Monday, 22 June 2020
Saturday, 9 May 2020
Saturday, 2 May 2020
प्रेस को विशेषाधिकार देने वक़्त
∙ अमित राजपूत
(पत्रकार/स्तम्भकार)
दुनियाभर
के लिए आज तीन मई को मीडिया की आज़ादी के जश्न का दिन होता है। इस दिन प्रेस की
आज़ादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मानव अधिकारों की सार्वभौमिकता आदि पर एक बार
फिर से चर्चा होती है, लेकिन नए सिरे से नहीं क्योंकि ना तो इसके कोई उदाहरण देखने
को मिलते हैं और ना ही कोई ख़ासा प्रभाव
कि ये अंदाज़ा ही लगाया जा सके कि कहीं उक्त विषयों के बारे में कहीं कोई गंभीरता
से बात हो रही है। चूँकि जहाँ आज़ादी का प्रश्न है वहाँ यक़ीनन जश्न का माहौल बनता
है या कि बनना चाहिए। लेकिन मीडिया के पास कभी भी इसका जश्न मनाने का कोई स्पष्ट
बिम्ब ही नहीं रहा है। हालाँकि ख़ुद से बेख़बर होकर ख़बर लिखने में जुटे रहने वाले
पत्रकारों के लिए यह एक अच्छा मौक़ा हो सकता है जब वो अपने लिए गंभीरता से विचार
कर सकते हैं और अपने होने मात्र का जश्न मना सकते हैं। यही पत्रकारों के लिए काफ़ी
है, लेकिन वो इसे तक नहीं पाते या पा नहीं पाते या कि पाना नहीं चाहते। प्रश्न
अनेक हैं।
बहरहाल, उक्त बातों पर चिन्तन करने की अलग से ज़रूरत है। फिलहाल आप मीडिया की
आज़ादी के प्रश्न को समझें। इतना तो सभी जानते हैं कि जहाँ कहीं भी आज़ादी की बात
होती है तो इसमें जो मूल चरित्र है वह ग़ुलामी के अस्तित्व का है। आज़ादी ये
दर्शाती है कि कहीं न कहीं ग़ुलामी रही होगी तभी आज हम आज़ादी का जश्न मना रहे
हैं। ऐसे में सवाल ये है कि आख़िरकार मीडिया किसका ग़ुलाम रहा है, जिससे यह आज़ाद
हो गया है और अब ये अपनी आज़ादी का जश्न मना रहा है? कम शब्दों में यदि आप समझना चाहते हैं तो ऐसे समझिए कि चाहे अभिव्यक्ति
की स्वतंत्रता हो या फिर मानव
अधिकारों की सार्वभौमिकता की
बात हो यह एक नागरिक समाज के लिए भी उतना ही अति आवश्यक है जितना की एक पत्रकार के
लिए। पत्रकारों को ग़ुलाम करने वाला कोई नहीं है सिवाय इसके कि वो अपने मौलिक अधिकारों
का ही प्रयोग न कर पायें।
हम सभी जानते हैं कि अपने यहाँ भारत में एक पत्रकार के लिए आम नागरिक को मिलने
वाले अधिकारों से इतर चूँकि कोई अन्य या विशेष अधिकार ही नहीं हैं। इसलिए कम से कम
भारत में प्रेस की आज़ादी का मतलब है कि एक आम आदमी को संविधान में दिये गये अधिकारों
का अनुप्रयोग कर पाना। इसके अनुप्रयोग में आने वाली बाधाएँ संवैधानिक अधिकारों का
हनन हैं। वह भी प्रेस की आज़ादी जैसा कुछ नहीं है। ऐसे में भारतीय प्रेस के अधिकार
तो यहाँ नागरिक समाज के अधिकारों के साथ ही गतिशील हैं। उन्हें थोड़ा विशिष्ट बना
देना ही मैं समझता हूँ आज के परिप्रेक्ष्य में प्रेस को तनिक आज़ादी दे देने जैसा
है और इसके लिए प्रेस को विशेषाधिकार देने का अब वक़्त है।
(लेखक भारतीय जनसंचार
संस्थान, नई दिल्ली के सामुदायिक रेडियो में कार्यक्रम समन्वयक हैं।)
Sunday, 5 April 2020
वर्जिन इलाक़ों की जवाबदेही
• अमित राजपूत
