे लोकतंत्र का शुभ लक्षण है इसका स्वागत किया जाना चाहिए। सरकार की दमदार नीतियां और विपक्ष की समझ से ही शायद ऐसा देखने को मिल रहा है।
• डिजिटल इण्डिया, सुपर फ़ास्ट ट्रेन, मेक इन इण्डिया और स्मार्ट सिटी जैसे भारी निवेश यानी एक तरह से कहे तो एफ़डीआई के द्वारा प्रधानमंत्री जी की महत्वाकांक्षी योजनाओं में विकेंद्रीकरण की कितनी सम्भवनाएं हैं?
जितने भी आपने नाम लिए हैं मैं समझता हूं कि इन सबका सम्बन्ध विकेन्द्रीकरण से नहीं है, इनका सम्बन्ध आधुनिकीकरण से है। देश में पहले आधुनिकीकरण आये और फिर वह विकेन्द्रित हों इसकी ज़रूरत है। मैं समझता हूं कि नई पीढ़ी इन विषयों में अधिक प्रतिभासम्पन्न है और वह ज़रूर प्रधानमंत्री जी के आह्वान को उचित प्रतिक्रिया देगी।  
• दीनदयाल जी ने स्व-साधन स्व-उत्पादन और स्व-उपभोग के द्वारा स्वाभिमान की बात की है, लेकिन विदेशी पूंजी और विदेशी तकनीक से यह कैसे सम्भव है?
दीनदयाल जी का एक वाक्य है और वह यह है कि कोई चीज़ स्वदेशी है इतने मात्र से ही वह ग्राहीय नही होती हैं। छुआछूत भी स्वदेशी है, लेकिन वह ग्राहीय तो नहीं है। इसलिए जो स्वदेशी है उसे युगानुकूल यानी युग के तर्क के अनुकूल बनाना और जो विदेशी है उसको देशानुकूल बनाना चाहिए। विदेशी होने मात्र से त्याज्य और स्वदेशी होने मात्र से ग्राहीय ऐसा दीनदयाल जी नहीं मानते हैं। जब हम बात करते हैं मेक-इन-इण्डिया की तो उसका अर्थ ही यह है कि जो विदेशी पूंजी आएगी तो वह भारतानुकूल होकर ही यहां पर काम करेगी।
• गांधी जी पर कितनी गोलियां चली थीं इस तथ्य को डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी उजागर करवाने की बात कर रहे हैं, तो क्या दीनदयाल जी के रहस्यमयी असामयिक मृत्यु की जाँच कराएगी वर्तमान सरकार?
दीनदयाल जी अब नहीं हैं। कोई जांच या कोई सरकार अब उनको वापस नहीं ला सकती है। बड़ा रहस्य है उनकी मृत्यु और उसको यदि कोई खोज सके तो ये उनका काम है जो रहस्यों को खोजा करते हैं। मेरी अपेक्षा है कि लोग दीनदयाल जी के विचारों को जाने और उनको माने। इसलिए देश में एक निकाय है जिसका काम है रहस्यों को जानना वह अपना काम करे।
• क्या यह कहा जा सकता है कि पं. दीनदयाल उपाध्याय के विचारों के साथ बीजेपी की जनसंघ में वैचारिक घर वापसी हो रही है?
जनता पार्टी से बीजेपी का निकलना एक ऐतिहासिक राजनैतिक प्रकिया के तहत वो हो गया है। बीजेपी अब एकात्म मानववाद और दीनदयाल जी को आधिकारिक रूप से अपनी विचारधारा मानता है। इसके अलावा घर वापसी तो उनकी हुआ करती है जो कभी घर से बाहर गए हों। भारतीय जनता पार्टी दीनदयाल जी के वितारों से परे ही कब हुई है। बीजेपी आरम्भ से ही पं. दीनदयाल जी के विचारों को ग्रहण करती आयी है और अब लोगों को लगता है कि इसका कुछ नाम देना ज़रूर लगता है तो वह देते रहें।


Wednesday, 17 February 2016

आय-व्यय का लेखा-जोखा और पं. दीनदयाल



देश के नीति नियंताओं की व्यस्तता आजकल राजनीतिक लेखा-जोखा और आगामी नीतियों को तैयार करने के विचार पर है। संसद में बजट सत्र प्ररम्भ होने वाले हैं। एक राष्ट्र की परिधि में बात करें तो उस राज्य में निवास करने वाला हर नागरिक अपने राज्य के समस्त आय और व्यय की जानकारी को समझना चाहता है, वह यह जानना चाहता है कि हमारा देश की आय क्या है और उसका इस पर कितना व्यय हो रहा है, जिसका कि उसको अधिकार है और ये हर नागरिक को चाहिए भी कि वह अपने राज्य द्वारा किए जा रहे हर तरह के राजनीतिक आय-व्यय को जाने, समझे और उसे किस तरह से किया जाए उस पर विचार करे। पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के राजनीतिक आय-व्यय के दृष्टिकोणों और उसके प्रतिमानों पर नज़र डालें तो वह हमें बताते हैं कि राजनीतिक आय-व्यय के समय हमको बार-बार इस बात का विचार करना चाहिए कि कौन सा देश और काल है? कौन मित्र है? हमारा आय-व्यय क्या है? हम कौन हैं तथा हमारी शक्तियाँ क्या हैं? इन बातों का निरन्तर विचार करने वाला राष्ट्र ही सदा विजयी एवं सफल होता है।
भारतवर्ष की बात करें तो इसका कारोबार बहुत पुराना है। दुनिया में सब लोग जब अच्छी तरह व्यापार करना न जानते थे तब से इसका उद्योग चल रहा है। अपनी उत्पत्ति तथा उनकी विशेषताओं के लिए वह बहुत दिनों से प्रसिद्ध रहा है, इसलिए इसकी साख सदैव बहुत ही मूल्यवान रही है। बहुत दिनों तक तो ज्ञान, विज्ञान, कला व कौशल आदि की उत्पत्ति पर एकाधिकार रहा और इस कारण वह दुनिया में सबसे अधिक धनवान ही नहीं प्रतिभावान भी समझा जाता था। व्यापार में 'एक बात' इसका गुण था जिसे इसने सत्य का ट्रेडमार्क दे रखा था, सहिष्णुता इसकी दूसरी विशेषता थी।
इधर कुछ सदियों से कारीगरों और प्रबंधकों में मन-मुटाव तथा भेद-भाव होने के कारण इसकी साख गिर गई और वह विदेशियों के हाथ में भी चली गई जिसने इसकी मशीनों को नष्ट करने और उनमें आमूल परिवर्तन करने का प्रयत्न किया। फलत: इसकी उत्पत्ति भी गिर गई तथा इनके स्टेंडर्ड में भी फर्क आ गया। पण्डित जी कहते हैं कि विकासोंमुख भारतीय अर्थनीति की दिशा की ओर संकेत अनेक बार किया जा चुका है। यह निश्चित है कि काफी लंबे अर्से से परागति की ओर जाने वाली व्यवस्था को प्रगति की दिशा में बदलने के लिए प्रयास करने होंगे क्योंकि स्वत: वह ह्रास से विकास की ओर नहीं मुड़ सकती। वास्तव में जब कोई व्यवस्था शिथिल हो जाती है तो उसके सुधार का सामर्थ्य उसमें स्वत: ही जाता रहता है। विकास की शक्तियों का प्रादुर्भाव होने एवं गति देने के लिए योजनापूर्वक प्रयास करने पड़ते हैं। स्वतंत्र देश के शासन के ऊपर स्वाभाविक रूप से यह जिम्मेवारी आती है।
अपने इस दायित्व का निर्वाह करने के लिए योजना और नीतियों के निर्धारण की आवश्यकता होती है। किंतु शासन कई बार ग़लती कर जाता है। वह अर्थ-व्यवस्था को गति देने के स्थान पर स्वयं ही उसका अंग बनकर खड़ा हो जाता है। इस प्रयास में उसे उन लक्ष्यों और उद्देश्यों का भी विस्मरण हो जाता है जिनको लेकर उसने अपने प्रयत्न प्रारंभ किए थे।
अर्थ-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन संपूर्ण जनता के नाम पर 'पीपुल्स डेमोक्रेसी' के नामाभिधान से तानाशाही रवैये और चाहे वह सही माने में प्रतिनिधि शासन हो, जनता का स्थान नहीं ले सकता। वह जनता का मार्गदर्शन कर सकता है, सहायक बन सकता है, उसका नियंत्रण कर सकता है, आदेश दे सकता है, उसे गुलाम बना सकता है। इनमें से उसे किस रूप में व्यवहार करना है इस पर ही उसकी योजनाओं की मर्यादाएँ और स्वरूप निर्भर करेंगे।
नीति और नियोजन
प्रजातंत्रीय देशों में शासन मौद्रिक एवं वित्तीय नीतियों, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियंत्रण आदि से अर्थ-व्यवस्था की गतिविधियों को ठीक रखता है। उनका नियोजन नीति-निधार्रण और बजट आदि तक सीमित रहता है। वे एक-एक क्षेत्र और एक-एक इकाई की गतिविधि की चिन्ता नहीं करते। इसे हम वृहत् आर्थिक नियोजन कह सकते हैं। इसके विपरीत जहाँ छोटे-छोटे लक्ष्यों का निर्धारण तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म आर्थिक गतिविधियों का नियोजन किया जाए उसे अणु-आर्थिक नियोजन कहेंगे। रूस दूसरी तरह की पद्धति का पालन करता है तो अमेरिका और ब्रिटेन पहली का। हमने दोनों का मेल बिठाने की कोशिश की है, किन्तु पूर्ण समाजवाद न होने के कारण दूसरा असफल होता है तो सार्वजनिक क्षेत्र का अत्यधिक विस्तार होने के कारण पहला प्रभावी नहीं हो पाता। इसलिए आवश्यकता है कि शासन अपने हाथ में बहुत ही थोड़े एवं अपरिहार्य उद्योग ले तथा शेष का नियंत्रणों के द्वारा नियमन करता चला जाए।

इन सबके अलावा पण्डित दीनदयाल उपाध्याय सदा इस बात पर ज़ोर देते रहते थे कि सब को काम’ ही भारतीय अर्थनीति का एकमेव मूलाधार है और साथ ही बजट व आगामी योजनाओं को तैयार करते समय प्रयास यह रहें कि सदन में लगभग मतैक्य की स्थिति बने। अपने राज्य की कुशल योजनाओं के निर्माण और समस्त लेखा-जोखों को खंगालने और आगामी नीतियों पर चर्चा के लिए विपक्ष के दृष्टिकोंण को भी राज्य के लिए दक्षिणतम कोने से नज़र डालनी होगी अन्यथा एक राष्ट्र के लिए बनी नीतियाँ जितनी बेमन और मतों के बिखराव के साथ शुरू होती हैं वो अपने गन्तव्य तक पहुंचते-पहुंचते लगभग पूरी तरह से बिखरी हुई ही मिलती है, जिसका परिणाम यह होता है कि हम जहाँ से शुरू हुए थे वहीं पर खड़े नज़र आते हैं और सिवाय अपव्यय के हमारे हाथ कुछ भी नहीं लगता। अतः राष्ट्र के राजनीतिक लेखे-जोखे के लिए यह भी आवश्यक है कि वह सर्वसम्मति से सभी पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए ही बने और इसके लिए सभी को एक राष्ट्र का समर्थन करना चाहिए।

Thursday, 11 February 2016

मेरा खुला पत्र...



