Sunday, 6 August 2017

फ़िल्म का अनुभव संसार है ‘टॉयलेट’




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत हर घर में शौचालय बनवाने के प्रयासों में एक प्रयास अभिनेता अक्षय कुमार का है उनकी फ़िल्म ‘टॉयलेट ..एक प्रम कथा’। इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक ही इस फ़िल्म का सार है- ये कहना है इस टाइटल ट्रैक को अपने शानदार संगीत से सजाने, संवारने और इसके संदेश को अपनी उंगलियों से अनुभव कराने वाले युवा संगीतकार विक्की प्रसाद का। उन्होने इस फ़िल्म के कई और बेहद चर्चित गानों में अपना संगीत दिया है। उन तमाम गीतों और विक्की के उतार-चढ़ाव भरे स्ट्रगल के बारे में अमित राजपूत ने उनसे सीधी बातचीत की है। प्रस्तुत हैं अंश-

∙ इतनी छोटी ही उम्र में ‘टॉयलेट ..एक प्रेम कथा’ जैसी बड़ी फ़िल्म के संगीतकार बन गये। क्या कहेंगे ?
(हंसकर...) मेहनत रंग ले आयी। बहुत ही बढ़िया महसूस हो रहा है। यही सोच कर आये थे मुम्बई। मुझे लगता है हर किसी म्यूजीशियन का यही सपना होता है कि उसे एक बड़ी एण्ट्री मिल जाये तो क्या कहने। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुझे नीरज पाण्डेय जी की फ़िल्म के टाइटल ट्रैक सहित कई गानों के साथ अच्छी शुरुआत करने का मौका मिला। इसे मैं क़िस्मत ही मानता हूं क्योंकि इससे अच्छी तो शुरूआत नहीं हो सकती थी। मुझे ऐसी शुरूआत करके ख़ुशी हो रही है।


∙ संगीत के साथ आपका जुड़ाव कब और कैसे हुआ ?
मैने सबसे पहले तीन साल से गाना शुरू किया था। उसे ही संगीत से मेरा जुड़ाव कहा जा सकता है। तब मेरे एक सर थे उनकी फेयरवेल पार्टी में मैंने एक गीत गाया था- ‘चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना।’ तब उन्होंने ख़ुश होकर मुझे पाँच रुपये ईनाम में दिये थे। तब मैं इससे बहुत मोटीवेट हुआ और फ़िर उसके बाद लगा रहा बहुत कुछ सीखने में। लेकिन सीखने से ज़्यादा मैने सुना बहुत अधिक है।

∙ किस सिंगर के साथ ज़्यादा अच्छी केमिस्ट्री रही आपकी ?
सभी के साथ मेरा अच्छा रहा फिर चाहे वो सोनू जी हों, श्रेया मैम हो गयीं या सुनिधि जी हो या फिर चाहे सुखविन्दर जी ही हो। हाँ, सुखविंदर जी और सोनू जी के साथ काफी अच्छा रहा मेरा। उन लोगों से बातें भी होती हैं मेरी। सुखविन्दर जी तो मतलब बहुत मानते हैं मुझे। काफी अच्छे से बात करते हैं वो।

∙ सॉन्ग बखेड़ा.. ये आपका गाना बहुत ज्यादा पसन्द किया जा रहा है। हर वर्ग के लोग इसे खूब सराह रहे हैं !
बखेड़ा मेरे दिल के बहुत ही करीब है। इसके साथ मेरे इमोशन्स भी जुड़े हुए हैं। जब मैं इसे बना रहा था तो इसका मुखड़ा बन गया था। अन्तरें में थोड़ा दिक्कत आ रही थी। कई बार अटका ये गाना। मैं अन्तरा बार-बार करके दे रहा था हर बार वो रिजेक्ट हो जा रहा था। ऐसी भी स्थिति आ गयी थी कि शायद गाना रिजेक्ट भी हो जाता और इसके साथ मैं नहीं जुड़ पाता। लेकिन अन्त में थोड़ा मैं रुका और इस पर फिर से काम किया। इसके बाद जो है वो आप सबके सामने हैं. अच्छा लग रहा है कि लोग इसे सराह रहे हैं। लेकिन फ़िल्म डायरेक्टर के द्वारा जो मुझे पहला टास्क दिया गया था वो टाइटल ट्रैक था। फिर भी बखेड़ा ही सबसे पहले सेलेक्ट हुआ। इसके बाद मुझे ‘हंस मत पगली’ भी करने का मौका मिला।  

∙ फ़िल्म का टाइटल ट्रैक ‘टॉयलेट’ इतनी देरी से क्यों लाया गया ?
ये तो ख़ैर मैं नहीं बता सकता हूं कि इतनी देर से क्यों लाया गया। पर हां, हो सकता है कि फ़िल्म की अपनी प्रमोशनल स्ट्रैटजी रही हो। प्रमोशन के प्वाइंट ऑफ़ व्यू से भी इसे फ़िल्म रिलीज़ के दस दिन पहले ही रिलीज़ किया गया होगा क्योंकि वैसे भी ये गाना ‘टॉयलेट’ औरों से एकदम अलग है जोकि फ़िल्म का सार है। आप ये भी कह सकते हैं कि फ़िल्म का अनुभव संसार है ‘टॉयलेट’। इसके जितने भी पहलू हैं जैसे कि इसमें संदेश है, इसमें समस्याएं भी हैं, तमाम मुद्दे हैं और सीख भी है। ये फ़िल्म और इसका टाइटल ट्रैक दोनो ही लोगों में जागरुकता लाने के लिए एक कम्प्लीट मैसेज़ पैकज है। मैं तो इस ट्रैक को फ़िल्म के मुद्दे का एंथम मानता हूं।

∙ बॉलीवुड में आकर आप किस तरह के गाने करने की ज़्यादा तमन्ना रखते हैं ?
देखिए, पहले तो अगर मुझे एक म्यूज़िक कम्पोज़र के तौर पर आगे काम करना है तो मैं किसी टाइप को लेकर नहीं चल सकता। मैं टाइप्ड होकर कोई अपना जॉनर नहीं सेट करना चाहता कि मुझे यही करना है। मैं करके सीख रहा हूं और मैं यही चाहता हूं कि मुझे सबके साथ तरह-तरह का काम करने को मिले। वैसे भी मुझे सभी टाइप्स के गाने पसन्द हैं। अलग-अलग सिचुएशन में काम करना मुझे पसन्द है। बस हां, मुझे किसी भी जॉनर की म्यूज़िक करना है तो मैं डिफरेण्ट करना चाहूंगा जोकि मेरा हो, यूनिक हो। यही मेरी तमन्ना है।
 
∙ इससे पहले क्या किया था ?
वैसे टॉयलेट मेरी पहली ही बॉलीवुड फ़िल्म है। इससे पहले मैने ध्रुव हर्ष की ‘ऑनरेबल मेन्शन’ की थी। ध्रुव मेरे कॉलेजमेट हैं। उनकी ये मूवी आधे घण्टे की शॉर्ट फ़िल्म थी। उन दिनों भी मैं मुम्बई में था। वो ये फ़िल्म इलाहाबाद में कर रहे थे। ध्रुव ने कहा कि मैने एक शॉर्ट फ़िल्म बनाई है। बहुत मेहनत हुई है इसमें। मैने कहा ठीक है, करते हैं भेजो। फिर उसकी थीम पर काम करके ध्रुव के साथ बहुत मज़ा आया। फ़िल्म ने अमेरिका में 2 और हैदराबाद, कोलकाता, इलाहाबाद और नई दिल्ली में 1-1 अवॉर्ड हासिल किये हैं। आगे भी हम साथ काम करने वाले हैं।

∙ विक्की आपको कब ऐसा लगा कि अब आपको मुम्बई निकलना चाहिए ?
 ग्रेजुएशन के बाद साल 2010 में मैं सबसे पहले दिल्ली गया था। वहां मैने साउण्ड इवेण्ट और म्यूज़िक प्रोडक्शन का कोर्स किया। वो कोर्स एक साल का था, 2011 में खत्म हो गया। लेकिन मैने दिल्ली नहीं छोड़ा था, वहां छोटे-मोटे इवेण्ट करता रहा। अन्त में सितम्बर 2012 में मैने मुम्बई का रुख किया और तब से लेकर बिना रुके आज तक मैने यहां जमकर स्ट्रगल किया और काम करता रहा।

∙ रिकॉर्डिंग्स के दौरान के अनुभव कैसे रहे ?
जैसा कि मेरी शुरुआत थी और सोनू निगम जी, सुखविन्दर जी जैसे बड़े दिग्गज मेरा गाना कर रहे थे तो वाकई मैं बड़ा ऑनर फ़ील कर रहा था उस वक़्त। अक्षय कुमार जी के साथ रिकॉर्ड करने में सबसे ज़्यादा मज़ा आया। वो बड़े मस्त इन्सान हैं। हमेशा ख़ुश रहते हैं। एक पॉज़िटिव माहौल बना देते हैं। खूब हंसी-मज़ाक करते हैं। वो बहुत ही ज़्यादा एनर्जेटिक हैं, उनको देखकर आप ऑटोमैटिक डेडीकेटेड हो जाते हो।