वैश्विक महामारी कोरोना के संकट से जूझ रही दुनिया में भारत की स्थिति लॉकडाउन
है यानी 21 दिनों की देशव्यापी पूर्ण बंदी। इस महाबंदी में वो इलाक़े भी शामिल
हैं, जहाँ अब तक कोरोना के संक्रमण का एक भी केस दर्ज़ नहीं किया गया है। कोरोना
के संक्रमण से मुक्त ऐसे इलाक़ों को वर्जिन इलाक़ा कहा गया है। इनमें देश के दूसरे
हिस्सों समेत उत्तर प्रदेश और बिहार के तमाम ज़िले प्रमुख रूप से शामिल हैं।
यूपी और बिहार के
इन वर्जिन ज़िलों में लॉकडाउन के उन इलाक़ों से अपेक्षाकृत बहुत ही शिथिल स्थिति
देखने को मिल रही है, जहाँ कोरोना के कई सारे मामले पुष्ट हैं। वर्जिन ज़िलों की इस
शिथिलता के थोड़े सकारात्मक तो थोड़े लापरवाही भरे परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में देशभर
के इन वर्जिन इलाक़ों की ज़िम्मेदारियाँ और जवाबदेही दोनों ही बहुत महत्वपूर्ण
मालूम होते हैं।
पहले, सकारात्मक
परिणामों की बात करें तो ज़्यादातर वर्जिन ज़िले सूबों के छोटे और मँझोले जनपद
हैं। इनके आसपास अवस्थित गाँव ही देश के धान्य की कुंजी हैं। ऐसे में बहुत ज़रूरी
है कि ऐसे इलाक़ों में सावधानी बरतते हुए कड़ाई उतनी ही हो कि सोशल डिस्टेंसिंग
यानी सामाजिक दूरी में रहकर किसान अपनी चर्चा के साथ जुड़ा रहे, क्योंकि किसी भी
हालत में इस चैत्र के महीने में तैयार उपज को सँजोना बेहद ज़रूरी है। इसलिए तमाम
वर्जिन जनपदों के नेतृत्वकर्ताओं को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके इलाक़ों में
ग़ैर-ज़रूरी आवाजाही को नियंत्रित करते हुए धीरे-धीरे किसानों को उनके खेतों में
बारी-बारी आने-जाने देना चाहिए यद्यपि यह अति अनुशासन, ज़िम्मेदारी और जवाबदेही
वाला होगा, जिसमें नागरिकों की ही सबसे अहम भूमिका है।
दूसरा, इन
इल़ाकों की सबसे ख़ास बात यह है कि यहाँ के लोगों का एक वर्ग अब भी सामान्य दिनों
की तरह ही सामाजिक दूरी को नज़रअंदाज़ करते हुए सुबह और शाम को समूह में घूमने और
टहलने निकल रहा है। वो कोरोना को लेकर तनिक भी सावधान नहीं दिखता है। ऐसे वर्ग के
लोग बड़ी दृढ़ता के साथ यह भी मानते हैं कि चूँकि उनके ज़िलें में अब तक कोरोना का
एक भी मामला सामने नहीं आया है तो उन्हें इसके प्रिकॉशन्स की कोई भी ज़रूरत नहीं
है। हैरानी है कि ये वर्ग धड़ल्ले से लोकल पिकनिक भी कर रहा है। शायद उन्हें इस
बात का तनिक भी अंदाज़ा नहीं है कि वो जिससे मिल रहे हैं वो न जाने दिनभर में ऐसे
ही और कितने लोगों से मिल रहा होगा। इस एक छोटी सी ग़लती भर से कोरोना की उड़ती आग
के चपेट में वो बड़ी आसानी से कभी भी आ सकते हैं। इस प्रकार, इससे न सिर्फ़ उनके
ज़िले की वर्जिनटी भंग होगी बल्कि यह एक झटके में लॉकडाउन का पालन कर रहे मासूमों
की धड़कनों को भी बढ़ा देने वाला होगा। ऐसे में वर्जिन इलाक़ों के नागरिकों की
ज़िम्मेदारियाँ उतनी ही मज़बूत होनी चाहिए जितनी कि कोरोना से संक्रमित इलाक़े में
रहने वाले नागरिकों की। बेहतर तो यह होगा कि इन वर्जिन इलाक़ों के नागरिक कोरोना