हाल ही में दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय में हुई घटना को देखते हुए मेरा अनुमान है कि इस राष्ट्रविरोधी घटना के तार निश्चित रूप से हाफ़िज सईद से जुड़े हुए हैं। इससे पहले, जो छात्र इस घटना के सूत्रधार हैं उसके मास्टरमाइण्ड और अगुवा जिन्होने कुछ अति महत्वाकांक्षी और निरा स्वार्थी कथित विद्यार्थियों का जोकि युवा हैं, ब्रेनवॉश किया है उनके सम्पर्क भारत में छिपे स्लीपर सेल्स से हैं जो यहां बैठकर बड़ी आसानी से जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में पाकिस्तान के समर्थन में अपने प्रोजेक्ट ड्रॉ कर पाते हैं, और इसकी भी कड़ी अमेरिका सहित दुनिया के दूसरे कोनों में कश्मीर मुद्दे पर भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल संस्थाओं और लोगों से जुड़ी हो सकती है। कुल मिलाकर यह निश्चित है कि पूरा मामला वैश्विक पटल पर कश्मीर को लेकर भारत की छवि ख़राब करने की है जो ये दर्शाए कि पाकिस्तान तो मासूम है, असली ग़ुनहगार तो भारत है, तभी तो वहां के बड़े शैक्षिक संस्थानों से ही भारत विरोधी आवाज़े उठ रही हैं।
अब बात करते हैं निज जेएनयू की जहां ये घटना घटी। इस घटना ने ये तो साफ कर दिया है कि यहां दक्षिणी विचारधारा के लोग कितने मज़बूर और कमज़ोर हैं। जो कथित रूप से दक्षिणी विचारधारा से सम्बन्ध रखने वाले लोग भी है वो या तो असहाय हैं, शक्तिविहीन हैं या फिर वो मात्र राजनैतिक चमचागीरी के प्रयास में ही प्रयत्नशील रहते हैं, अन्यथा इस तरह की घटनाओं का मौका-ए-वारदात पर ही कड़ा विरोध होता है। लेकिन मैं इस बात से भी इन्कार नहीं करता कि जेएनयू में वामपंथियों का दबदबा है, जिनके चोले के भीतर ये राष्ट्रविरोधी तत्व फलते-फूलते हैं। ऐसे में वाम संगठनों को भी सचेत रहने की आवश्यकता है। जेएनयू में तो एक आम छात्र की बातें, उसके विचार और राय स्पष्ट ही नहीं हो पाते, अन्यथा इस घटना के तुरन्त बाद का नज़ारा ही कुछ और होता।
मैं अपने इस ख़ुले पत्र के सहारे हाफ़िज सईद, भारत में उसके स्लीपर सेल्स और जेएनयू में हंगामा काट रहे कुछ छुद्र खल युवक/युवतियों को ये चुनौती देता हूं कि अपनी यही हरक़तें आकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दिखाकर देख लो, प्रतिक्रिया का असली रस मिल जाएगा। फिर न तो विश्वविद्यालय इस घटना से जुड़ पाएगा और न ही उसे ज़रूरत ही पड़ेगी, न तो प्रशासन तक ये पहुंच पाएगा और भारतीय मीडिया तो इससे अस्पृश्य ही बनी रहेगी। यदि एक छात्र की हैसियत से तुमने आज़ादी मांगी तो एक छात्र के नाते ही वहां के आम विद्यार्थी तुम्हे आज़ादी भी दे देंगे क्यों कि वहां के हर छात्र के ख़ून में कुछ भी महसूस करने की अपार क्षमता है और वो उसकी प्रतिक्रिया भी देना जानते हैं। सब्र करो कि जेएनयू जैसी भौगोलिक स्थिति वहां नहीं है वरना हॉलैण्ड हाल, हिन्दू, केपीयूसी और ताराचंद जैसे छात्रावासों के छापामार युद्धों से तुम सब स्वतः ही प्राणों की दुहाई मांगोगे।
यद्यपि वामपंथ को संस्थागत रूप देने वाला इलाहाबाद किसी भी विचारधारा को अपने सिर पर चढ़कर मूतने की इजाज़त नहीं देता, तथापि ऐसी ज़ुर्रतों की जोहमत उठाने वाले लोग अपनी हरक़तें कर भी दें तो उसका परिणाम जेएनयू जैसा तो कतई ही नहीं होगा। हफ़्ते में तीन दफ़ा मांस, बीच में अण्डों की भरमार और इफरात भात का आहार लेकर, गांजे और कोकीन के मद में डूबे पिशाची हवस की भूख को मिटाने के बाद भी कुछ चंद दिशाहीन लोगों की जाने कौन सी ग़ुलामी है जिसके लिए उन्हें भारत के टुकड़े करके व पाकिस्तान की ज़िन्दाबादी और मुर्दाबाद भारत के अरमानों के साथ आज़ादी चाहिए, शायद जिसके लिए ये रात दिन ले के रहेंगे आज़ादी के राग अलापा करते हैं। यदि जेएनयू के छात्र चाहें जो फिलहाल चेऔर भगत सिंह को टी-शर्ट के सहारे अपने सीने से चिपकाए घूमते रहते हैं इन कुछ कथित परतंत्र लोगों को इनकी आज़ादी दे सकते हैं। बाक़ी आप लोगों की मर्जी विश्वविद्यालय का मुंह ताकते रहो, दिल्ली सरकार की ओर निहारो या केन्द्र सरकार की आशा में उम्र गुजारो। याद रखो साथियों खग समझे खग ही की भाषा यानी एक युवा ही इन युवाओं की बात समझ सकते हैं और अपने स्तर से ही इनको इन्ही की भाषा में भरपूर आज़ादी का स्वाद चखा सकते हैं आप, जैसा कि अन्य विश्वविद्यालयों में होता है। और हाँ, मीडिया की माया से भी दूर रहें तो बेहतर होगा, इससे अपने काम पर फोकस रहता है। कुछ करो यारो, सब्र बहुत कर लिया तुमने। इनकी आज़ादी का ख़्याल करो, ये जो बोल गए उसे समझो और उत्तर दो...       

Monday, 1 February 2016

कृषि, कृषक और पशुओं का चक्रण






हम जानते हैं कि भारत की आत्मा गांवों में निवास करती है। ऐसा यहां के ग्रामीण समाज के कारण है, जिसका मुख्य ध्रुव कृषि है। कृषि के साथ यहां का जन जुड़कर किसान बनता है और इनकी सुन्दरता ही ग्रामीण परिवेश को निखारती है। किन्तु यह भी ध्यान रहे कि यदि ग्रामीण समाज में कृषि प्रमुख है तो उस कृषि का केन्द्र पशु है। इसलिए कृषि के लिए और किसान के लिए भी पशुधन बहुत महत्वपूर्ण है। यानी जिस तरह से शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यक्रम के आपसी समन्वय के बिना किसी संश्लेषित ज्ञान की आकांक्षा नहीं की जा सकती है, ठीक उसी तरह से कृषि, कृषक और पशुधन के मेल और उसकी परस्परानुकूलता के बगैर एक सहज जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है और ये उम्मीद भी नहीं की जा सकती है कि इनमें से बगैर एक के भी किसी का भी कोई विशेष अस्तित्व ही है।
कृषि या खेती के लिए किसान जितना महत्वपूर्ण होता है उतना ही पशु भी महत्वपूर्ण होता है। एक किसान के लिए बिना पशुओं के अच्छी खेती की उम्मीद करना व्यर्थ है। ठीक ऐसे ही एक पशु के लिए भी कृषि या उसके तमाम आहार सम्बन्धी चीज़ों की पैदावार बिना कृषक के कहां सम्भव है। अतः कृषि, कृषक और पशुओं का एक ज़बरदस्त सहज व स्वाभाविक चक्रण होता है। इस चक्रण के मन्द होने पर अथवा कमज़ोर होने पर तीनों एक साथ समान ढंग से प्रभावित होते हैं। इसलिए यदि हम सोचें कि खेती में पैदावार की झार के लिए पशुओं का सहारा न लेकर बहुत ज़्यादा मशीनों और रसायनों पर निर्भरता बढ़ा ली जाए अथवा यदि किसान यह सोच लें कि पशुधन को नज़रअंदाज करके निकदा खेती पर ही ध्यान केन्द्रित कर लिया जाये तो स्वभावतः यह निश्चय मानिए कि कृषि, कृषक और पशुओं के इस चक्रण को कमज़ोर करने की दिशा में यह एक प्रयास होगा, और इस चक्रण का कमज़ोर होना न तो कृषि के हित में होगा और ना ही किसान के हित में। इसलिए हमें इस चक्र का संतुलन बनाकर ही चलना होगा और आज के परिप्रेक्ष्य में ख़ास तौर पर पशुपालन की ओर ध्यान देना बहुत ज़रूरी है क्योंकि लम्बे समय से पशुओं का नाता किसान और खेती दोनों से औसत दूर होता देखा गया है।
मानव हित के लिए पशुओं को पालने का मुद्दा मनुष्यों तथा पशुओं के बीच सम्बन्ध पर पशुओं की स्थिति तथा लोगों के दायित्व पर निर्भर करता है। हमने देखा है कि किसानों की देखभाल में रह रहे पशुओं को अनावश्यक रूप से कष्ट नहीं उठाना पड़ता है। हालांकि आज किसानी से पशुधन का तत्व लगभग नदारत सा हो रहा है। लोग मशीनों और रसायनों पर अधिक निर्भर होते चले जा रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उनके द्वारा त्वरित परिणाम की महत्वाकांक्षा होती है। लेकिन उनको नहीं पता है कि उनकी इस महत्वाकांक्षा ने कृषि, कृषक और पशुधन के प्राकृतिक चक्रण को नष्ट करने का प्रयास किया है, उनके द्वारा प्रकृति को चुनौती देने का प्रयत्न किया गया है। इसका परिणाम भी हमारे सामने है कि आज जबकि जनसंख्या इतनी अधिक बढ़ गयी है, कृषि के लिए रुचिकर लोग आपको ढूढ़ने से भी कम मिलेंगे और उसमें भी जो हैं उनमें वह कौशल अब नहीं रहा क्योंकि उनकी प्रकृति ही अब वह नहीं रही, यंत्रीकरण के भयानक दौर में उनमें वो क्षमताएं भी अब विलुप्त हो रही हैं। अब उनके शरीर में वह बल नहीं बचा, मौसम के अनुकूल काम करने की उनकी क्षमताएं भी नष्ट हो रही हैं और सबसे महत्वपूर्ण यह कि किसानी के लिए रह रहकर उनकी रुचियां भी डगमगाती नज़र आती रहती हैं। इन सबका एकमात्र कारण कृषि, कृषक और पशुधन के चक्र का कमज़ोर होना, उसका शिथिल होना है।