∙ अपने घर-परिवार के बारे में भी हमें कुछ बताइए !
मेरे फादर नहीं हैं। परिवार के अधिकतर लोग असम में ही रहते हैं। फादर की डेथ के बाद मेरी नानी जी ने मेरी परवरिश की। वो आर्मी में हैं। मेरा जन्म भी असम राइफल्स में ही हुआ है। पूरे नॉर्थ-ईस्ट में ही घूम-घूमकर उनका ट्रान्सफर होता रहता और वैसे ही घूम-घूमकर मेरी पढ़ाई चलती रही। 2005 तक मैं वहीं था। इस तरह से मेरी पूरी परवरिश आर्मी एटमॉसफियर के बीच ही हुई।

∙ तब तो एक डिफेन्स के कथानक वाली फ़िल्म करने में आपकी ज़्यादा दिलचस्पी देखने को मिल सकती है !
आर्मी का जो वातावरण है, बेशक वो मेरे रोम-रोम में है। वो हर पल मेरे जहन में रहता है। सिविल से बिल्कुल डिफरेण्ट होता है वहां का माहौल। सीरियसली मुझे 2005 के बाद ही जब मैं असम से निकला तभी मुझे सिविल लाइफ़ के बारे में पता चला। बहुत ही अन्तर है दोनो में। ऐसे में आर्मी बैकग्राउण्ड वाली फ़िल्में करके डेफेनेटली मुझे बहुत ख़ुशी होगी। मैं शायद ऐसी फ़िल्मों में और भी इनवॉल्व होकर काम कर पाउंगा क्योंकि बचपन से ही मैने वहां की हर छोटी-छोटी चीज़ें तक देखी हैं।

∙ विक्की ‘टॉयलेट ..एक प्रेम कथा’ के बाद किन प्रोजेक्टस पर काम कर रहे हैं ?
ध्रुव हर्ष की ही फ़िल्म ‘हर्षित’ करने वाला हूं। वो वर्ल्ड सिनेमा के बड़े अच्छे फ़िल्मकार हैं। हर्षित हेमलेट पर बेस्ड फ़िल्म है। इसके अलावा मैने एक फ़िल्म कम्प्लीट कर ली है, उसका नाम है- ‘चेन्ज ऑफ़ वर’। ये बड़ी फनी मूवी है। हालांकि इनमें फ़न के अलावा बहुत अच्छा ड्रामा है, इमोशन है और काफ़ी ख़ूबसूरत सी फ़िल्म है। संजय मिश्रा जी इसमें लीड रोल कर रहे हैं। इसके अलावा भी काफ़ी अच्छे-अच्छे कलाकारों से सजी मूवी है ये। ये फ़िल्म मथुरा पर बेस्ड है। इससे भी मुझे बड़ी उम्मीदे हैं। बहुत जमकर काम हुआ है इसमें भी। इसके अलावा 2-3 प्रोजेक्ट्स पर बात फाइनल होने वाली है मेरी।

∙ टॉयलेट कैसे मिली, इसके स्ट्रगल के बारे में कुछ बातें साझा कीजिए ?

12वीं से ही मुझे पता था कि अल्टीमेटली एक दिन मुझे बॉलीवुड में ही काम करना था। इसलिए यही कारण रहा कि सबसे पहले मैं नॉर्थ-ईस्ट से निकलकर इलाहाबाद पहुँचा। वहां रहकर मैने पढ़ाई की और बहुत सारी चीज़े तभी से सीखने लगा। फिर मुम्बई आ गया। यहां मुम्बई में मेरी कोई जान-पहचान भी नहीं थी कि कोई मुझे कहीं काम दिलवाता। मैंने ख़ुद से कई जगह हाथ-पैर मारे पर कोई बात बनी नहीं। अब तक मेरे सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। फिर मजबूरी में मुझे कोई जॉब करनी पड़ी और मैने की थी। लेकिन चूंकि मैने तय ही कर रखा था कि मुझे जीवन में जॉब नहीं करनी। एक पैसा भी कमाना है तो वो म्यूज़िक से कमाना है। इसलिए मैने जॉब छोड़ दी और म्यूज़िक अरेंजमेण्ट का काम करने लगा, वहीं से अब मेरे रहने खाने का जुगाड़ चलता रहा। वास्तव में ये सब भी मैं करना नहीं चाह रहा था लेकिन मजबूरी थी। मैं म्यूज़िक कम्पोज करना चाहता था। साल 2013-14 का जो पीरियड था वो मेरे लिए बड़ा मुश्किल भरा था। कुछ प्रोजेक्ट छूट गये थे, मेरे पास कोई काम भी नहीं था। रेण्ट देने के पैसे नहीं थे, जो पैसे थे बिल्कुल ख़तम होने वाले थे। उन दिनों मैं इधर कांदीवली में रहता था, रेण्ट डिपॉज़िट के दिए हुए पैसे से ही मैं सर्वाइव कर रहा था। कोई उधार देने वाला भी अब न था, सबसे ले चुका था। अब मेरे पास खाने के लिए भी पैसा नहीं था। 10 रुपये रहते तो उसी से दिन में पाव खाकर रहता था। बड़ा मुश्किल हो गया था उन दिनों। सारे रास्ते बंद थे। अन्त में अचानक से एक दिन मेरे कॉलेज फ़्रेण्ड आशुतोष त्रिपाठी ने मुझे कॉल कर दी। उसने मेरी हालत समझी और फिर 2500 रुपये खाते में डाल दिया। उसी पैसे से मैं वापस घर गया। मॉम से मिले भी चार साल से ज़्यादा हो गए थे।

घर जाते ही 10-15 दिन बाद मुझे एक क्लाइंट का फोन आता है और वो मुझसे कुछ काम लेना चाहते थे। मैने उन्हें काम करने की शर्त यही दे दी कि मेरे रहने का जुगाड़ कर पाओ तभी मैं आउंगा। वो राजी हो गये और मैं जल्दी ही मुम्बई वापस आया। उन्हीं की बदौलत मैं वापस मुम्बई में स्टैण्ड कर गया। आज वो मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं, अजय आर्य नाम है उनका। तब से लेकर 2016 तक मेरा संघर्ष जारी था।

इसके बाद मेरे मेण्टॉर मनोजराज दत्त मेरे लिए टर्निंग प्वाइंट बने वो टॉयलेट में एसोसिएट डायरेक्टर हैं। मनोज सर को मैं अपना बड़ा भाई मानता हूं। उन्होने पहले भी मेरी बहुत बार मदद की थी। इस बार उनका मुझे कॉल आता है और वे मुझसे बोले कि विक्की जिस हालत में हो वैसे ही भागकर नीरज पाण्डेय जी के प्रोडक्शन हाउस में आ जाओ। (ज़ोर देकर) यकीन मानिए, मैने कैप्री पहन रखी थी और ज़ोरों की बारिश हो रही थी। लेकिन मैने जैसा मनोज सर ने कहा था वैसा ही किया। मैं भीगते ही प्रोडक्शन हाउस पहुंचा और फ़िल्म ‘टॉयलेट ..एक प्रेम कथा’ के डायरेक्टर श्रीनारायण सिंह से मिला। उनको नए लोगों के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं थी। वहां मेरी उनसे बातचीत हुयी और उनसे टेस्ट प्रोजेक्ट मिले मुझे। अन्त में मैं पास हुआ और ये फ़िल्म मेरे हाथ लग गयी।

∙ नये लोग जो फ़िल्मों में म्यूज़िक करना चाहते हैं उनको क्या सलाह है आपकी ?

मैं अभी किसी को सीख देने के क़ाबिल खुद को नहीं मानता। लेकिन मेरी जो सोच है मैं उसे साझा कर सकता हूं। आप किसी भी विधा में काम करे हों सबसे पहले तो आपको अपनी आइडेण्टिटी बनाने की ज़रूरत होगी। उसे ही लेकर आप चलते रहो वरना उसके बिना आप भीड़ का हिस्सा हो जाते हो और फिर आपको कोई नहीं पूछता है। भीड़ कब हट जाती है पता भी नहीं चलता आपको, हताशा होती है। इसलिए मेहनत के साथ सकारात्मक रहकर डटे रहना हर किसी के लिए बहुत ज़रूरी है। इसके अलावा धैर्य एक बहुत ज़रूरी चीज़ है, उसके बिना कुछ सम्भव नहीं।

Saturday, 29 July 2017

दस्तावेजः खागा का वीर बालक

अपनी अर्धांगनी श्रीमती धुन्नू कुँवर के साथ 'वीर बालक' बृजलाल

खागा के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल पुत्र नारायण उर्फ मुन्नू गड़रिया को 15 अगस्त, 1972, 24 श्रावण, 1894 शकाब्द को स्वतंत्रता के 25वें वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान के लिए सन् 1913 में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल को राष्ट्र की ओर से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आनन्द भवन, इलाहाबाद में ताम्र-पत्र और एक चांदी का मेडल भेंट किया।

बृजलाल पाल की पत्नी श्रीमती धुन्नू कुँवर ने बातचीत में बताया कि “हेमवती नंदन बहुगुणा समेत तमाम बड़े कांग्रेसी नेताओं का हमारे यहां लगातार आना-जाना लगा रहता था।” धन्नू कुँवर को बड़ा स्पष्ट याद है और वह बताती हैं कि “एक बार जब हेमवती नंदन बहुगुणा हमारे यहां आये थे तब हम कच्चे मकान में रहते थे और मैंने छप्पर के नीचे अपने चूल्हे में एक पतीली पर गुड़ चाय बनाकर उन सबको पिलाया था।”
इन्दिरा गांधी जब खागा आती थीं तो गंगा पांडे के घर में बैठकी होती थी जिसमें बृज लाल पाल आदि लोगों का बढ़ चढ़कर मीटिंग के लिए बुलावा होता था।