संक्रमित इलाकों से ज़्यादा सचेत रहें जिससे कि वो इस पूरे प्रकरण में अपने ज़िले
को वर्जिन ही बनाकर रख सकने में क़ामयाब हो सकें। बेशक उनकी यह उपलब्धि शताब्दियों
तक गूँजती किसी ललकारती विजय से कम न होगी।
वास्तव में यह केवल
इतना भर नहीं है कि ये इलाक़े अपनी परिधि में कोरोना की उपस्थिति को शून्य भर
करेंगे बल्कि इसके दूसरे भी मायने है। मसलन आज जब धरती अपने मौन का नाद सुन रही है
तो इन वर्जिन इलाक़ों के द्वारा की जा रही लॉकडाउन की अवज्ञा मात्र से वो धरती के
मौन में खलल डालने का काम कर रहे हैं। जी हाँ, ये समझने वाली बात है कि कोरोना
संकट के बीच भारत की ही तरह अधिकांश देशों में या तो लॉकडाउन है अथवा लोगों को
उनके घरों से निकलने नहीं दिया जा रहा है। हर जगह यही आदेश हैं और ऐसे में क़रीब
चार अरब की आबादी वाली आधी दुनिया अपने घरों में ही बंद है। परिवहन और उद्योग
धंधों की रफ़्तार भी थमी हुयी है। रेलगाड़ियों के पहिये पूरी तरह से रुके हुए हैं।
इन सबके चलते पृथ्वी पर व्याप्त यह शान्ति धरती की ऊपरी परत पर कंपन का स्तर बड़ी
मात्रा में घटा रही है।
दिलचस्प है कि
बेल्ज़ियम के रॉयल ऑब्ज़र्वेटरी की एक रिपोर्ट के मुताबिक बसों, कारों, ट्रेनों और
फैक्ट्रियों आदि की मौजूदा चुप्पी से धरती के कंपन में 30 से 50 प्रतिशत तक की कमी
दर्ज़ की गयी है। इसका असर यह हुआ है कि भूकंप विज्ञानी इस वक़्त छोटी से छोटी
भूगर्भीय हलचल का भी पता लगा पाने में सक्षम हो गये हैं। यह सबकुछ कम शोर के कारण
ही संभव हो सका है, जोकि सीधे तौर पर आपके द्वारा लॉकडाउन के अनुपालन का ही नतीज़ा
है। इसे हम इस तरह से भी समझ सकते हैं कि धरती की ऊपरी परत के कंपन में आई यह कमी
दर्शाती है कि पूरी दुनिया में लोग लॉकडाउन के नियमों का पालन कर रहे हैं।
चूँकि धरती के
कंपन में आई कमी के आंकड़ों के सहारे इस बात का निर्धारण बहुत ही आसानी से किया जा
सकता है कि किस देश के किस इलाक़े के लोग लॉकडाउन के नियमों का ज़्यादा पालन कर
रहे हैं और किस इलाक़े के लोग ऐसी स्थिति में भी न तो इसे और न ही इसके
नफ़ा-नुकसान को ही भाँप पा रहे हैं और वो लॉकडाउन को नज़रअंदाज़ कर घर से निकल रहे
हैं या लोकल में ही अपना निजी वाहन लेकर घूम रहे हैं। ऐसे में ध्यान रखें कि इस
वक़्त जब हमारी धरती का चित्त शांत है वो आपके वाहन से पैदा होने वाली ध्वनि और
उससे हुए कंपन को भी महसूस कर पा रही है। कोरोना से संक्रमित इलाक़ों में बेहद
कड़ाई से इतर यद्यपि ऐसी ज़्यादातर हरक़ते वर्जिन इलाक़ों में ही हो रही है। इसलिए
कोरोना के वर्जिन इलाक़ों की जवाबदेही सबसे ज़्यादा है कि वो वक़्त की नज़ाकत को
समझें और अपनी ज़िम्मेदारी निभाएँ। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए स्वास्थ्य
और कृषि जैसे कार्यों के अलावा वहाँ के लोग घर से बाहर कभी न जाएँ।
Wednesday, 18 March 2020
Friday, 6 March 2020
Friday, 3 January 2020
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