आज लोग भूलते जा रहे हैं कि पशु मनुष्य को मनुष्य से ही नहीं बल्कि प्रकृति से भी प्रेम करना सिखाता है। प्रकृति प्रदत्त समस्त चीज़ों से लगाव पैदा करता है पशुपालन। जैसे वनों में रहने वाले का प्रकृति के साथ एक आत्मीय लगाव हो जाता है, ठीक वैसे ही पशुओं के बीच रहने में भी उनसे आपका एक आत्मीय लगाव होता है। ये एक प्राकृतिक परम्परा है। इसे पशुओं के बीच रहने वाला ही समझ सकता है। वर्तमान समय में किसानों के पुनरोत्थान और ग्रामीण सशक्तिकरण के लिए तो पशुधन बहुत ही महत्वर्पूण है, क्योंकि ग्रामीण जीवन की धुरी यानी कृषि से पशुपालन या पशुओं का एक स्वाभाविक सम्बन्ध होता है।

यदि हम देखें तो कृषि उत्पादन के लिए जितनी भूमि की आवश्यकता है, पशुओं की आवश्यकता उससे कम नहीं है। बैलों द्वारा कृषि कार्य करना हमारी चिर पुरातन एवं दोषमुक्त परम्परा है। कृषि से उत्पादित खाद्य पदार्थों से लोगों का पेट भरकर उनकी भूख मिटती है और वे जीवित रहते हैं, अखाद्य कृषि पदार्थों की उपज से पशुओं का पेट भरता है, उनकी भूख मिटती है और इससे उन्हे जीवन-प्रवाह प्राप्त होता है। वस्तुतः पशुपालन भी जनजीवन का पूरक तत्व है।



जैविक प्रक्रिया है कृषिः

विराट पुरुष अर्थशास्त्री नाना जी देशमुख के विचारों को समझते हुए देखते चलें तो हमें वहां भी स्पष्ट होता दिखाई पड़ता है कि पश्चिम में जन्मी औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप गांवों की शहरीकरण की ओर उन्मुक्तता और खेती के मशीनीकरण की प्रक्रियाएं आरम्भ हुईं। वहां यंत्रशक्ति द्वारा ज़मीन की जुताई की जाने लगी। अधिक से अधिक अन्न उत्पादन की लालसा से कृत्रिम ख़ाद का आविष्कार हुआ। कृत्रिम ख़ाद के उपयोग से उत्पादन में वृद्धि हुई, इसलिए उसका उपयोग बढ़ता गया। पश्चिम का जीवन शहरी प्रधान होने के कारण नगरों की आवश्यकता पूर्ति को ही प्राथमिकता दी जाने लगी पश्चिम में पशुओं के विकास का मात्र इतना ही अर्थ रह गया कि नगरवासियों के लिए आधिकाधिक दूध एवं मांस कैसे उपलब्ध कराया जाए। कृषि का पूर्ण मशीनीकरण हो जाने के कारण बैलों का उपयोग मांस देने के अलावा कुछ नहीं रह गया यह बात तब किसी ने नहीं सोची कि फसलों के विकास की प्रक्रिया जैविक है। उन्हे यह मालूम होना चाहिए कि कृषि उत्पादन के लिए काम आई हुई भूमि की उपजाऊ शक्ति की क्षतिपूर्ति जैविक ख़ाद द्वारा ही सम्भव है। रासायनिक उर्वरक भूमि की उर्वरा-शक्ति नहीं बढ़ा पाते हैं, वह भूमि में उत्तेजना मात्र का निर्माण करते हैं। इससे कृषि उत्पादन में कुछ समय के लिए बढ़ोत्तरी अवश्य होती है, लेकिन ये प्राकृतिक उपजाऊ-शक्ति पुष्ट नहीं करते हैं। रासायनिक ख़ाद के लगातार प्रयोग से तथाकथित उन्नत देशों में लाखों एकड़ उपजऊ भूमि बंजर बन गयी है। इसलिए अब वही पश्चिमी देश रासायनिक ख़ाद का विकल्प खोजने में जुटे हैं। रासायनिक ख़ाद के लगाकार प्रयोग से फसलों पर रोगों का भी प्रकोप बढ़ता है। उससे बचने के लिए ज़हरीली दवाओं के छिड़काव की विधि अपनानी पड़ती है। लेकिन ये विषैली दवाएं केवल फसलों पर होने वाले कीटकों को ही नहीं नष्ट करतीं, बल्कि वे उनसे उत्पादित खाद्य पदार्थों का सेवन करने वाले लोगों को भी अपनी चपेट में ले लेती हैं। फलस्वरूप, जिन देशों में रासायनिक ख़ादों एवं कीटनाशक दवाओं का आविष्कार हुआ है, वहां के निवासी अब जैविक ख़ादों से उत्पादित खाद्य पदार्थों को ही खाना पसन्द करने लगे हैं। अब आधुनिक कृषि वैज्ञानिकों को भी महसूस होने लगा है कि भारत में जैविक ख़ाद पर आधारित परम्परागत कृषि-पद्धति ही अधिक वैज्ञानिक है और इसके लिए कृषि, कृषक और पशुओं का सुचक्र आवश्यक है।
वास्तव में कृत्रिम ख़ाद के पक्षधर पश्चिम के कृषि विशेषज्ञ यह देखकर हतभ्रत हैं कि कृत्रिम ख़ाद के उपयोग के कारण उनके यहां मिट्टी की उर्वरा शक्ति का तेज़ी से ह्रास हो रहा है जबकि भारत एवं चीन जैसे प्राचीन देशों में एक ही खेत में हज़ारों साल से खेती होने के बाद भी उर्वरा शक्ति कम नहीं हुई है। कई देशों के कृषि विशेषज्ञों ने भारत की परम्परागत कृषि पद्धति का सूक्ष्म अध्ययन भी किया है। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इसका श्रेय गोबर की प्राकृतिक ख़ाद एवं जुताई के लिए पशुओं के उपयोग को जाता है। इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि देश की तकरीबन 70-80 फीसदी कृषि भूमि का विकास मात्र देशी बैलों के अभाव में अवरुद्ध हुआ है।

पशु बनाम यंत्र-शक्तिः

किसी ने ठीक ही विचार किया है कि बैल हमारी खेती का धुरा है। ट्रैक्टर को लाकर हमने अपना सब महल ढहा लिया है। हालांकि नान जी का अर्थशास्त्री भी कहता है कि कुछ लोग मशीनों में अडिग श्रृद्धा रखते हैं जो भारत के खेतों में भी पश्चिम के तरीक़े से ट्रैक्टरों से कृषि के पक्षधर हैं, लेकिन भारत के लिए ट्रैक्टर आदि पूरी तरह से अनुपयुक्त हैं, क्योंकि पहले तो हमारे यहां खेत बहुत छोटे हैं और एक किसान की जोत भी इतनी कम है कि उसमें ट्रैक्टर नहीं चलाया जा सकता। चूंकि प्रायः ट्रैक्टर के लिए खेत बड़े किए जाते हैं और उनमें सामूहिक खेती के अवलम्बन का भी सुझाव दिया जाता है। इसलिए ट्रैक्टर की मांग पैदा की जाती है लेकिन सामूहिक खेती भारत के जन और भूमि के अनुपात, प्रजातंत्रीय पद्धति, बेकारी के निवारण, प्रति एकड़ अधिकतम उत्पादन, कृषि के मानकों के निर्धारण की असम्भवनीयता, किसान का भूमि प्रेम, और हमारे जीवन मूल्य इन सभी दृष्टियों से हमारे लिए अनुपयुक्त है। किन्तु यदि हम सामूहिक खेती को छोड़ भी दें तो भी हम भारत की जलवायु एवं भूमि में होने वाले मृदा अपरदन के कारण भी बहुत बड़े-बड़े खेत जिनमें ट्रैक्टर चलाए जा सकें नहीं रख सकते हैं। इसलिए भारत में कृषि के लिए पशु ही उपयुक्त हैं। हम भारत में कृषि, कृषक और पशुओं के समन्वय को बरकरार रखकर ही सही पद्धति से भारतीय कृषि परम्परा को परिभाषित कर सकते हैं। ऐसे में किसानों के पास पशुपालन एक सशक्त हथियार है।
वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था में एक किसान के लिए कृषि एवं पशुपालन दोनों का ही विशेष महत्व है। यही कारण हैं कि यदि कृषि क्षेत्र में हम 1-2 प्रतिशत की वार्षिक दर प्राप्त कर रहे हैं तो वहीं पशुपालन से 4-5 प्रतिशत। इस तरह से कृषि से सम्बद्ध पशुपालन व्यवसाय में ग्रामीणों को रोजगार प्रदान करने तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाने की अपार सम्भावनाएं हैं। साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि, किसान और पशुपालन का एक बेजोड़ बंधन भी है जो परस्पर एक-दूसरे पर आश्रित हैं और एक-दूसरे की उनन्ति में सहायक हैं।