(स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल के छोटे पुत्र हरिशंकर ने लेखक अमित राजपूत को बताया।)
29 मई, 1993 को 80 वर्ष की अवस्था में बृजलाल पाल का निधन हो गया।

बृजलाल पाल के बड़े लड़के रामचंद्र पाल बताते हैं कि जब “जब मैं 10 साल का था तो सन् 1962 के चुनाव के समय नेहरू जी को शुकदेव कॉलेज की बड़ी फील्ड में अपनी जनसभा करनी थी। इसके लिए उनको बहादुरपुर खागा हो करके ही नई बाजार मोहल्ले के रास्ते बड़ी फील्ड को जाना था। तब वह हमारे घर के पास जनहितकारी इंटर कॉलेज के बगल में प्राइमरी स्कूल के सामने से होकर अपनी एम्बेस्डर कार से गुगर रहे थे। तब बप्पा (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल) ने मुझे और मेरी छोटी बहन शकुंतला (तब वह साढ़े सात साल की रही हैं) को एक-एक गेंदे के फूल के माला देकर नेहरु जी के गले में डालने को दे दिया। हम दोनों ने नेहरू जी को एंबेसडर कार में बैठे-बैठे ही माला पहनायी थी। उधर से जवाब में नेहरू जी ने हमें पहले से ही अपने गले में पहली तमाम मालाओं मे से एक-एक उतार कर मुझे और मेरी बहन को पहना दी। मेरे गले में नेहरू जी द्वारा पहनायी गयी माला कपड़े के फूलों की बनी थी जिसे मैंने सहेजकर एक बड़े बक्से में रख दिया था। लेकिन सन् 1970 में जब खागा में गंगा-जमुना एक होकर बहने लगीं और भीषण बाढ़ आयी तब यहां नावें भी चलने लग गयी थीं। हमारे घर गिरने लगे। तब उसी बाढ़ में हमारा मिट्टी का बना हुआ घर भी गिरकर ढह गया था और वह बक्सा जिसमें मैने नेहरू जी द्वारा दिया गया माला रक्खा था, बाढ़ में डूब गया। हम घर छोड़कर चले गये और इसी के साथ नेहरू जी के द्वारा दी गयी वो निशानी सदा के लिये खो गयी।

लेखागार (न्याय) 15 विविध, 71, 72 के अनुसार बृज लाल पाल दिनांक 21 जनवरी, 1932 को फतेहपुर के कस्बा गाजीपुर में दफा-144 का उल्लंघन करते हुए कांग्रेस का जुलूस निकालने के अभियोग में श्री रमाकांत मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी द्वारा दिनांक 23 जनवरी, 1932 को धारा-143 तथा 188 ता. हि. के अंतर्गत तीन-तीन माह की सख्त कैद और 15-15 रुपए जुर्माना अथवा एक-एक माह के अतिरिक्त कैद की सजा का आदेश दिया गया। दोनो ही सजायें क्रमवार चलने का आदेश हुआ था। इनसे कोई जुर्माना वसूल नहीं हुआ। वह सजा भुगतकर  27 अगस्त, 1932 को जेल से छूटे गये। उनके द्वारा क्षमा याचना करना नहीं पाया गया।
(मुकदमा नंबर- 38 सन् 1930; थाना-गाजीपुर, सरकार बनाम बैकल आदि।)

सन् 1929 में कानपुर के फूल बाग में उन्होंने सत्याग्रह किया था जिस पर अंग्रेजों ने उन्हें 3 माह की सख्त कैद और तीन बेत मारने की सजा दी थी। इस सजा के बाद बाद बृजलाल अंग्रेज़ों के चंगुल से बैकल (पागल) बनकर किसी तरह से बचकर निकल आये थे। तब से अंज्रेज़ों और पुलिस वालों के बीच से बैकल की पहचान के साथ ही पेश आते रहे और इसी पहचान से इनको सजायें भी दी जाने लगीं तथा इन पर मुक़दमें चले।
(स्वतंत्रतता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल के मांझिल पुत्र रविशंकर से लेखक अमित राजपूत की सीधी बातचीत)

साल 1924 में जब झंडा गीत कानपुर में गाया गया तब बृजलाल पाल छात्र थे। वे बहुत तेज़-तर्रार स्वभाव के थे। इस समय इनकी उम्र मात्र 11 वर्ष की थी। वे फतेहपुर के तमाम कांग्रेसियों के साथ कानपुर जाकर के झंडा गीत गाने में सम्मिलित हुये थे। इसी के बाद से इनमें देश की आज़ादी के लिये काम करने का भारी जुनून पैदा हुआ और वे अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह से स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे।
(स्वतंत्रतता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल के मांझिल पुत्र रविशंकर से लेखक अमित राजपूत की सीधी बातचीत)

खागा नगर के इकलौते स्वतंत्रता सेनानी बृजलाल पाल 12 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़कर इंडियन नेशनल कांग्रेस के दफ्तर में जाकर विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लेने लगे थे। उनके साहस को देखकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें ‘वीर बालक’ की उपाधि तक दे डाली थी।

आजादी की लड़ाई के दौरान सन् 1942 में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ आंदोलन में खागा नगर निवासी बृजलाल पाल ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। इस आंदोलन के दौरान कानपुर के फूल बाग में इन्होने आजादी का प्रतीक तिरंगा झंडा भी फहराया था। इसमें भाग लेने पर इन्हें एक सप्ताह की सजा मिली थी। इसमें अंग्रेजो के जुल्मों को ताक में रखते हुए इस धरती मां के लाल ने अंग्रेजो के खिलाफ कड़ा मोर्चा लिया।

नमक क़ानून तोड़ने पर बृजलाल पाल को 2 माह, 13 दिन की कैद वर्धा जेल में काटनी पड़ी थी।
कानपुर में विदेशी कपड़ा जलाने के आरोप में इन्हें तीन सप्ताह की जेल हो गयी और ये पकड़कर कारागार में डाल दिये गये।
(दोआबा-वार्ता-फतेहपुर, 15 सितम्बर, 1995, पेज़-1)


कांग्रेस के उत्साही कार्यकर्ता बृजलाल सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भी थोड़ी अवधि के लिये जेल गये थे। (सूचना विभाग-उत्तर प्रदेश सरकार, पेज़-568)

Tuesday, 25 July 2017

यात्रा-वृतान्त : सनातनी अपमान का भीटा


∙ अमित राजपूत

चंपारन सत्याग्रह का सौवाँ साल चल रहा है। इसके शताब्दी वर्ष में मैं एक विशिष्ट दृष्टिकोण के साथ क़िताब लिख रहा हूं, नाम है- ‘चंपारन सत्याग्रह का गणेश’। ये क़िताब चंपारन सत्याग्रह की नीव डालने वाले पत्रकार शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी जी को केन्द्रित करके लिखी जा रही है और इसी सिलसिले में मैं गणेश जी के पैतृक ग्राम हथगांव (उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले की खागा तहसील में) और कर्मभूमि कानपुर में शोध और विश्लेषण की सहजता के लिए फ़तेहपुर जनपद की खागा तहसील में ही रुका हुआ हूं। काम ज़ोरों पर है। लेकिन मेरे सह-लेखक अजीत प्रताप सिंह चौहान ने मुझे पञ्चाक्षर पञ्चश्वरों (लोधेश्वर, थवईश्वर, तांबेश्वर, जागेश्वर और आधेश्वर) में से एक जागेश्वर महादेव के दर्शन करने की इच्छा जताई। यद्यपि मैने कुछ आनाकानी की, लेकिन अगले ही पल मैं चलने के लिए हां कर बैठा। एक घण्टे बाद ही हमने दुपहिया निकालकर हर हर महादेव कहकर जागेश्वर महादेव के दर्शन के लिए निकल पड़े।

सावन का महीना है। दो-चार दिन पहले ही यहां जमकर पानी बरस चुका है और आज धूप है। धूप भी ऐसी कि न तो ढंग की धूप ही है और न ही बदली। कुल मिलाकर फसफसी गरमी और उमस भरा मौसम है। खागा से निकल कर हम विजयीपुर के रास्ते जागेश्वर महादेव के धाम जा रहे हैं। वास्तव में हम दोनो लोग चूंकि बीते तीन-चार महीनों से शोध के सिलसिले में इतने रम गए हैं कि यहां भी जागेश्वर महादेव की ओर बढ़ते समय भक्त कम शोधार्थी और मुसाफ़िरी का अंदाज़ ही भरा है। मतलब साफ यह है कि हम कहीं भी ठहर सकते हैं और फुल टंकी पेट्रोल वाली हमारी काली रंग की दुपहिया हीरो-पैशन किसी भी तरफ मुड़ सकती हैं। फिर भी हम मुसाफ़िर की तरह ही सही, बाबा जागेश्वर महादेव के धाम की ओर हमारी दुपहिया गनगनाती चली ही जा रही है।
जागेश्वर महादेव का मन्दिर

