ब्राह्मण
Monday, 28 May 2018
दोज़ख़ की मिट्टी...
दूर कर लो जो बीमारी है
ये सियासत
,
रोज़ी,
तालीम
औ मजहब के
ज़र्रे
-
ज़र्रे में नफरत की ख़ुमारी है ।
डुबाकर शराब में यूँ फेंकते हो रोटियाँ
चल रही ऐसी ही ख़ातिरदारी है !
रहने दो।
बस
,
अपनापन हो
...
मिट्टी दोज़ख़ की भी प्यारी है ।।
रंग...
भीगे पिसे फिर फिटे इस क़दर
,
रंग होकर उन्हें बाख़ुदा कर दिया है।
लो
,
ढूढ़ेंगे उनके निशां अब हमें
आँधियों ने जिन्हें ग़ुमशुदा कर दिया है।
राब्ता...
सुहानी नज़्में टूटकर इन अश्क़िया हवाओं में हर्फ़-हर्फ़ हो गयीं
,
हैरत है
,
राब्ता नाक़बूल कर आदम की औलादें कितनी कमज़र्फ़ हो गयीं ।
कज़ा..
यूँ फेरा न करो नज़रें यार सज़ा है
,
तुम न समझोगे
,
किसी के लिए कज़ा है ।
Tuesday, 10 April 2018
इश्क़ की भाषा...
क़िस्सागो हूँ क़िस्सागोई करूँ कैसे
!
तार बेतार हुए डाक भी ज़रा कम आती ।
इश्क़ में रूह से वाचते हैं लोग
अब आप ही को समझ नहीं आती ।
Sunday, 8 April 2018
सुकूं की नींद...
नफ़रत तो मुँआ नींद से न जाने कब से हैं,
मुला तू है जिसे मेरे जज़्बातों के ख़्याल न आये ।
बस इक अहसास जो मिले तेरे होने का
तो जहाँ हो मुकम्मल, सुकूं की नींद आ जाये ।
तेरा मौन...
बेनम हवा में मेरी हरक़तों से बेबस हो तुम भी,
ऐसे देखा है मौन पर खीझते तुमको कई दफ़ा ।
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