डेयरी उत्पादः

सकल घरेलू कृषि उत्पाद में पशुपालन का 28-30 प्रतिशत का योगदान सराहनीय है, जिसमें दुग्ध एक ऐसा उत्पाद है जिसका योगदान सर्वाधिक है। भारत में विश्व की कुल संख्या का 15 प्रतिशत गायें हैं जिनसे देश के कुल दुग्ध उत्पादन का 43 प्रतिशत भाग प्राप्त होता है। वहीं 55 प्रतिशत भैंसें हैं जिनसे 53 फीसदी तक दूध प्राप्त होता है। इस तरह भारत लगभग 121.8 मिलियन टन दूध का उत्पादन करके विश्व में सर्वोच्च स्थान पर है जो कि एक मिसाल है। यह उपलब्धि पशुपालन से जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे मवेशियों की नस्ल, पालन-पोषण, स्वास्थ्य एवं आवास प्रबंधन इत्यादि में किए गये अनुसंधान एवं उसके प्रचार-प्रसार का परिणाम है।
इसके लिए स्तनधारी पशुधन का प्रयोग दूध के स्रोत के रूप में होता है, जिसे आसानी से संसाधित करके अन्य डेयरी उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे दही, पनीर, मक्खन, आइसक्रीम, केफीर अथवा क्यूमिस आदि। पशुओं से डेयरी उत्पादों को तैयार कर बेचने पर किसाम को मौद्रिक लाभ होता है जिससे प्राप्त धन को वह खेती में निवेश करते हैं। इस तरह से पशुओं से प्राप्त डेयरी उत्पादों का उपयोग कर किसान कृषि के लिए मौद्रिक रूप से सशक्त होता है, लेकिन इसके लिए उसका चक्रण भी मज़बूत होना परम आवश्यक है।

गोबरः एक अमूल्य उर्वरक

पशुओं का गोबर कृषि भूमि की उर्वरा शक्ति को सदैव बनाए रखने की क्षमता रखता है। वह फसल की जैविक प्रक्रिया को पुष्ट एवं संवर्धित करता है। पशु दूध दें या ना दें लेकिन प्रतिदिन भारी मात्रा में वह गोबर अवश्य देते हैं। उनके इस गोबर की कीमत निष्क्रिय पशुओं द्वारा खाए जाने वाले चारे और पानी से कई गुना अधिक होती है। वास्तव में पशुपालन को हम किसानों के घरेलू खाद का कारखाना भी कह सकते हैं। उसके लिए किसानों को अलग से कोई पूंजी नहीं लगानी पड़ती है। फलस्वरुप पशु किसान की समृद्धि के स्थायी साधन हैं।
खेती की उर्वरा शक्ति बढ़ाने एवं फसल के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराने में गोबर की खाद से अच्छा दूसरा कोई अन्य पदार्थ नहीं है। खेत में गोबर की खाद का प्रयोग किया गया हो तो उसमें उगने वाली फसलों पर साधरणतः कीटाणुओं का आक्रमण नहीं होता है। इसके बावजूद भी यदि किसी कारण से कीटाणुओं का प्रकोप हुआ भी तो दो से तीन प्रतिशत गो-मूत्र पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करने से फसलों को केवल कीटाणुओं के आक्रमण से होने वाले रोगों से ही मुक्ति नहीं मिलती है, बल्कि फसल पनपने में भी फसलों को सहायता मिलती है और उत्पादन भी बढ़ता है। पशुपालन खेतों की सभी आवश्यकताएं पूरी कर किसानों को हर प्रकार से आत्म-निर्भर बनाता है। उन्हें ट्रैक्टर या रासायनिक ख़ादों के लिए अतिरिक्त व्यय कर उद्योगपतियों पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं रहती। खेतों को तैयार करने के महत्वपूर्ण दिनों में डीज़ल पम्पों पर हफ़्तों तक लाईन लगाकर समय बर्बाद नहीं करना पड़ता है। धन व्यय करने की मुसीबत से छुटकारा मिलता है। फलतः किसानों के लिए ख़ुशहाली का मार्ग प्रशस्त होता है। साथ ही इससे बेकारी पर क़ाबू भी पाया जा सकता है।
इसके अलावा गोबर की ख़ाद का प्रयोग उसे खेतों में डाल कर फसल की पैदावार को बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह एक महत्वपूर्ण कारण है जिससे ऐतिहासिक रूप से पौधे तथा पालतू पशु एक-दूसरे से महत्वपूर्ण रूप से जुड़े हुए हैं। गोबर की ख़ाद का प्रयोग आग जलाने के लिए ईंधन के रूप में भी किया जा सकता है तथा पशुओं के रक्त व हड्डियों का प्रयोग भी उर्वरक के रूप में किया जाता है। इसके अतिरिक्त दीवालों तथा फर्शों के प्लास्टर के लिए भी किसान द्वारा गोबर को प्रयोग में लिया जाता है। ग्रामीण अंचल में अधिकांश मकान सीमेन्ट और पक्के फर्श के नहीं होते हैं। वहां फर्श और दीवारों की लिपाई-पुताई गोबर से की जाती है। इसके कारण घरों में कीटाणुओं का प्रकोप सम्भव नहीं होता। यदि घर में किसी प्रकार की दुर्गन्ध अनुभव हुई तो वह गोबर की पुताई से मिट जाती है। इस तरह से निष्क्रिय पशु भी किसानों से उत्तम जीवन के लिए उपयोगी हैं और यदि किसान का जीवन स्वस्थ और उत्तम रहेगा तो वह उत्कृष्ट कृषि का उत्पादन भी करेगा।

भूमि प्रबंधनः

पशुओं की चराई को कभी-कभी खर-पतवार तथा झाड़-झंखाड़ के नियंत्रण के रूप में प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए उन क्षेत्रों में जहां जंगल की आग लगती है, बकरियों तथा भेड़ों का प्रयोग सूखी पत्तियों को खाने के लिए किया जाता है जिससे जलने योग्य सामग्री कम हो जाती है तथा आग का ख़तरा भी कम हो जाता है। इसके अलावा यंत्रों की सहायता से कृषि कार्य करने से भूमि का क्षरण बहुत अधिक होता है, जबकि पशुओं के द्वारा यह समस्या नगण्य है।


खाद्य सुरक्षा में पशुपालनः

हरित क्रान्ति से पहले भारत में अनाजों का उत्पादन इतना ज़्यादा नहीं था। तब उस समय खाद्य सुरक्षा के लिए खाद्य के पहले विकल्प अनाज के बाद पशुओं से प्राप्त होने वाला दूध ही उपयोग में लाया जाता था, जिसको लोग अलग-अलग तरीक़ों से प्रयोग करते थे। आज जो लोग अपनी उम्र के छठवें-सातवें दशक में हैं वह ज़िक्र करने पर बताते हैं कि हम लोगों को तो बहुत लम्बे समय तक केवल दूध और घी ही खाकर रहना पड़ता था। पता चला कि अन्तिम समय में फसल ही नही हुई तो हम पूरी तरह से पशुओं के ऊपर ही आश्रित हो जाते थे। आज भी गांव और शहर दोनो जगहों पर लोग पशुओं से प्राप्त दूध और उससे सम्बन्धित अन्य उत्पादों को अपने एक समय के भोजन के तौर पर प्रयोग में लाते हैं। अतः आज भी किसान अपने भोजन का एक बड़ा हिस्सा पशुओं से प्राप्त करता है और बिना उस भोजन के वह अपने को बलिष्ट और कृषि के योग्य नहीं मानता है। इस तरह से खाद्य सुरक्षा में पशुपालन के योगदान से खेती के लिए किसान योग्य बनता है।

किसानों की दिनचर्याः

पशुपालन भारतीय ग्रामीण समाज की दिनचर्या का एक हिस्सा था जो किसानों को आलस्य से चंगुल से दूर रखता है। किसान सुबह उठकर पशुओं को चारा लगाता देता है, फिर उसका दूध निकालता है। उसे दोपहर में पशुओं को पानी दिखाना होता है तथा शाम का और अगले दिन का उनके लिए भोजन की व्यवस्था भी उन्हें करनी होती है। यानी किसान की पूरी दिनचर्या में पशुओं का एक बड़ा हिस्सा है अर्थात् उनकी पूरी दिनचर्या पशुओं को ही केन्द्र में रखकर बनी है। आज शहरों की बीमारियां गांवों तक पहुंच रही हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ही यही है कि अब गांव और शहरों की जीवनशैली में समानता आती जा रही है। गांव के किसानों की जीवनशैली से अब पशु बाहर होते जा रहे है।


यद्यपि पहले की अपेक्षा आज पशुपालन और खेती का सम्बन्ध निश्चित रूप से कमज़ोर हुआ है, किन्तु इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि इस सम्बन्ध की प्रासंगिकता ही समाप्त हो गयी है। आज का ही हम देखें तो वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून में काफी ज़्यादा अनियमितता आ गयी है। इस अनियमितता के कारण पता चलता है कि कभी बहुत ज़्यादा बारिश हो गयी, कभी बारिश ही नहीं हुई तो कभी-कभी बर्फीली बारिश भी हो जाती है। चूंकि भारत की कृषि पूरी तरह से प्रकृति पर ही निर्भर है। सिंचित क्षेत्र मात्र एक तिहाई ही है। तक़रीबन अस्सी फीसदी भाग सिंचाई को छूता हुआ नहीं है। ऐसे में जब किसान खेती करता है तो वह उन्नत बीजो का उपयोग करता है, मंहगे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का इस्तेमाल भी करता है और वह ट्रैक्टर से जुताई भी करवाता है। यानी वो एक मंहगी लागत के साथ अपने खेतों को तैयार करने के लिए उतरता है। अब ऐसी स्थिति में जब जलवायु परिवर्तन के कारण सही समय पर बारिश यदि नहीं हुई, जिसकी सम्भावना अधिक रहती है तो किसान हताश होता है और यह कोई मामूली हताशा नहीं होती है। इसमें किसान आत्महत्या तक की स्थिति में पहुंच जाता है।