यह हमारी कोई बड़ी यात्रा नहीं है, बल्कि यह तो रगड़ती-ठहरती मुसाफ़िरी है हमारी, जो रास्ते के पानी से भरे लबालब खेतों का आनन्द भी लेती जा रही है और कहीं-कहीं ठहर कर गाड़ी रोककर किसी सज्जन से बतियाने और झलने भी लगती है। वास्तव में यह कोई रोमांचक सफ़र भी नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी खांइयों से होकर हम गुजर रहे हों। यहां देवदार और चीड़ के वृक्षों की उत्तुंगता भी तो नहीं है और न ही बादलों से घिरे काले, सुनहरे और सफ़ेद पहाड़ ही हैं। यहां न गर्त है न कगार, इधर झरने भी नहीं हैं और न ही समुद्र की विशालता ही कहीं नज़र आ रही है। इस सफ़र में रूहानी ठण्ड भी तो नहीं है और न ही यहां सुन्दरवन सा जंगल ही हमें कहीं दिखा ; यहां तो सब समतल है... एकदम सपाट। बिल्कुल यथार्थ की तरह। इस वक़्त यहां के मौसम में लड़ाई है। बारिश की आहट है। घाम चटख है। गर्मी की उलझन में जी घबरा रहा है। प्रकृति में भी कोई रोमांस नहीं नज़र आ रहा है। काम से भरपूर काममुक्त ओस है, खर हैं, पानी और हवाएं भी। आज इधर प्रकृति बिल्कुल अलग ही मिज़ाज में है। एकदम चित्रलेखा में वर्णित यथार्थ-प्रकृति की तरह जैसा कि भगवती चरण वर्मा ने अपने उक्त उपन्यास में प्रकृति का वर्णन किया है। प्रकृति अपने वास्तविक स्वरूप में हैं। इसे स्पर्श करके मखमली ओट नहीं मिल रही है, बल्कि यह तो मेरे कोमल हाथों में चुभ सी रही है। पानी और हवाएं मुझे रोमांस से नहीं भर रहे हैं, बल्कि ये तो मन में चिड़चिड़ेपन को और भी बढ़ा रहे हैं। वास्तव में यहां की प्रकृति तो वही अनुभव दे रही है जो सत्य है। मतलब यह सपाट, समतल इलाका हमें यथार्थ बने रहने के लिए प्रेरित-कम-मजबूर कर रहा है। शायद यही कारण है कि इस इलाके के लोगों में भी सपाटपन और साफगोई यहां की इसी प्रकृति की देन है। वैसे प्रकृति को एक ही भाव में हमसूस करने की मेरी और भगवती चरण वर्मा की चिति का कारण यह हो सकता है कि हम दोनो ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हॉलैण्ड हाल छात्रावास के अपने-अपने ज़माने के अंतःवासी रहे हैं। वहां प्रकृति से साखी होना लगभग हर अंतःवासी का सौभाग्य भी है।

हम विजयीपुर चौराहे पहुंच गए। वहां से बिना रुके ही हमने दाहिने मुड़कर असोथर रोड धर लिया। इस रास्ते पर कहीं रुकने का मन नहीं किया हमारा। सफ़र कुछ ख़ासा लम्बा भी नहीं है, इसके अलावा रुकने पर उमस अपना चरम छूने लगती है। लिहाजा हम चलते ही गए। अगले ही झटके में हम पौन घण्टे का सफ़र तय करके असोथर क़स्बे को क्रॉस करने लगे। इसके बाद शुरू हुआ ऊबड़-खाबड़ भरा रास्ता, जो यूपी की योगी सरकार के सड़कों को गड्ढा-मुक्त कर देने के हवाहवाई अरमान जोकि अनुमान ही था शायद, कड़क तमाचा जड़ रहा है। असोथर की सड़कों से ही दे-लबालब कीचड़ है। हमारी दुपहिया गाड़ी के टॉयर उससे ऐसे लदे कि जैसे यूपीए-2 पर भ्रष्टाचार आ चिपका हो और यह सब नियति का खेल मान लिया गया हो बिल्कुल इस कीचड़ की तरह जो हमारी गाड़ी के टॉयरों में आ लपटा है। लेकिन करते भी क्या गाड़ी तो आगे बढ़नी ही है, जागेश्वर धाम की ओर जाने वाली हमारी भी और भ्रष्टाचार से युक्त सरकार का भी; कल भी और आज भी।
हम असोथर से  गाजीपुर की सड़क पकड़कर आगे बढ़ने लगे। यहां रास्ते के अगल-बगल मौजूद खेतों में धान रोपा जा रहा है। इधर असोथर क्षेत्र के धान की बेड़ के भी दिलचस्प क़िस्से हैं। पहले तो इधर जो किसान अपनी ब्याड़ लेकर गुजरते हम बड़े असरज से उन्हे रोकते और उनकी ब्याड़ को हैरानी से निहारने लगते, फिर उसके बारे में चर्चा भी करते। हमारी हैरानी को देखकर वो किसान हमसे ज़्यादा अचरज भरी नज़रों से हमें देखते और पूंछते कि “भइया कउन गांव के अहिव तुम… कहां रहत हो?” हम पर उनका ये संदेह भरी नज़रों से देखकर सवाल उछालना, हमें वहां से फौरन फुर्र काटने को मज़बूर कर देता और हम बाबा जागेश्वर के धाम के और नज़दीक पहुंचते जाते।
जागेश्वर महादेव मन्दिर द्वार
पाँच श्वरों में एक जागेश्वर :
गाजीपुर से तकरीबन सात किलोमीटर पश्चिम चलने पर हमें बाँए हाँथ पर सड़क से सौ मीटर से भी कम दूरी पर ही विराजमान दिखे जागेश्वर महादेव। पीले रंग का भव्य शिवाला। शिवाले के द्वार पर टंगीं सैकड़ों घण्टियाँ और उन घण्टियों पर टिकीं हज़ारों भक्तों की मिन्नतों की गूंज हमें शान्ति स्वर में साफ सुनाई पड़ने लगी। हमने अपनी गाड़ी खड़ी की और कुछ देर रुककर मन्दिर के पास में लगे हैण्डपम्प से हाथ-मुंह धुला। हैण्डपम्प के बगल में खड़े बेला के पेड़ से भगवान शिव को अर्पण करने के लिए कुछ फूल चुने। मन्दिर के बाहर एक उसके ठीक सामने और दूसरी उसके बिल्कुल बगल में नारियल और प्रसाद की दो दुकाने हैं। मेरी किताब ‘चंपारन सत्याग्रह का गणेश’ में मेरे सह-लेखक अजीत भइया (अजीत प्रताप सिंह चौहान बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के शोधार्थी हैं जोकि मेरे बड़े हैं और सीनियर भी, इसलिए मैं उन्हें अपने आदि से ही भइया कहकर पुकारता आ रहा हूं) ने शिवालय के बगल वाली दुकान से ही प्रसाद और नारियल ख़रीदा क्योंकि उसका विक्रेता एक नौजवान लड़का है। अजीत भइया को मैने अक्सर नौजवान कमासुतों से ही खरीदारी करते देखा है।

ख़ैर, हम दोनो ने जागेश्वर महादेव के अद्भुत शिवालय में प्रवेश किया। नारियल तोड़कर उसके जल से शिवलिंग का हमने अभिषेक किया और फिर क्रमशः रूद्र-सूक्तम् और शिवाष्टक का पाठ करके महा-मृत्युञ्जय मन्त्र का उच्चारण करते हुये वहीं आसन् जमाकर विराज गये। हमने करीब-करीब चालीस मिनट का समय उस शिवालय के भीतर ही बिताया। शिवालय के भीतर मंत्रों के जाप से निर्गत महानाद जोकि हमारे ही उच्चारण से हुआ था, हमें सुनकर आध्यात्मिकता का बोध हो रहा है। यह नाद वास्तव में शिवालय की बनावट और उसके गुम्बद की कारीगरी की वैज्ञानिकता का कमाल था। अद्भुत था। आनन्ददायी था। शक्तिदाता था।
असोथर का क़िला
राजा असोथर के यहां :
जागेश्वर महादेव के दर्शन करके हम वापस असोथर आये। असोथर महाभारत-कालीन अश्वस्थामा की प्रचीन नगरी है। हम यहां असोथर के राजा के महल पहुंचे। आज उनके महल में फिलहाल कोई नहीं था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि राजा असोथर के वर्तमान वारिस राजा विश्वेन्द्र पाल सिंह आज कानपुर चले गए हैं। लेकिन हम कुछ देर वहीं रुककर महल की भव्यता निहारने लगे, तभी एक सज्जन वहां पधारे और हमसे हमारे आने का कारण जाना। हमने उन्हे अपना परिचय देते हुए राजा से मिलने की इच्छा जताई। उस भद्र व्यक्ति ने खेद प्रकट करते हुए हमें यह बताया कि राजा साहब तो आज कानपुर में हैं लेकिन कुँवर साहब अपनी हवेली में आज मौजूद हैं। हमने फौरन ही उस जन से कुँवर तक हमारा संदेशा देने को कहा। अंत में हम राजकुँवर मनोज सिंह के साथ उनकी हवेली के भीतर थे। कुँवर मनोज सिंह के साथ अजीत भइया और मैने घण्टे भर बातचीत की। इस बातचीत में उन्होनें असोथर के राजा और अपने पूर्वजों राजा दुनियापत महाराज से लेकर राजा लक्ष्मण प्रसाद तक की ढेरों बातें हमसे साझा की। फिर उसी बीच कुँवर ने हमें जलपान कराया और अपना महल दिखाने लगे।