अब ऐसे में प्रश्न उठता है कि किसान की इस हताशा को कैसे कम किया जा सकता है। तब इसका सबसे पहला हल यही है कि खेती में किसानों की लागत को कम किया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि उसके द्वारा मंहगे कीटनाशकों और रासायनिक ख़ादों की जगह जैविक ख़ाद का इस्तेमाल किया जाए। ट्रैक्टर, जिनमें मंहगे ईंधन आदि की अतिरिक्त लागत लगती है उसके स्थान पर जुताई आदि के लिए पशुओं का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। यानी हमें खेती में उपयोग होने वाली मौद्रिक लागत को कम करना है। चूंकि मौद्रिक लागत ज़्यादा न लगने से लाभ यह होगा कि यदि बारिश होती है तो किसानो के लिए अच्छा है, उनको लाभ ही होगा और यदि बारिश न भी हो तो कम से कम किसानों के पास से घर की पूंजी तो नहीं लगेगी अर्थात् यदि घर में अनाज आएगा नहीं तो कम से कम घर से अनाज जाएगा तो नहीं। ये पशुपालन के कारण एक बहुत बड़ा फायदा है। इसके अलावा किसानों की फसल के नष्ट होने का एक कारण कीटों का भी है। यह शिक़ायत अक्सर आती है कि इस दफा की पूरी फसल कीटों ने चट कर दी। ऐसे में यह ध्यान रखने योग्य होगा कि हम जितना ज़्यादा नाइट्रोजन का प्रयोग खेतों में करेंगें फसलों में कीट लगने की संभावनाएं उतनी ही अधिक होंगी। इसलिए जैविक या गोबर की ख़ाद ही एक कारगर विकल्प है। इससे फसलों को कीटों से बचाया जा सकता है। ध्यान रहे कि कृषि के लिए आवश्यक गोबर की खाद प्राप्त करने के लिए पशुओं की आवश्यकता होती है जो बिना किसानों के सहयोग से कृषि के लिए प्राप्त नहीं होगा। अतः भारतीय कृषि परम्परा को पुनः तेजोमय बनाने के लिए और उत्तम उत्पादन को प्राप्त करने के लिए हमें कृषि, कृषक और पशुओं के समीकरण का सन्तुलन अवश्य ही करना होगा।


Thursday, 28 January 2016

आईआईएमसीः स्वर्ण दीक्षांत



आईआईएमसी के 'स्वर्ण-बैच' का दीक्षांत समारोह होना सुनिश्चित हो गया है। लम्बे अरसे के बाद यह फैसला लिया गया है। प्रतीत होता है की आईआईएमसी के स्तम्भ इस क़दर कमज़ोर हो गए हैं कि अब इसे इतराना नहीं आता, उम्मीद है कि कोई सिकन्दर इसे अपना लक्ष्य भी बना बैठे।
आलम यह है कि एक तो इननी लतीफी के बाद दीक्षांत समारोह होना सुनिश्चित हो पाया हो, उसमें भी पंगु प्रशासन ने किसी क़ायदे के मुख्य अतिथि को आमंत्रित कर पाने में अपनी असफलता का परिचय दिया है। उम्मीद यह भी है कि शायद संस्थान में मतैक्य न होने से इसकी शक्तियां बिखरी पड़ी हैं, जिसका परिणाम हमारे सामने दिख रहा है कि जहां स्वर्ण दीक्षांत में माननीय प्रधानमंत्री या महामहिम राष्ट्रपति के बतौर मुख्य अतिथि आने के बजाय उसके मंत्रालय के एमओएस से ही काम चलाया जा रहा है, केन्द्रीय मंत्री तक भी अब इनकी संप्रेषण-शक्ति नहीं रही या फिर ये कहें कि हमने तो कहा था वो हमारी सुने ही नहीं। मुझे लगता है कि राज्यमंत्री भी शायद इसलिए चले आ रहे हैं कि उनका आवास वहीं पड़ोस में बसन्त कुंज में है वरना... हे भगवान!
बेहतर होता कि आप आईआईएमसी की धरोहर को ही तवज्जो देते। एमओएस से ठीक तो यही था कि आप हमारे किसी बेहतरीन पुरा छात्र को ही बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित कर लेते, विदित है कि संस्थान के पुरा छात्र इस पद को संभाल पाने में एक एमओएस से काफी खरे हैं। निश्चित है कि यह स्वर्ण-बैच अपने अभिभावक से यह सम्मान पाकर गर्व का अनुभव करता। लेकिन आपने तो ऐसी स्तरहीनता दिखाई है कि मन खिन्न हो गया है। उत्साह जाने किस लोक में जा दुबका है कि उसे ढूढ़ने जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पा रहे हैं हम।
यही प्रक्रिया होती है किसी संस्थान की गुणवत्ता और उसके अतीत या वर्तमान के उन्माद पर दीमक लगने की। ज़िम्मेदार कौन-कौन..?? आत्म मन्थन का वक़्त शेष है।
सादरः एक आईआईएमसिएन।


Tuesday, 19 January 2016

उभरती अयोध्या का आग़ाज़


अयोध्या.. यानी श्री राम जन्मभूमि स्थल। जी हाँ, यद्यपि श्री राम की जन्मस्थली अयोध्या आए दिन चर्चा और विवादों का विषय बनी रहती है। तथापि यह व्यक्तिगत मेरे लिए किसी विवाद का विषय नहीं है और न ही हो सकता है। प्रमाण स्वरूप मैने आलेख के आरम्भ में ही अयोध्या को श्री राम जन्मभूमि स्थल मान लिया है। वास्तव में कथित श्री राम जन्मभूमि विवाद ठीक उसी तरह है जैसे इस बात को सिद्ध करना हो कि तुम्हारा बाप कौन है और तुम घर के किस स्थान/कमरे में पैदा हुए थे, जबकि तुम्हारी माता और वह घर सब कुछ सप्रमाण सुरक्षित हो और जानबूझ कर आवश्यक कार्यवाई या प्रक्रियाबद्ध जांच न की जाए जो कि सरलतम प्रक्रिया का हिस्सा है। सारशः यह सिद्ध करना ही अपने आप में दकियानूसी फसाद है। श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के निर्माण का विवाद भी ऐसा ही दकियानूसी फसाद है।
वास्तव में मन्दिर निर्माण के साथ ही हमारी पारम्पिक शिक्षा व्यवस्था, योग व आध्यात्म आदि की व्यवस्था दुबारा स्थापित हो सकेगी। हांलाकि मन्दिरों को नष्ट करने के पीछे संस्कृति विनष्ट करने की मुस्लिम आक्रान्ताओं की चेष्ठा थी। फिर भी आख़िरकार यह विवाद छिड़ा ही सही, तब भी इसका निबटारा जाने कब के हो जाता, लेकिन इससे जुड़े तमाम पक्ष, विपक्ष और ढेरों वैधानिक व गैर-वैधानिक या कथित भावनाओं से लब्धप्रद जनों की बदौलत यह विवाद आज तक विवाद ही बना रहा, इसमें मुस्लिम समुदाय से ज़्यादा इस विवाद को बढ़ाने में तथाकथित सेक्युलरों की भूमिका अव्वल रही है।
इस श्री राम जन्मभूमि मन्दिर विवाद के मूल इतिहास पर एक नज़र डालें तो हमें साफ़ दिखता है कि सन् 1527 ई. में मुस्लिम शासक बाबर फरगना से भारत आया था। उसने चित्तौड़गढ़ के हिंदू राजा राणा संग्राम सिंह को फ़तेहपुर सीकरी में परास्त कर दिया। बाबर ने अपने युद्ध में तोपों और गोलों का इस्तेमाल किया। जीत के बाद बाबर ने इस क्षेत्र का प्रभार मीर बांकी को दे दिया, जो बाबर की सेना का कमॉण्डर इन चीफ़ भी था। मीर बांकी ने उस क्षेत्र में मुस्लिम शासन लागू कर दिया। उसने आम नागरिकों को नियंत्रित करने के लिए आतंक का सहारा लिया। मीर बांकी सन् 1528 ई. में अयोध्या आया और राज्य के प्रतीक एवं प्रजा की आस्था के केन्द्र श्री राम मंदिर को तोड़कर मस्ज़िद बनवाया।
इससे पहले मस्ज़िद में नमाज अता करने वाले मुसलमानों का भारत में कोई और इतिहास व प्रमाण है ही नहीं। यानी यदि यह प्रमाण हो कि यहां श्री राम जन्मभूमि मन्दिर था तो फिर इस मस्ज़िद सहित तमाम मस्ज़िदों पर प्रश्न चिह्न तो खड़ा ही हो सकता है। मीर बांकी का इतिहास तो सबके सामने ही है। इसके अलावा जितने भी मध्यकाल के इतिहासकार हैं वो सभी एक स्वर में ये कहते हैं कि यहां श्री राम जन्मभूमि में जो बाबरी मस्ज़िद बनाई गई है वो मन्दिर को तोड़ कर बनाई गई है। और पहला सर्वे जो अंग्रज़ों के द्वारा हिन्दुस्तान में किया गया वो सन् 1838 ई. में मार्ट गुमरी ने सर्वे जनरल ऑफ़ इण्डिया के नाम से किया था, जिसमें उन्होने अयोध्या को भारत की कुछ प्रमुख नगरियों में शामिल किया है और श्री राम जन्मभूमि मन्दिर की भव्यता का वर्णन करते हुए उसके तमाम प्रमाण दिए हैं। साथ ही नवजीवन के भीतर गांधी जी ने भी इन तमाम मस्ज़िदों को जो मन्दिरों को तोड़कर बनाई गई हैं उन्हें मुग़ल काल की ग़ुलामी का प्रतीक मानते हैं। और इसके अलावा भी जिसे अन्य तमाम प्रमाणों का अम्बार चाहिए तो वह अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ या फिर विश्व हिन्दू परिषद से निजी तौर पर प्रमाण मांग सकता है। ज़ाहिर है कि तब ऐसे में अयोध्या में किसी कथित बाबरी मस्ज़िद का प्रश्न ही नहीं है।
वास्तव में यही कारण रहे होंगे कि हमें 20वीं शताब्दी के अन्तिम दशक की शुरुआत के पहले-पहले भारतीय अस्मिता और सनातन संस्कृति के केन्द्र अयोध्या पर अवस्थित श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के पुनर्जागरण हेतु लोगों के मन में उपज रही चेतना के प्रमाण भी मिलने शुरू हो गए थे, जब 30 जनवरी 1990 को हज़ारों रामभक्तों ने मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खड़ी की गई अनेक बाधाओं को पार कर अयोध्या में प्रवेश किया और विवादित ढांचे के ऊपर भगवा ध्वज फहरा दिया। इसके बाद 2 नवम्बर 1990 को मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, जिसमें कोलकाता के राम कोठारी और शरद कोठारी (दोनों भाई) सहित अनेक रामभक्तों ने अपने जीवन की आहुतियां दे दीं।
इन सबके परिणाम स्वरूप समय आया था एक ऐतिहासिक रैली का जब 4 अप्रैल 1991 को दिल्ली के वोट क्लब पर अभूतपूर्व रैली हुई। इसी दिन तब तक कारसेवकों के हत्यारे समझे जाने वाले उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस्तीफा दिया था। मुलायम सिंह के इस्तीफ़े के बाद श्री राम भक्तों के हृदय में उल्लास का भाव पैदा हो गया था और सितम्बर, 1992 में भारत के गांव-गांव में श्री राम पादुका पूजन का आयोजन किया गया और गीता जयंती (6 दिसम्बर 1992) के दिन रामभक्तों से अयोध्या पहुंचने का आह्वान किया गया। फलस्वरुप लाखों राम भक्त 6 दिसम्बर को कारसेवा हेतु अयोध्या पहुंचे और श्री राम जन्मस्थान पर बाबर के सेनापति द्वारा बनाए गए अपमान के प्रतीक मस्ज़िदनुमा ढांचे को ध्वस्त कर दिया।
निःसंदेह हमारे सुशासन और एकता के प्रतीकों के पुनरुद्धार के लिए जब-जब चेतना जन्म लेती है तो कुछ बिखराव अवश्य होता है, क्योंकि हमारे समाज में उन ग़ुलामियों के पैरौकार भी कुछ हद तक ज़रूर बसे होते हैं, शायद जिन्हें अपनी जड़ों से स्नेह नहीं होता है। लिहाजा अब आज स्थित यह है कि हिन्दू समाज के लोग एवं अधिग्रहण की मानसिकता से परे अपने प्रतीकों को पहचानने वाले कथित मुसलमानों का एक बड़ा समुदाय बाबर के उस आतंक के प्रतीक को समाप्त कर पुनः श्री राम मन्दिर के भव्य निर्माण की मंशा रखता हैं और रही बात अयोध्या में मुसलमानों के नमाज अता करने की तो उसके लिए भी यह राष्ट्रवादी भावों से भरा मंतव्य यह मनन करता है कि भारत का एक भी मुसलमान भारतीय माटी को हड़प कर बनाए गए मस्ज़िद में अपनी नमाज नहीं पढ़ेगा। इसलिए भारतीय ख़ुशबू को महसूस करने वाले मुसलमानों के लिए भी श्री राम मन्दिर निर्माण के लिए आगे आने वाले कंधे सरयू नदी के उस पार अपने हाथों से पाक मस्ज़िद का निर्माण करवाएंगे और उसी में हमारे मुसलमान अपनी नमाजें अता करेंगे न कि बाबरी में। इसके अलावा भी इस्लाम स्वयं बाबरी मस्ज़िद को नापाक और नमाज अता न करने योग्य स्थल मानता है क्योंकि इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार ज़ोर-ज़बरदस्ती से प्राप्त की गई भूमि पर पढ़ी गई नमाज अल्लाह स्वीकार नहीं करते हैं और न ही ऐसी सम्पत्ति अल्लाह को समर्पित (वक़्फ) की जा सकती है। किसी मन्दिर को विध्वंस करके उसके स्थान पर मस्ज़िद के निर्माण करने की अनुमति कुरआन व इस्लाम की मान्यताएं नहीं देती। यानी आप जब तक भूमि के स्वामी नहीं हैं तब तक कोई भी भूमि किसी को कैसे सौंप सकते हैं। बाबर भूमि का स्वामी नही रहा है। इसलिए वह भूमि जिस पर मस्ज़िदनुमा ढांचा (बाबरी) बना है, उसे उसके मूल रूप को प्राप्त करना ही होगा।
लेकिन संकट यहां हैं कि इसे दकियानूसी चोला पहनाकर कोर्ट और मुक़दमेबाजी के फेर में उलझा दिया गया है जो अपने आप में दुनिया का एक रोमांचक मुक़दमा बन गया है। इसके केस पर दृष्टिपात करके देखें तो अब तक मिली सूचना के अनुसार अयोध्या पर मुक़दमा 60 साल से अधिक समय तक चला। माना जा रहा है कि यह अपने आप में पहला ऐसा संवेदनशील मुक़दमा रहा जिसको निपटाने में इतना लम्बा समय लगा। इसमें कुल 82 गवाह पेश हुए। हिन्दू पक्ष की ओर से 54 गवाह और मुस्लिम पक्ष की ओर से 28 गवाह पेश किये गये। हिन्दुओं की गवाही 7128 पृष्ठों में लिपिबद्ध की गयी जबकि मुसलमानों की गवाही 3343 पृष्ठों में कलमबद्ध हुई। पुरातात्विक महत्व के मुद्दों पर हिन्दुओं की ओर से चार गवाह और मुसलमानों की ओर से आठ गवाह पेश हुए। इस मामले में हिन्दू पक्ष की गवाही 1209 तथा मुस्लिम पक्ष की गवाही 3211 पृष्ठों में दर्ज की गयी। हिन्दुओं की ओर से अन्य सबूतों के अलावा जिन साक्ष्यों का संदर्भ दिया गया उनमें अथर्ववेद, स्कन्द पुराण, नरसिंह पुराण, बाल्मीकि रामायण, रामचरित मानस, केनोपनिषद और गजेटियर आदि हैं। मुस्लिम पक्ष की ओर से राजस्व रिकार्डों के अलावा बाबरनामा, हुमायूंनामा, तुजुक-ए-जहांगीरी, तारीख़-ए-बदायूंनी, तारीख़-ए-फ़रिश्ता, आइना-ए-अकबरी आदि का हवाला दिया गया। पूरा फैसला 8189 पृष्ठों में समाहित है। फिर भी इसका केस अभी करीब 60 सालों (ज़िला न्यायलय में 40 साल और उच्च न्यायलय में 20 साल) के बाद भी मुसलिमों द्वारा चुनौती देने के बाद उच्चतम न्यायलय में पिछले पांच सालों से भी अधिक समय से अंटका पड़ा है।
बावजूद इसके भी यदि हम श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के वर्तमान स्वरूप को निहारें तो यह स्थिति है कि आज इसके वर्तमान स्वरूप में कारसेवकों द्वारा तिरपाल की मदद से अस्थायी मंदिर का निर्माण किया गया। यह मंदिर उसी स्थान पर बनाया गया है जहां ध्वंस से पहले श्री रामलला विराजमान थे। श्री पी.वी.नरसिंह राव के नेतृत्व वाली तत्कालीन केन्द्र सरकार के एक अध्यादेश द्वारा श्रीरामलला की सुरक्षा के नाम पर लगभग 67 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई। यह अध्यादेश संसद ने 7 जनवरी 1993 को एक कानून के जरिए पारित किया था। इसे पहले ही भक्तों द्वारा श्री रामलला की दैनिक सेवा-पूजा की अनुमति दिए जाने के संबंध में अधिवक्ता श्री हरिशंकर जैन ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की। 1 जनवरी 1993 को अनुमति दे दी गई। तब से दर्शन-पूजन का क्रम लगातार जारी है।
चूंकि 7 जनवरी 1993 को तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा ने संविधान की धारा 143(ए) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय से अपने एक प्रश्न का उत्तर चाहा था। उनका प्रश्न था कि अयोध्या में बाबरी मस्ज़िद जिस स्थान पर खड़ी थी, उस स्थान पर इसके निर्माण के पहले कोई हिन्दू धार्मिक भवन अथवा कोई हिन्दू मन्दिर था, जिसे तोड़कर वह ढाँचा खड़ा किया गया?”
सर्वोच्च न्यायालय ने उपर्युक्त प्रश्न पूछने का कारण सरकार से जानना चाहा था, तब भारत सरकार के सॉलिसीटर जनलर ने 14 सितम्बर 1994 को एक शपथ-पत्र के माध्यम से केस [(1994) 6 SCC 383: इस्माईल फ़ारुखी बनाम भारत सरकार] के हवाले से कहा था कियदि महामहिम राष्ट्रपति द्वारा पूछे गए प्रश्न का उत्तर सकारात्मक आता है अर्थात् एक हिन्दू मन्दिर/भवन को तोड़कर विवादित भवन बनाया गया था तो भारत सरकार हिन्दू समाज की भावनाओं के अनुसार कार्य करेगी। यदि इसके विपरीत प्रश्न का उत्तर नकारात्मक आता है अर्थात् कोई हिन्दू मन्दिर/भवन सन् 1528 ई. के पहले वहां था ही नहीं तो भारत सरकार का व्यवहार मुस्लिम समाज की भावनाओं के अनुसार होगा।
सर्वोच्च न्यायलय ने इसकी करीब 20 महीने सुनवाई की और 24 अक्टूबर 1994 को अपने निर्णय में कहाइलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ विवादित स्थल के स्वामित्व का निर्णय करेगी और राष्ट्रपति द्वारा दिए गए विशेषरेफरेंस का जवाब देगी। लिहाजा लखनऊ खण्डपीठ में तीन न्यायमूर्तियों की पूर्ण पीठ ने 1995 में मामले की सुनवाई की। मुद्दों का पुनर्नियोजन किया गया। मौखिक साक्ष्यों को रिकॉर्ड करना शुरू किया गया। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए अगस्त, 2002 में राष्ट्रपति के विशेष रेफरेंस का सीधा जवाब तलाशने के लिए उक्त पीठ ने उक्त स्थल पर ग्राउण्ड पेनेट्रेटिंग रडार सर्वे का आदेश दिया जिसे कनाडा से आए विशेषज्ञों के साथ तोजो विकास इंटरनेशनल द्वारा किया गया। अपनी रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने ध्वस्त ढांचे के नीचे बड़े क्षेत्र तक फैले एक विशाल ढांचे के मौजूद होने का उल्लेख किया जो वैज्ञानिक तौर पर साबित करता था कि बाबरी ढांचा किसी खाली जगह पर नहीं बनाया गया था, जैसा कि सुन्नी वक़फ बोर्ड ने दिसम्बर, 1961 में फैजाबाद के दीवानी दंडाधिकारी के सामने दायर अपने मुक़दमे में दावा किया है। विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक उत्खनन के जरिए जीपीआरएस रिपोर्ट की सत्यता हेतु अपना मंतव्य भी दिया।
सिर्फ़ इतना ही नहीं सन् 2003 में उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को वैज्ञानिक तौर पर उस स्थल की खुदाई करने और जीपीआरएस रिपोर्ट को सत्यापित करने का आदेश दिया। अदालत द्वारा नियुक्त दो पर्यवेक्षकों (फैजाबाद के दो अतिरिक्त ज़िला दंडाधिकारी) की उपस्थिति में खुदाई की गई। संबंधित पक्षों, उनके वकीलों, उनके विशेषज्ञों या प्रतिनिधियों को खुदाई के दौरान वहां बराबर उपस्थित रहने की अनुमति दी गई। निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आदेश दिया गया कि श्रमिकों में 40 प्रतिशत मुस्लिम होंगे। परिणाम यह आया कि फोटोग्राफी रिपोर्ट और उत्खनन रिपोर्ट दोनों ने ही ढाँचे के नीचे एक विशाल हिन्दू मन्दिर होने की बात स्वीकार की। इन्ही वैज्ञानिक रिपोर्टों के आधार पर न्यायाधीशों ने लिखा है कि-