असोथर के राजा दुनिपत राय महाराज
कुँवर मनोज सिंह हमें बेहद तेज़तर्रार और नेक दिल वाले इंसान लगे। वो हमसे फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे। उन्होने अपने सभी पूर्वज़ों की तस्वीरें हमें दिखलाईं और महल के भीतर मौजूद पुराने मन्दिर और कूप के दर्शन भी कराये। राजा असोथर के इस महल से गाजीपुर तक की सुरंग भी महल में मौजूद है। क़रीब-क़रीब दो घण्टे से ऊपर का वक़्त हमने राजा असोथर के यहां बिताया और फिर हम वापस होने लगे।

असोथर से निकलने के बाद दोपहर ढल चुकी थी। सूरज की तपन का तीखापन भी पहले से कमतर हो आया था। लेकिन यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उमस और फसफसापन भी कुछ कम हुआ था। हम विजयीपुर की तरफ वापस बढ़ चले। रास्ते में कुछ दूर निकलने के बाद बाँयी तरफ एक पुराना पक्के जगत का कुँआ दिखाई पड़ा। वहां पर कुछ लाल रंग की झण्डियां भी नज़र आ रही थीं। कुँए की बाट मन को इतना मोह रही थी कि हमसे रहा न गया। हम रुके और रुककर कुँए को झांकने लगे। आश्चर्य तो यह देखकर था कि चार हाथ नीचे ही कुँए में लबालब पानी भरा है। कुँए के पास की मिट्टी गीली थी। उस इलाक़े में जगह-जगह ढेरों गहरे बिल बने हुए थे। अजीत भइया ने मुझे बताया कि ये ज़हरीले साँपों के बिल हैं, इसलिए यहां देर तलक रुकना ख़तरा भरा है। मैने अजीत भइया की बात मानकर तत्काल वहां से चलने को कहा। हम जैसे ही वहां से निकले मैने पीछे मुड़कर देखा तो दो साँप एक साथ तेजी से ठीक उसी जगह पर रेंगते नज़र आये जहां पर अभी-अभी हम खड़े थे। मैं एकदम से काँप उठा और सोचने लगा कि अगर एक मिनट पहले हम वहां से न निकले होते तो क्या होता!!!


सनातनी अपमान का भीटा :
कुछ दूर और चलने के बाद यानी असोथर से देखें तो तक़रीबन 6-7 किलोमीटर आगे विजयीपुर की ओर बढ़ने पर हमें पता चला कि यहां एक बड़ा पुराना भीटा है और उससे हज़ारों साल पुरानी मूर्तियां निकलती है। यह जानकर निश्चय ही तत्काल हम तीनों का मन उस भीटें की ओर मुड़ने का हो चला। मेरा, अजीत भइया का और हमारी हीरो-पैशन का। हम दोनों को लेकर पैशन उस भीटें की ओर दाहिने हाँथ मुड़ पड़ी।

विजयीपुर रोड से दाहिने हाँथ अन्दर घुसने पर लगभग 3-4 किलोमीटर अन्दर जाने पर पुर बुज़ुर्ग ग्रामसभा के अंतर्गत बायीं ओर एक बहुत बड़ा करीब 10 से 12 एकड़ में फैला हुआ विशाल टीला अपना सीना चौड़ा किए हुए खड़ा है। यह ‘ससुर खदेरी- नं. 02’ नदी के किनारे बसा हुआ एक बहुत बड़ा भीटा है। अच्छे डामर (तारकोल) की सड़क उस भीटे के मध्य में ऊपर बने हुए एक मन्दिर तक जाती है। हम इसी सड़क के सहारे टीले के बीचोबीच पहुंचे।
विष्णु के सर्वावतार वाली विखण्डित मूर्ति

वहां पहुंचते ही बड़ी फुर्ती के साथ हम दोनों ने ही सबसे पहले मन्दिर के बाएं हाँथ पर भगवान श्रीहरि विष्णु के सर्वावतार वाली एक भव्य मूर्ति को देखा। यद्यपि मूर्ति इतनी भव्य थी कि उसकी आभा को देख कोई भी इस ओर खिंचा चला आए, लेकिन वह खण्डित मूर्ति थी जिसका सिर और शरीर के मध्य भाग का पूरा हिस्सा नदारद था। भगवान विष्णु के एक-एक करके सभी अवतारों का व्यक्तिगत खण्डन उस मूर्ति में साफ देखा जा सकता है।

सर्पगाँठ वाली गुर्लभ कलाकृति
इसी के साथ मूर्ति की कारीगरी के बारे में कुछ कहना मतलब कला का अपमान करने जैसा है मेरे लिए। मुझे तो अभी भी उस मूर्ति के आधार में बनी सर्पगाँठ हैरान कर रही है। अब तक ऐसी बेजोड़ कारीगरी नहीं देखी थी मैने और न ही अजीत भइया ने।

टीले के मध्य में एक मन्दिर बना है जो आधुनिक है। लेकिन इसके गर्भग्रह में विराजे शिवलिंग की मूर्ति अपने ही समय की है। वहां तीन सन्त मौजूद थे। मैने उनसे उनके ताम्रपात्र में भरे जल को पीने की इच्छा जतायी। जल ग्रहण करने के बादे हमने उन साधुओं से बातचीत की तो उन्होने बताया कि यह धाम आज फिलहाल रहिमालेश्वर (रहिमल बाबा) धाम के नाम से प्रचलित है, लेकिन इसके अतीत के बारे में उन्हें कुछ भी नहीं पता था।

घण्टों बातचीत के बाद उन सन्तों से हमें जो पता चला वह यह है कि यहां पौधा रोपने के लिए भीटे की कुछ मिट्टी हटाने मात्र से ही यहां वाकई पुरानी-पुरानी मूर्तियां निकल आती हैं। मतलब इस टीले पर जहां पर भी खुदाई की जा रही है वहां पर से कोई न कोई प्राचीन छोटी-बड़ी मूर्ति निकल आ रही है। वैसे भी इस भीटे को देखकर ही कोई भी आम जन इसके पुरातन का अन्दाज़ा आसानी से लगा लेगा।
प्राप्त भग्नावशेष

यह सब जानकर और वहां धरी हज़ारों खण्डित मूर्तियों और भग्नावशेषों को देखकर हम दोनो चकित ही खड़े रहे। पहली बार एक साथ एक ही स्तान पर इतनी ज़्यादा संख्या में खण्डित मूर्तियां हम दोनों ने ही पहली दफ़ा अपनी-अपनी नंगी आँखों से देखा था। वास्तव में हम सन्न थे और हारे हुए से भी।

उन साधुओं में से एक ने हमें दिखाया कि मन्दिर की बायीं दीवार के एकदम बाट (आधार) पर जहां से शिवलिंग पर जल चढ़ाने के वह निर्गत होता है, एक पत्थर था जोकि उसके बचपन में एकदम छोटा सा ही था। लेकिन आज वह कच्छप के आकार में आधा बाहर निकला हुआ है जोकि धीरे-धीरे इस आकार में आया है। हकीक़त में मैने भी इस पत्थर को देखा और उसमें कच्छप के पैरों के स्पष्ट आकारों को भी।

कच्छप की आकृति का निकने वाला पत्थर
इस जगह का वर्णन कैसे करूँ! समझ में नहीं आ रहा है कि यहां की शान्ति का बखान करूं कि यहां के तालाबों और मन्दिर के पीछे से गुजरती ससुर खदेरी नदी के कलरव का! यहां पीपल के तमाम वृक्ष हैं और खूब हरियाली भी। मन्दिर में खड़े होकर चारों दिशाओं में किसी भी तरफ दृष्टिपात कीजिए विस्तार ही विस्तार नज़र आ रहा है जो महानता का स्पष्ट एहसास कराती है। काले-काले पत्थरों की टूटी हुई दिखाई दे रही मूर्तियों के भग्न गूढ़ता का मर्म बताने का प्रयास कर रहे हैं और भयभीत भी कर रहे हैं। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष से भी पुराना है।

आगे की बातचीत में यह साफ हो चला कि उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर जनपद के इस विशालकाय मन्दिर को तोड़ने वाला कोई और नहीं बल्कि महाक्रूर शासक औरंगज़ेब ही था। उसी ने इन महाप्रताती शिलाओं को चकनाचूर कर खंडहर बना दिया। यह पुरातात्विक दस्तावेज यह बताने के लिए काफी हैं कि फतेहपुर जिले के प्राचीन मंदिरों को सबसे ज्यादा औरंगजेब ने ही ध्वस्त किया। इसी का परिणाम है कि वर्तमान समय में इस जनपद में एक भी ऐसा दुर्लभ प्राचीनतम और विशाल मंदिर कहीं नहीं बचा है।

इतिहास भी बताता है कि औरंगज़ेब ने राजगद्दी की लड़ाई में अपने भाई शहजादा शुजा को फ़तेहपुर के खजुहा नामक स्थान पर 5 फरवरी, 1659 ई. को युद्ध करके हराया और उसकी हत्या कर दी। इसी विजय की ख़ुशी में औरंगज़ेब ने खजुहा में बाग़-बादशाही, तालाब और सराँय आदि बनवाए थे जोकि अब भी मौजूद हैं।
लेखक के साथ अजीत चौहान


औरंगज़ेब के शासनकाल में प्रसिद्ध खत्री कुल में जन्में सन्त कवि चन्ददास ने हँसवा में रहकर अपनी भक्तिपूर्ण काव्य की अमृत-वाणी प्रवाहित की। इस तरह से खजुहा के बाद इसी जनपद में निकट मौजूद इस मन्दिर के औरंगज़ेब द्वारा ही विखण्डन के प्रमाण भी लोग सत्य बताते हैं। इसके अलावा मूर्तियां जिस ढंग से विखण्डित हैं वह भी चीख-चीखकर औरंगज़ेब के क्रूरता की सबसे बड़ी गवाही दे रही हैं।

अब तक लगभग शाम ढलने लगी थी और उसी के साथ हमारा मन भी। अब हम अपने इतिहास, धर्म और संस्कृति की इतनी क्रूर उपेक्षा के प्रतीकों के चश्मदीद हो चुके हैं। यह हमारे लिए एक हृदयविदारक घटना है। निश्चित रूप से यह खण्ड हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रतीकों पर अपमानित प्रहार का प्रतीक है। ऐसे में भला समस्त हिन्दू प्रखर होकर अपने अपमान के लिए सक्रिय होवें तो भला इसमें क्या अतिशयोक्ति!!!