विवादित ढाँचा किसी पुराने भवन को विध्वंस करके उसी स्थान पर बनाया गया था। पुरातत्व विभाग ने यह सिद्ध किया है कि वह पुराना भवन कोई विशाल हिन्दू धार्मिक स्थल था।
(न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा)

तीन गुम्बदों वाला वह ढाँचा किसी खाली पड़े बंजर स्थान पर नहीं बना था बल्कि अवैध रूप से एक हिन्दू मन्दिर/पूजा-स्थल के ऊपर खड़ा किया गया था।
(न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल)

प्रत्यक्ष साक्ष्यों के आधार पर यह सिद्ध नहीं किया जा सका कि निर्मित भवन सहित सम्पूर्ण विवादित परिसर बाबर अथवा इस मस्ज़िद को निर्माण कराने वाले व्यक्ति अथवा जिसके आदेश से यह भवन बनाया गया, उसकी सम्पत्ति है।
(न्यायमूर्ति एस. यू. ख़ान)

उक्त तीनों माननीय न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि जो विवादित ढांचा था वह एक बड़े भग्नावशेष पर खड़ा था। न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि वह 12वीं शताब्दी के श्री राम मंदिर को तोड़कर बनाया गया था, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि वह किसी बड़े हिन्दू धर्मस्थान को तोड़कर बनाया गया और न्यायमूर्ति ख़ान ने कहा कि वह किसी पुराने ढांचे पर बना। इसके अलावा न्यायमूर्ति ख़ान का उक्त निष्कर्ष विवादित भवन के वक़्फ होने पर भी प्रश्न चिह्न लगाता है।
इसलिए अब श्री राम मन्दिर के निर्माण में हो रही देरी को देखते हुए पुनः जनजागरण हेतु 30 मई 2013 को सन्तों का प्रतिनिध मण्डल भारत के महामहिम राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी से मिला और उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ द्वारा 30 सितम्बर 2010 को दिए गए निर्णय से अवगत कराया। जिसमें न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने स्पष्ट लिखा है कि विवादित स्थल ही भगवान राम का जन्मस्थान है। जन्मभूमि स्वयं में देवता है और विधिक प्राणी है। जन्मभूमि का पूजन भी रामलला के समान ही दैवीय मानकर होता रहा है और हर समय होता रहता है और यह भाव किसी भी व्यक्ति को किसी भी रूप में भक्त की भावनाओं के अनुसार प्रेरणा प्रदान करता है। देवत्व का यह भाव निराकार में भी हो सकता है।
न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि हिन्दुओं की श्रृद्धा व विश्वास के अनुसार विवादित भवन के मध्य गुम्बद के नीचे का भाग भगवान श्री राम की जन्मभूमि है।
वहीं न्यायमूर्ति एस.यू. ख़ान ने स्पष्ट किया कि यह घोषणा की जाती है कि आज अस्थाई मन्दिर में जिस स्थान पर रामलला का विग्रह विराजमान है वह स्थान हिन्दुओं को दिया जाएगा।
यद्यपि मुस्लिम नेताओं ने भारत सरकार द्वारा जारी किए गए श्वेत पत्र में क्रमांक 2.1, 2.2 व 2.3 के अनुसार सरकार को वचन दिया था कि ..यदि मन्दिर तोड़कर मस्ज़िद बनाने की बात सही पाई जाती है तब मुस्लिम स्वेच्छा से इस विवादित स्थल को हिन्दुओ को सौंप देंगे। जबकि मुस्लिम अगुवाकारों ने इसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के द्वारा 30 सितम्बर 2010 को दिए गए फैसले के बाद पुनः सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे डाली। इसके अलावा उन्होने न सिर्फ़ चुनौती दी बल्कि कहा कि कोर्ट का फैसला हमारे पक्ष में नहीं आता तो भी हम देख लेंगें। हांलाकि इन्हें चाहिए यह था कि मुस्लिम समाज अपने द्वारा सरकार को दिए गए वचन का पालन कैसे करे इस पर विचार करें और स्वेच्छा से यह स्थान हिन्दू समाज को सौंप दें एवं भारत सरकार भी अपने शपथ-पत्र का पालन करे और जन-भावनाओं का आदर करते हुए सम्पूर्ण 70 एकड़ भूमि श्री राम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण हेतु हिन्दू समाज को सौंप दें। लेकिन सितम्बर 2010 के फैसले के बाद न तो सरकार ने इस मामले का संज्ञान लेकर न्यायलय को चेताया और न स्वयं न्यायालय ने ही इसे राष्ट्रहित में ध्यान रखकर इसका जल्द निपटारा किया। लिहाजा अयोध्या के उभरने का अभी इंतज़ार बाकी ही था।

परिणाम स्वरूप वास्तव में उभरती अयोध्या के आग़ाज़ का स्वर्णिम समय हाल ही में देखने को मिला जब दिनांक 9 व 10 जनवरी 2016 को अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय में श्री राम जन्मभूमि मन्दिरः उभरता परिदृश्य विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गयी। इस संगोष्ठी की प्रस्तावना अनुसंधान पीठ के संयोजक डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह के द्वारा रखी गई। उन्होने कहा कि नीतियों के निर्माण के कार्य पूरी तरह से शासन या राज्य के कंधों पर ही नहीं छोड़ देने चाहिए। इस काम को शासन या राज्य के साथ-साथ विश्वविद्यालयों के विद्वानों एवं शोधार्थियों को भी करना होगा।
इसीलिए अबकी बार इस श्री राम जन्मभूमि मुद्दे पर पहली बार साफ़ तौर पर यह देखने को मिलता है कि इसकी प्रक्रिया को संस्थागत रुप दे दिया गया है, जो कि एक बौद्धिक राष्ट्र के लिए आवश्यक था। इस मुद्दे को संस्थागत रूप देने से निश्चित है कि अब तक इस पर होने वाली राजनीति पर भी काफ़ी हद तक अंकुश लग सकेगा। इस पर पीठ का भी साफ़ कहना है कि श्री राम जन्मभूमि का प्रकरण एक राष्ट्रीय मुद्दा है। शताब्दियों से यह भारतीय समाज को प्रभावित करता रहा है। विगत तीन दशकों से भारत की समाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना व्यापक रूप से इससे प्रभावित रही है। हम विरोध करने वालों से पूछना चाहते हैं कि ऐसे मुद्दे के ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं विविध पहलुओं की चर्चा यदि विश्वविद्यालयों में नहीं हो सकती तो और कहाँ होगी?


ये एक तथ्यपरक ऐतिहासिक, पुरातात्विक और विधि विषयों पर एकेडमिक संगोष्ठी थी। मुझे बड़ा आश्चर्य है जैसे इसका कुछ विरोधी वाम छात्र संगठनों ने विरोध किया और नारेबाजी की, लिहाजा हमें एक बड़ी सुरक्षा घेरे में इसे सम्पन्न करना पड़ा। जब कि यही लोग इससे पूर्व में दिल्ली विश्वविद्यालय में बटला हाउस एनकाउंटर में संसद जैसे हमले के संदिग्ध गिलानी को बुलाकर सेमिनार आयोजित करते हैं और उसमें महेश चंद्र शर्मा शहीद नहीं है ऐसा कहा जाता है, साथ ही आतंकवादियों को सम्मानित व्यक्ति बताया जाता है। एक अन्य सेमिनार में कहा जाता है कि हिन्दुस्तान की सेना दुनिया की सबसे क्रूरतम सेना है। यहाँ ऐसे सेमिनार आयोजित होते हैं जो सीधे देश के संविधान को ही नहीं देश की एकता और अखंडता को नष्ट करने की बात करते है, लेकिन विश्वविद्यालय में श्री राम जन्मभूमि के उभरते परिदृश्य विषय पर केंद्रित सेमिनार का विरोध हो रहा है। राष्ट्र के मानक इस तरह बदलना दुर्भाग्यपूर्ण है।
अजीत प्रताप सिंह
शोधार्थी, अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ


अपनी संस्थागत बहसों और विधायी शस्त्रों से युद्ध लड़ने के लिए विख्यात डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी इस पीठ के अध्यक्ष हैं। पीठ के संयोजक डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह और अध्यक्ष डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी की जुगलबंदी ही इस दफ़ा उभरती अयोध्या के आग़ाज़ के मुख्य नायक के तौर पर सामने आए हैं। हांलाकि एक बड़े विरोध के बावजूद इस संगोष्ठी में कुल 3200 लोग दिल्ली विश्वविद्यालय में शामिल हुए थे, जिनमें से देशभर के तमाम विश्वविद्यायों से 525 शिक्षक एवं शोधार्थियों ने भाग लिया। 26 लोगों को समयाभाव के बावजूद भी अपने शोधपत्र प्रस्तुत करने का मौका मिला। वास्तव में इस तरह की संस्थागत संगोष्ठियों में सहमत और असहमत दोनों पक्षों के लोगों को अवश्य भाग लेना चाहिए ताकि किसी संश्लेषण की प्रप्ति की जा सके।
वास्तव में संगोष्ठी कई मायनों में ऐतिहासिक व लाभदायक रही। इस संगोष्ठी के दूसरे दिन के प्रथम सत्र उत्खनन एवं पुरातात्विक साक्ष्य में विषय का प्रतिपादन करते हुए अधिवक्ता श्री मदनमोहन पाण्डेय ने जीपीआरएस रिपोर्ट, आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया, कार्बन डेटिंग की रिपोर्टों द्वारा प्राप्त निष्कर्षों को सामने रखते हुए यह बताया कि ध्वस्त मन्दिर के अवशेष 10वीं सदी या उससे पहले के हैं। उत्खनन के दौरान उत्तर दिशा से प्राप्त गोलाकार लाईन की बात हो या कसौटी पीलर आदि अवशेषों से प्राप्त निष्कर्षों को सामने रखते हुए उन्होंने उपरोक्त स्थान पर एक भव्य मन्दिर होने के प्रमाण को पुष्ट किया। पुरातत्वविद् एवं छत्तीसगढ़ सरकार के पुरातात्विक सलाहकार डॉ. अरुण कुमार शर्मा ने स्पष्ट किया कि विवादित ढाँचा मस्ज़िद होने के लिए आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता था। न तो वहाँ मीनारें थीं और न ही वहाँ वजू करने का स्थान या टैंक ही था। विवादित ढाँचे में पाए गए स्थापत्य भी हिन्दू मन्दिर होने के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। शिलालेख के अनुवादित पाठ को स्पष्ट करते हुए शर्मा जी ने बताया कि विवादित स्थान पर 11वीं सदी के गहड़वाल वंश के राजा ने मन्दिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
सच्चाई यह है कि उक्त प्रमाण-खण्ड प्रमाण के तिनके मात्र हैं। वास्तव में जो भी जन इस संगोष्ठी का हिस्सा रहा है उसने प्रमाणों का दरिया देखा है। तो अब सवाल यह है कि आख़िरकार इतने प्रमाणों के साक्ष्य होते हुए भी फिर श्री राम मन्दिर का भव्य निर्माण अब तक क्यूं नहीं हो सका। निःसंदेह अब तक इस पर भारी राजनीति हुई है और आगे भी होने की सम्भावना है। प्रमाण देखिए, संगोष्ठी के सम्पन्न होने के महज चौथे दिन ही अवस्थित अरुंधती अनुसंधान पीठ के पड़ोसी ज़िले फ़तेहपुर के जहानाबाद क़स्बे में जो कि खाद्य एवं प्रसंस्करण राज्य मंत्री निरंजन ज्योति का संसदीय क्षेत्र है और जहानाबाद क़स्बे में ही उनका निवास स्थान भी है, मकर संक्रन्ति के अवसर पर श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के प्रारूप की शोभायात्रा निकल रही थी और उस पर मुसलमानों ने पत्थरबाजी कर दी जिससे दंगा भड़क गया। परिणामतः कुछ दुकानें और गाड़ियाँ आगजनी का शिकार भी हुईं। यह कोई स्वाभाविक घटना नहीं थी। जानकार इसे पूर्णतः राजनीति से प्रेरित मानते हैं। माने मन्दिर पर फिर से राजनीति। ये घटना उत्तर प्रदेश सरकार के साथ-साथ निरंजन ज्योति पर भी एक प्रश्न चिह्न खड़ा करती है कि उनके गृहनगर में ही श्री राम मन्दिर को लेकर ऐसी घटना कैसे घटी? इसके अलावा इस घटना को सीधे तौर पर डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी और डॉ. चन्द्र प्रकाश सिंह के माथे पर चिन्ता की लकीर बन जानी चाहिए क्योंकि इसमें कोई संहेद नहीं है कि ऐसी घटनाएं उनके श्री राम जन्मभूमि मन्दिर को लेकर किये जा रहे संस्थागत प्रयासों पर सीधे अवरोध का काम करेंगी। ऐसे में पीठ को भी ऐसी घटनाओं पर संवेदनशील होना चाहिए। साथ ही मन्दिर निर्माण के लिए ज़रूरी यह भी है कि इस पर होने वाली राजनीति की सारी सम्भावनाओं के द्वार जल्द से जल्द बंद कर दिए जाएं, जो कि काफी हद तक संस्थागत प्रयासों से ही सम्भव है।


जहानाबाद की घटना पूरी तरह से प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है। मकर संक्रान्ति पर हर साल यहां श्री राम मन्दिर की रथयात्रा निकलती है। पिछले साल भी लगभग एक लाख लोगों ने इसमें हिस्सा लिया था, तो इसको देखते हुए प्रशासन ने अपनी तैयारियां क्यूं नहीं की। चूंकि उत्तर प्रदेश सरकार में सूबे की जनता त्राहि-त्राहि कर रही है इसलिए आगामी चुनावों को देखते हुए यह सरकार जानबूझकर मेरे संसदीय क्षेत्र में इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रही है, जिससे हमारी छवि ख़राब हो। इस घटना में भी सपा का नगर अध्यक्ष प्रशासन के साथ मिला हुआ था क्योंकि हमें वहां जाने से रोका गया है और सपा के लोगों ने ही अगुवाई करके इसे फैलने दिया। श्री राम मन्दिर से जुड़े मुद्दे न्यायालय से सम्बंधित हैं और हमें धैर्य व सम्मान के साथ न्यायालय के फैसले का इंतज़ार करना चाहिए।
साध्वी निरंजन ज्योति
केन्द्रीय राज्य मंत्री व सांसद-फ़तेहपुर


ख़ैर, पीठ को उक्त घटनाओं के नियमन के साथ-साथ 9 व 10 जनवरी की संगोष्ठी के फलस्वरूप लिए गए अपने क़ायदो और संकल्पों को याद रखना होगा कि श्री राम जन्मभूमि मन्दिर का निर्माण हमारे राष्ट्रीय पुनर्जागरण का हिस्सा है। इसका अर्थ एक ऐतिहासिक क्रूरता को ठीक करना भी है। अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम मन्दिर का निर्माण एक राष्ट्रीय लक्ष्य बन गया है। यद्यपि यह क़ानूनी रुप से और अधिकतम आम सहमति के साथ पूरा किया जाना चाहिए। चूंकि 10 जनवरी को ही समाचार टीवी चैनल आज तक पर श्री राम मन्दिर मुद्दे पर आधारिक कार्यक्रम टक्करमें सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने भी सार्वजनिक रूप से घोषित किया कि वे और अधिवक्ता गिलानी एवं अन्य मुस्लिम हितधारक दिन-प्रतिदिन की सुनवाई का पक्ष लेते हुए शीघ्र निपटारा चाहते हैं। इसलिए अपील की सुनवाई को यथाशीघ्र पूरा होने पर व्यापक सहमति है। इसका अर्थ यह होगा कि इन सभी सिविल सूटों पर सर्वोच्च न्यायालय का सितम्बर, 2016 तक फैसला सम्भव हो सकेगा।
सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी अगले क़दम के तौर पर प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर मांग की है कि केन्द्र सरकार को पहल करनी चाहिए कि विभिन्न पक्षों द्वारा दायर सिविल अपील को शीघ्र सूचीबद्ध किया जाए और दिन-प्रतिदिन की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय में 15 मार्च, 2016 तक प्ररम्भ की जाए। इसके अलावा उन्होने आश्वस्तता भी जताई कि इस साल के अन्त तक श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम मन्दिर निर्माण प्रारम्भ हो जाएगा।


श्री राम मन्दिर हमारी संस्कृति और हमारी सभ्यता का प्रतीक है। हम भारतवासी असभ्य नहीं हैं इसीलिए हमारी पूरी अवाम चाहती है कि श्री राम मन्दिर का भव्य निर्माण हो। इसके लिए पुरानी सरकारों ने भी प्रयास किए थे। राजीव गांधी जी का इसमें बड़ा योगदान रहा है। उन्होने ही राजनैतिक रूप से सबसे पहले राम राज्य की बात कही, अपना पहला चुनाव भी उन्होने राम की भूमि से ही लड़ा, श्री राम मन्दिर का ताला उन्ही की इच्छा शक्ति से खुल पाया था और भारत के घर-घर में श्री राम जी की चेतना का संचार दूरदर्शन में रामायण धारावाहिक के जरिए करने का श्रेय भी राजीव गांधी जी को ही जाता है। मेरा पूरा अनुमान है कि न्याय मन्दिर के ही पक्ष में आएगा और लगभग मेरा अनुमान ग़लत नही होता है। मैने कहा था कि टू जी में राजा जेल जाएगा, वह गया। मैने नेशनल हेराल्ड में भी कहा था की मां-बेटे को कोर्ट का मुंह देखना होगा और अब श्री राम मन्दिर के लिए भी मेरा अनुमान सत्य होगा।
डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी
अध्यक्ष, अरुंधती वशिष्ठ अनुसंधान पीठ


सही मायनों में देखें तो यह सब लगभग इस संस्थागत बहस का ही परिणाम है। अतः पीठ द्वारा सम्पन्न इस राष्ट्रीय संगोष्ठी को श्री राम जन्मभूमि मन्दिर के परिप्रेक्ष्य में उभरती अयोध्या के आग़ाज़ स्वरूप देखना अतिश्योक्ति न होगा।