लेखक अमित राजपूत
हम अपने पीछे जिस भीटे को छोड़कर चले आ रहे हैं अब दोबारा इसे देखने का मन नहीं हो रहा है। मैं कोसता हूं खुद को कि आख़िर कैसे हमारी हीरो-पैशन उस ओर उत्साह से मुड़ चली थी। देखो न, अब तो ये भी अपना पैशन खोकर कैसे हारी और थकी हुई चल रही है।

यह जो भीटा अभी तक हमें हैरान कर रहा था अब हारा हुआ महसूस करा रहा है मुझे। यह तो वास्तव में सनातनी अपमान का भीटा सा प्रतीत हो रहा है अब मुझे।

हम विजयीपुर कब डाँक (पार कर) गये पता भी नहीं चला। अब तो सभी मौन हैं- प्रकृति, उमस, हवा, अजीत भइया, मैं और निर्जीव हमारी हीरो-पैशन।

(इति।)

Saturday, 8 July 2017

सूबे में ब्राह्मणों की लगातार हो रही हत्याओं पर चुप क्यों हैं योगी ?



-अमित राजपूत-
इसे अतिरेक कहें या अतिशयोक्ति लेकिन ये सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश के भीतर रायबरेली जिले में 5 ब्राह्मणों की हुई एक साथ नृशंस हत्या ने योगी आदित्यनाथ को शक के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है | इस घटना के तक़रीबन 10 दिन के भीतर ही फतेहपुर जिले की खागा तहसील के भखरना गांव में एक ब्राह्मण शिक्षक बालकृष्ण तिवारी को उन्हीं के घर के पास ही उनको बेरहमी के साथ मार डाला गया | हालांकि गांव वाले बताते हैं कि उस अध्यापक का किसी के साथ कोई लेन-देन अथवा कोई झगड़ा नहीं था | सूबे में आसपास के क्षेत्र की लगभग यह दूसरी घटना है जिसमें ब्राह्मणों की हत्याएं हुई हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ की पुलिस उनके अपराधियों तक पहुंच पाने में नाकाम है, जबकि यही योगी आदित्यनाथ इन जानलेवा अपराधियों को अल्टीमेटम के लहजे नें प्रदेश के बाहर जाने को कह दिया था |

ऐसे में सवाल यह है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बातें या उनके अल्टीमेटम को ये अपराधी मजाकिया लहजे में ले रहे हैं या फिर खुद सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनको क्या अपने लहजे में कभी जवाब दे पाने में सक्षम भी हो पाएंगे भला?

वास्तव में उत्तर प्रदेश के भीतर इस बीच ब्राह्मणों की लगातार हो रही हत्याएं किस ओर इशारा कर रही हैं ? इसी बीच योगी सरकार के कद्दावर नेता और मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के  बेहद शर्मनाक बयानों का क्या मतलब निकाला जाए? हकीक़त तो यही है कि शपथ ग्रहण के बाद गोरखपुर के मंच से योगी आदित्यनाथ ने खुलेआम यह फरमान सुनाया था कि उत्तर प्रदेश के भीतर अपराधी और इस तरह की खल प्रवृत्ति के लोग या तो तत्काल सुधर कर यहां रहने लगें और पुरानी प्रवृतियों को छोड़ दें अथवा प्रदेश छोड़ कर बाहर चले जाएं |

ऐसे में क्या योगी आदित्यनाथ या उनकी पुलिस सूबे की जनता को यह भरोसा दिला पाने में खुद को खरा पाती है कि वह इन अपराधियों की जल्द से जल्द धर-पकड़ करके उनको जेल के भीतर भेज देगी|

ज़मीनी हकीक़त यह भी बताती है कि इस तरह की हत्याओं में संलिप्त मुख्य अपराधी धड़ल्ले से फरार होकर बाहर घूम रहे हैं और एकाध मोहरेनुमा पकड़े गए लोगों को जेल और थानों के भीतर पुलिस ने पकड़ कर रखा भी है, यानी दिखाने के लिए तो पुलिस वालों के पास अपराधी हैं, लेकिन योगी आदित्यनाथ जिन माफियाओं और गुंडों की बात गोरखपुर के मंच से कर रहे थे, वह तो सूबे की सरकार की ढीला-हवाली के चलते योगी की नाक के नीचे आज भी अन्ना घूम रहे हैं और हत्याएं दर हत्याएं होती चली जा रही हैं | क्या ऐसे बड़े-बड़े हिस्ट्रीशीटरों का पता योगी लगा पाने में नाकाम हैं?

भखरना गांव के 'बीकेटी हत्याकांड' में ब्राह्मण शिक्षक बालकृष्ण तिवारी की हत्या का मुख्य आरोपी हिस्ट्रीशीटर बच्छराज पहले की तरह ही निर्द्वन्द्व घूम रहा है | ऐसे में सोचना यह होगा कि क्या वो अपराधी जो अब तक की सरकारों में खुलेआम घूमते आए हैं, उनको योगी सरकार जेल के भीतर पहुंचा पाने में कामयाब होगी ? फिलहाल योगी आदित्यनाथ ने जितनी मजबूती के साथ उस मंच पर दंभ के स्वर में जो बातें कही थी वह सब जमीन पर दिखाई पड़ता नहीं पड़ रहा है |

ऐसे में फिलहाल उन जिलों की जनता जहां इस तरह की घटनाएं हुई हैं उनका ध्यान पूरी तरह से योगी आदित्यनाथ की पुलिस की कार्यवाही और मुख्य रूप से योगी के अटेंशन पर लगा हुआ है कि वह किस तरह से ऐसी घटनाओं से निपटते हैं और क्या वाकई बच्छराज जैसे अपराधियों को पकड़ कर योगी आदित्यनाथ जेल में ठूंस पाने में कामयाब होंगे जिससे कि उत्तर प्रदेश के ऐसे गांवों में वहां के लोग चैन की सांस ले सकें |

Monday, 26 June 2017

भाजपा जाति को पहचानती है




-अमित राजपूत-
देश को दोबारा दलित राष्ट्रपति मिलने जा रहा है | केआर नारायणन के बाद रामनाथ कोविंद के रूप में दलित राष्ट्रपति होने के अपने अलग मायने हैं | कोविंद उत्तर प्रदेश से आते हैं और उनकी कर्मभूमि बिहार की है, जोकि राजनीतिक आकाश में उनकी चमक के पैमाने गढ़ने के लिए उत्तरदायी है | इसीलिए इनके दलित होने के मायने बढ़ जाते हैं |

उत्तर प्रदेश और बिहार दो ऐसे राज्य हैं जहां की राजनीतिक आबोहवा में जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं | ऐसे में किसी पद विशेष के लिए उसकी जाति की पहचान सर्वोच्च रखी जाती है | लिहाजा यही कारण रहा है कि देश का आम जन रामनाथ कोविंद को जानने से पहले यह जान गया कि वह दलित समुदाय से आते हैं | वास्तव में देश आज जिन राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों से होकर गुजर रहा है उस हिसाब से यह बहुत शुभ संकेत है कि देश का आम जन देश के इतने बड़े पद के लिए नियुक्त होने जा रहे व्यक्ति की जाति को रोमांचित हो कर देख रहा है |

इस देश में अक्सर किसी प्राइम पोस्ट के लिए दलित का नाम आते ही उसकी योग्यता पर सवाल खड़े किए जाने की परंपरा अभी टूटी नहीं है | राम नाथ कोविंद जैसे अच्छे योग्य व्यक्ति को भी इससे होकर गुजरना पड़ रहा है, फिर चाहे भले ही गोविंद एक अच्छे स्कॉलर रहे हों, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने के साथ भारत सरकार के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड हो चुके हैं या फिर मोरारजी देसाई जैसे चितेरे प्रधानमंत्री के 3 साल तक पीए रह चुकने के अलावा सिविल सर्विसेज में चयन लेकर छोड़ देने का उनमें माद्दा रहा हो अथवा वह भले ही बिहार के गवर्नर रहे हों लेकिन बावजूद इसके उन पर योग्यता को प्रूफ कर पाने जैसी उंगलियां टेढ़ी हुई है | वास्तव में मैं इस बात को नकार नहीं सकता कि यह सब उनके दलित मात्र होने के कारण ही हुआ है | ऐसे में भला फिर जब कोई दलित राष्ट्रपति के पद को सुशोभित करे तो उसे दलित की दृष्टि से क्यों ना देखा जाए कि वह दलित है और राष्ट्रपति है | निश्चित रूप से भाजपा ने यह काम किया है |

इसमें कोई संदेह नहीं है कि समता के लिहाज से कोरी जाति के रामनाथ कोविंद का राष्ट्रपति होना देश को एक नई दिशा में ले जाने वाला हो सकता है | यह सुखद है | हालांकि तमाम लोगों को राजनीति के हव्वे से बहुत भय हैं | उनका मानना है कि इसमें भाजपा ने जातिवादी कार्ड खेला है | बड़ा साफ़ है कि जब राजनीति के इस पार बैठे लोग यह समझ जाते हैं कि वह दलित हैं, तो भला राजनीति के उस पार बैठे लोगों की चिति इस मामले में शिथिल कैसे हो जाए ? यद्यपि ये राजनीति के भय के मारे हुए लोग यह सोचे बैठे रहते हैं, कि जाति की पहचान के मामले में उनकी चिति काम करे और राजनीतिक लोगों की इस मामले में चिति शून्य बनी रहे | यही सोच उनके दुख और भय का कारण भी है | एक बार राज्यसभा टीवी की एक डिबेट में मैं समाजशास्त्री सतीश देशपांडे के साथ था | उस दिन उन्होंने एक बड़ी दिलचस्प बात कही थी कि हमें जातिवाद समाप्त करने के लिए सबसे पहले जाति को पहचानना होगा | इसके बाद उसकी बेहतरी के लिए काम करके ही हम समता को प्राप्त कर सकेंगे और फिर जातिवाद का भय समाज से खत्म हो जाएगा | ऐसे में यह साफ पता चलता है कि भाजपा जाति को पहचानती है | संभवता राष्ट्रपति जैसे पद के लिए एक योग्य दलित व्यक्ति को ढूंढ पाना भाजपा के लिए मुश्किल काम रहा हो | अब जब रामनाथ कोविंद एनडीए के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति होने जा रहे हैं तो इसके लिए भाजपा की पीठ थपथपाने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए | इसमें विपक्ष और वाम दलों के लोगों को भी भाजपा की सराहना करने से भी नहीं चूकना चाहिए |

रामनाथ कोविंद का नाम राष्ट्रपति पद के लिए डिक्लियर होते ही मैंने कुछ अजीब सी बातें भी सुनी और पढ़ी है | कुछ लोगों का यह भी कहना है कि हम तो रामनाथ कोविंद को जानते ही नहीं थे | वास्तव में यह सब देख सुनकर मैं बड़ा सोच में पड़ जाता हूं कि जब लोग बिहार जैसे राज्य के राज्यपाल के लिए यह कह देते हैं कि हम उन्हें जानते नहीं हैं तो फिर ऐसे लोगों की चेतना के बारे में अंदाजा लगाया जा सकता है और उनकी बातों के हल्केपन को भी समझा जा सकता है | ऐसे सभी छद्म लोग आइकॉन की पॉलिटिक्स के मारे हुए लोग होते हैं |

दूसरा, एक समुदाय ऐसे लोगों का भी है जो यह कहता है कि आज से 10 साल पहले राष्ट्रपति के रूप में एक रबर स्टाम्प बनाने का जो काम कांग्रेस ने किया था वही काम आज भाजपा कर रही है | यह सभी पूर्वाग्रह की मार झेले हुए सशंकित लोग हैं क्योंकि अब तक रामनाथ कोविंद ने कोई भी ऐसा बयान नहीं दिया है जैसा कि कांग्रेस के कई रबर स्टाम्प जैसे- सबसे पहले साल 1974 में 5वें राष्ट्रपति के रूप में फखरुद्दीन अली अहमद ने, सन् 1982 में 7वें राष्ट्रपति के रूप में जरनैल सिंह (ज्ञानी जैल सिंह) ने और बारहवीं राष्ट्रपति के रूप में सन् 2007 में प्रतिभा पाटिल ने दिए थे और इन्होने पूरे समय अपनी मोहरों की स्याही का रंग चटक बना कर रखा था | हालांकि 13वें राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी उस चक्र को तोड़ पाने में सफल रहे हैं |

एक बात यह भी है कि जब ज्ञानी जैल सिंह को एक सिख राष्ट्रपति के रूप में देखा जा सकता है, प्रतिभा पाटिल को स्वयं कांग्रेस ने एक महिला के तौर पर ही प्रोजेक्ट कर सहानुभूति बटोरने का काम किया था तो रामनाथ कोविंद के बतौर दलित जाने जाने पर किसी को कैसी आपत्ति हो सकती है ? वैसे भी किसी की जाति को पहचाना जाना उस के उत्थान के लिए आवश्यक है | भाजपा ने रामनाथ कोविंद के मामले में जाति को पहचाना है, यह हितकर है | इसके अलावा भाजपा जिस परंपरा की राजनीति को धारण कर चुकी है उस मिज़ाज के लिहाज से भी यह उसके द्वारा लिया गया बिल्कुल सही दिशा का फैसला है |

Sunday, 5 March 2017

होली के हुड़दंग में....केशव बना जमूरा


• अमित राजपूत
अबकी बार चुनाव में, हुआ है ऐसा पोल.. केशव भाई के नाम का, खूब बजा है ढोल। ढोल के भीतर पोल हवे फिर पीछे से नटनी बोली। बोली कि भइया पोल हवे ये केसुवा बड़ा सयाना, कहो तो धई के खोल देई जो हमका देव बयाना।

पूछा नहीं किसी ने इसको दर-दर ठोकर खाया, वीएचपी और बजरंग दल में खूब दिखाया माया। माया मिली इसे तब देखो, जब निक्कर इसको भाया। भाया सुन लो बात खरी है, निक्कर का रंग भूरा। भूरा की क्या बात करें ये उनका बना जमूरा... नाच जमूरा... शाबाश! नाच जमूरा.... जमकर तड़क-भड़क कर, वह-वह धिन्नक-धिन्नक-धिन्नक धिन।

बुरा न मानो होली है हमने इसकी खोली है। साथ भली है आज मेरे ये कमसिन नटनी बाला, नटखट इसकी बोली-बानी जब से फागुन आया। चख कर रस गुझियों का देखों इसने पता लगाया, केशव को जाने इक बारी केसर बहुत था भाया। केसर वो कश्मीर का छोड़ो काशी प्रान्त का गोया,  पत्ती दो पत्ती पर ना भई पूरे भवन की आशा, भारद्वाज की धरती थी वो हाथ लगी निराशा।

लेकर भइया केशव वहां से मुंह चले बेरंगा, संघ की जिम्मेदारी निभाते बढ़िया मिल गया धंधा। बूचड़खाने सभी पता है इनको, ना लो इनसे पंगा, पंगे की जो बात करोगे कर देंगे ये नंगा नंगे बहुत रहे हैं केशव, भइया केस बड़े हैं इनके, जबसे दिखने लगे ये तगड़े तब से केस बढ़े हैं इनके। इनकी खूब चली दुकनिया हर... हर्र हर्र हर... हर्र।

नटनी बोली जानो पढ़े-लिखे हैं केशव भइया। 302 अउर 153 इनका रट्टा मारे, 420 की गिनती रट-रट बहुत जगह मुंह मारें। मारे शरम के मरिगें बहुतो, कुछ तो छोड़ दिहिन हैं आशा। काहे पाली अइसन हउआ, अब तो माननीय भन केसउवा।

बात पते की सुन लो भइया नटनी भोली प्यारी, गौस मोहम्मद यार थे इनकी चर्चित रही है यारी। याराना वर्दीधारी का नहीं रही फिर रार, केशव का धन बाढ़ा अइसा जाकर बना पहाड़। पेट्रोल पंप की जय हो..। एग्रो ट्रेडिंग की जय हो..। कामधेनु लाजिस्टिक तुम्हरी बड़ी है माया, जबसे आई चौखट इनके कोई न रोड़ा आया। मइया तुम्हरी भी जय हो..। जीवन ज्योति से ज्योति खिली है मनोकामना देवी, केशव को अब भंग चढ़ गई कहलाए ये सेवी। सेवा नहीं चाहिए तुम्हरी.. भइया रंग चढ़ो बंबइया। हीरो बनकर अइसा नाचे बजने लग गए गाजे-बाजे होरी होरी...होरी..होरी..हां।


होली के हुड़दंग में, रंग गए यूं फैल। ज्यों-ज्यों ये घिसते गए, त्यों-त्यों बाढ़ा मैल। मैल कटी फिर खिल गए फूल दुनियादारी गए ये भूल। नेहरू की थाती में जाकर जमकर केशव राजा, मोदी जी की नज़र पड़ी तो खूब बजाया बाजा। यूपी की फिर मिली कमान, और भी चैय्ये इन्हे उड़ान। मोदी जो हैं टरै न टारैं, केशव का जिगरा धइ धइ बाढ़ै।  छोटा मोदी खुद को बोलें, गरजें तो अब अवनी डोले। जबसे इनका बढ़ा रुबाब, पीएम का ये देखें ख्वाब। हमरी नटनी भोली छोरी है, बुरा न मानो होरी है।

Sunday, 8 January 2017

क्या एक वोट इतना शक्तिशाली है?

• अमित राजपूत

अबकी बार उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, मणिपुर और गोवा राज्यों में हो रहे विधानसभा के चुनावों में मतदान के औसत से साफ हो जाएगा कि वोट ना करने जाने की प्रवृत्ति लोगों में मानसिक और आदतन है। लोगों की यह मानसिक प्रवृत्ति और दामन थामकर बैठ जाने वाली आदत उनकी निष्क्रियता और असंपृक्तता का द्योतक है। ये बातें इन चुनावों में इसलिए साफ हो जाएंगी क्योंकि कोई भी वयस्क व्यक्ति इस बार ईवीएम मशीन में नोटा के उपयोग की सुविधा के बाद यह कहकर नहीं बच सकता है कि मुझे इनमें से कोई भी प्रत्याशी पसन्द नहीं है। मतलब साफ है कि इस बार आपको एक जागरुक और संपृक्त नागरिक के रूप में हर हाल में बूथ तक जाना ही होगा।

वास्तव में यह सब उन्हीं सामान्य जन के लिए ही है जो लोकतंत्र के एक-एक तृण हैं। इससे देश का आधार ही मज़बूत होता है। फर्ज़ कीजिए एक भद्र अथवा जागरुक नागरिक जो कि कुंठावश मतदान वाले दिन मतदान केन्द्र तक नहीं जाता है, उसका कितना बड़ा दंश राज्य पांच सालों तक झेलता रहता है। हालांकि इसमें वह भद्र व्यक्ति भी नहीं बच पाता है जो वोट करने नहीं गया। बिल्कुल साफ है कि  ऐसे लोगों के वोट ना देने जाने से एक ख़ास तरह के लोगों के मतों की संख्या का औसत बढ़ता जाता है और इसी बढ़े हुए औसत मत के प्रतिनिधि का साकार रूप ही जनता को मिलता है जोकि सभी के लिए प्रतिनिधित्व का उत्तरदायी होता है। ऐसे में अच्छे प्रतिनिधि के लिए भद्र और विवेकशील लोगों का मतदान केन्द्र तक पहुंचना बहुत ही आवश्यक हो जाता है।


रूसो की सामान्य इच्छा भी यही थी कि समाज में वह नियम लागू हों जो किसी एक वर्ग की इच्छा ही ना रहे बल्कि इसमें राज्य के सभी वर्गों के लोग सम्मिलित हो और फिर जो प्रतिफल मिले उसे ही नेतृत्व समझा जाए। इसके लिए रूसो ने विधायकों को आवश्यक बताया है। उन्होने कहा है कि विधायकों की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि यद्यपि जनता सर्वदा लोककल्याण चाहती है। तथापि जनता उसको समझने में सदैव समर्थ नहीं होती है। फिर भी संभव है कि विधायक के बेहतर चुनाव में समाज के हर वर्ग के लोग अपना मतदान करें तो औसत उपयुक्त विधायक का चुनाव हो सकता है। इसलिए सभी का मतदान करना अति आवश्यक है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक अधिक पढ़े-लिखे और बाबू जी टाईप के लोगों का मतदान औसत बेहद चौंका देने वाला है। शायद हर साल दोषारोपण वाले भाव से जब यही भद्र लोग गिनाते हैं कि सरकार में इतने लोग माफिया हैं और इतने लोग अपराधी है, तब ये शायद मतदान वाले दिन बूथ पर अपनी अनुपस्थिति को ये पूरी तरह से नज़रअंदाज कर देते हैं।

इनमें से कुछ ऐसे चतुर चितेरे हैं जो यह सोचकर वोट करने नहीं जाते हैं कि भला मेरे एक अकेले वोट ना देने से भला किसका क्या बिगड़ जाएगा। ऐसे लोग एक तो स्वयं की अस्मिता और उपस्थिति को ना समझने वाले लोग होते हैं। इसके अलावा उनको मैं यह साफ किए देता हूं कि उनके एक अकेले के वोट ना करने से किसी का क्या बिगड़ा जा रहा है। तो भइया, आपके एक अकेले के वोट ना करने से किसी का नहीं बल्कि आपकी ही पूरी सरकार की सूरत ही बन-बिगड़ जाती है। इसके लिए आपको देश नहीं बल्कि दुनियाभर में अनेक उदाहरण देखने को मिलेंगे।
सबसे पहले अपने ही देश में कर्नाटक राज्य का उदाहरण लीजिए। साल 2004 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में एआर कृष्णमूर्ति सांथेमाराहल्ली की एससी सुरक्षित सीट से आर ध्रुवनारायण के खिलाफ लड़ रहे थे। इसमें कृष्णमूर्ति सिर्फ एक वोट के अन्तर से हार गए थे। इस तरह की घटना के लिए कर्नाटक भारत का पहला राज्य बना।

इसके चार साल बाद ही ऐसी ही एक बड़ी घटना राजस्थान राज्य में देखने को मिली थी। इस बार तो एक वोट के कारण मुख्यमंत्री ही तब्दील हो गया था। बात साल 2008 की है। राजस्थान में कांग्रेस प्रमुख सीपी जोशी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। वो एसेम्बली चुनाव में कल्याण सिंह चौहान से मात्र एक वोट के अन्तर से ही हार गए थे। इतना ही नहीं एक वोट का अन्तर कितना शक्तिशाली होता है पूछना है तो जर्मनी के लोगों से पूछिए, क्योंकि साल 1923 में एडोल्फ हिटलर एक वोट के अन्तर की जीत से ही नाजी दल का मुखिया बना था।
अमेरिका में भी एक वोट के हेरफेर से बड़े-बड़े परिवर्तन देखने को मिलते हैं। साल 1776 में अमेरिका को एक वोट की बदौलत ही जर्मन की जगह अंग्रेज़ी के रूप में उनकी मातृभाषा मिली थी। इसके अलावा सन् 1910 में न्यूयार्क के 36वें कांग्रेसनल डिस्ट्रिक चुनाव में एक रिपब्लिक उम्मीदवार सिर्फ एक वोट से हार गया था। इससे रिपब्लिक पार्टी में जैसे शोक की लहर सी दौड़ गई थी।

ग़ौरतलब है कि साल 1845 में टेक्सास एक वोट के अन्तर से ही संयुक्त राष्ट्र का हिस्सा बन सका। इंग्लैण्ड के मैसाचुएट्स प्रान्त के गवर्नर के चुनाव में सन् 1839 में मार्कस मॉर्टन भी मात्र एक वोट से जीत गए थे। इसी तरह पांच दशक पहले सन् 1968 में दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया के एसेम्बली हाउस के चुनाव में मार्टिन कैमरॉन सिर्फ एक वोट से हार गए थे।

फ्रांस की बात करें तो वहां पूरा का पूरा सत्ता का स्वरूप ही एक वोट के अन्तर से बदल गया था, वरना वहां के लोगों को थोड़ी चूक से पुरानी राजशाही को ही ढोना पड़ता। साल 1875 में एक वोट की जीत से ही फ्रांस में राजशाही से गणतंत्र आ सका था।

इसमें कोई शक नहीं है कि भारत के चुनावों में इतने कम वोट का फर्क बड़ी दूर की बात है। यहां तो लहर में चुनाव हो जाते हैं। साल 2014 का आम चुनाव एक बड़ा उदाहरण है। जहां हिन्दुतान में सभी वर्गों की मतदान में हिस्सेदारी की कमी के चलते वोटों के जीत-हार के बीच लम्बी खाई है वहीं इस मामले में कनाडा के चुनाव तो जगजाहिर हैं।

कनाडा में चार्ल्स वेस्ले कल्टर सन् 1887 के संघीय चुनाव में हाल्डीमांड से एक वोट से हार गए थे। इसी साल संघीय चुनाव में ही मॉण्टमोरेन्सी से पीवी वैलिन भी एक वोट से हार गए थे। इसके बाद यहां वोट को लेकर लोग सजग रहने लगे और कुछ एक सालों के अन्तर में मतदान के ये चमत्कार दिखते रहे।
1891 में कनाडा के संघीय चुनाव में वेन्टवॉर्थ साउथ से जेम्स रसेल भी एक वोट के अन्तर से हार गए थे। सी साल निकोलेट से ईसी प्रिन्स मात्र एक वोट से हार गए थे। 1896 में यॉर्क ईस्ट से हेनरी फ्रैंकलैण्ड एक वोट से हार गए। 1900 में सेलकिर्क से जॉन हर्बर मात्र एक वोट से हार गए थे। इसी जगह से इससे पहले 1896 के चुनाव में ह्यूग आर्मस्ट्रांग भी एक वोट से हार गए थे। इसके अलावा1900 में बर्स नॉर्थे से जेई कैम्पबेल भी एक वोट से हारे थे।

दुनिया में एक-एक वोट की ताक़त के इतने नायाब उदाहरणों के बाद भी यदि इसी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोग एक वोट की कीमत ना समझें और मतदान करने ना जाएं तो इस देश में निवास करने वाले जनों के भीतर बदलाव की ठंड पड़ी आज पर भला बीरबल की खिचड़ी के सिवाय क्या पकाया जा सकता है!

भारत के निर्वाचन आयोग के कारगर उपाय नोटा के उपयोग की सुविधा के बाद उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, पंजाब, मणिपुर और गोवा में हो रहे इन विधानसभा के चुनावों में एक-एक वोट की कीमत वसूल की जाएगी, ऐसी अपेक्षा है। वह भी तब, जब इन चुनावों में देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश भी शामिल जो देश की संसद का रंगोमिजाज तय करता है।