Saturday, 30 September 2017

गणेश शंकर विद्यार्थीः आधुनिक इतिहास के महान प्रेरक


∙ अमित राजपूत

आश्विन (क्वाँर) सुदी-14, वार रविवार, संवत-1947 विक्रम (26 अक्टूबर, सन् 1890) को अपने ननिहाल इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में जन्में गणेश शंकर विद्यार्थी को आधुनिक इतिहास में एक महान प्रेरक के रूप में जाना जाता है। ये फ़तेहपुर ज़िले की सुविख्यात तहसील खागा के परगना क़स्बा हथगाम के रहने वाले थे। यहीं पर गणेशजी और उनके बड़े भाई शिव बाबा की प्रारम्भिक शिक्षा हुई। इसके बाद ग्वालियर में रहकर सन् 1905 में विद्यार्थी जी ने अंग्रेज़ी से मिडिल पास किया और सन् 1907 में वे द्वितीय श्रेणी में इण्टर पास हो गये। इसके बाद पहली बार विद्यार्थी जी ने करेंसी ऑफ़िस में 6 फरवरी, सन् 1908 को नौकरी करना प्रारंभ कर दिया था। लेकिन बाद में कई और नौकरियों में इनका मन न लगा। अन्त में अपने निश्चय के मुताबिक गणेश शंकर विद्यार्थी ने नवम्बर 1913 में ऐतिहासिक साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन आरम्भ कर दिया। इसे विद्यार्थी जी ने अपने मित्र शिवनारायण मिश्र और नारायण प्रसाद अरोड़ा के सहयोग से निकाला था। हालांकि कुछ दिनों बाद उनके सहयोगी नारायण प्रसाद अरोड़ा अलग हो गए, किन्तु शिव नारायण मिश्र अन्त तक सहयोग देते रहे।

प्रतापनामक इस एक मात्र शस्त्र को धारण करके विद्यार्थी जी अपने समय के शक्तिमान बन गए थे। आरम्भ से ही सामाजिक व संवेदनशील रहे दृढ़ इच्छाशक्ति वाले गणेश जी ने अपने व्यक्तित्व के प्रकाश का ऐसा पुंज तैयार किया कि उसके प्रकाश से इतिहास के कई स्तम्भ दैदीप्यमान हुए और वे उनके प्रेरणा स्रोत बनकर उभरे। यथा प्रेरणा पुंज गणेश शंकर विद्यार्थी सरदार भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, विजय कुमार सिन्हा, पंडित चंद्रशेखर आज़ाद और लाहिड़ी जैसे क्रान्तिवीर देशभक्त युवकों को प्रताप के प्रताप के दम पर क्रान्ति के कार्यों में मदद भी देते थे। इस प्रकार ये कहने में कोई भेद नहीं है कि आज़ादी की तमाम चिंगारियों को हवा देने में गणेशजी का मार्गदर्शन प्रमुख स्थान रखता रहा है।

यद्यपि प्रताप के संपादन से पहले भी विद्यार्थी जी ने हितवार्ता, कर्मयोगी,सरस्वती आदि पत्रों के लिए लेख-टिप्पणियां आदि लिखी थी। लेकिन विद्यार्थी जी ने प्रताप के द्वारा किसानों, मजदूरों एवं पीड़ित जनता की सेवा का ही व्रत लिया। उनके सामने मनुष्यता की कसौटी ही वही थी- मनुष्य उसी समय तक मनुष्य है जब तक उसकी दृष्टि के सामने कोई ऐसा ऊंचा आदर्श है जिसके लिए वह अपने प्राण तक न्यौछावर कर सके। इसके लिए किसानों, मजदूरों और दरिद्र नारायण की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। गणेशजी ने सिद्ध भी यही किया। उनका प्रताप पूर्णतः किसान आन्दोलन का समर्थक था। उसने किसानों पर होने वाले हर किसी के अत्याचारों का विरोध किया, विशेषकर तालुकेदारों और जमींदारों के आत्याचारों का खुलकर विरोध किया। इन कारणों से प्रताप की ख़्याति किसानों के हमदर्द अख़बार के रुप में दूर-दूर तक फैल गयी। इसका प्रभाव ये दिखा कि किसान जनता विद्यार्थी जी को प्रताप बाबा कहकर पुकारने लगी थी।

मजदूर-किसानों के प्राण-प्रेरकः

गणेशजी की पुत्री विमला विद्यार्थी बताती हैं कि विद्यार्थी जी का मजदूर सभा में प्रायः जाना होता था। गणेश जी प्रताप के दफ़्तर पर अक्सर रात 8-9 बजे तक या 10-11 बजे तक जैसी जरूरत होती रहते थे।साल 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में बकौल पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी की भी विशेष उपस्थिति रही। इस अधिवेशन में गणेशजी ने कांग्रेस का ध्यान किसानों की तरफ खीचने का प्रयास किया। उन्होने कहा कि जो संस्था किसानों और मजदूरों की सेवा से वंचित रहती है, वह अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकती है।

गणेशजी जैसे विशुद्ध क्रान्तिकारी थे वैसे ही ख़ालिस पत्रकार भी थे। तमाम अलग-अलग विचारधारा के लोगों के साथ उनका प्रायः सरोकार था।एक पत्रकार के रूप में गणेशशंकर विद्यार्थी ने किसानों की जितनी मदद की थी उतनी ही उन्होनें एक आन्दोलनकर्ता के रूप में भी भूमिका निभाकर उनकी मदद की। वास्तव में विद्यार्थी जी को किसी भी बात अथवा विचारधारा का पूर्वाग्रह कभी नहीं रहा। उन्होने हर पाले में जाकर लोगों को प्रेरित किया और उन्हें मदद पहुंचायी।

जब देश में किसान आन्दोलनों ने जोर पकड़ लिया था। तब जहां एक तरफ इन आन्दोलनों को समाप्त करने के लिए राजाओं और सूबेदारों के दबाव और धमकियों ने तमाम पत्र-पत्रिकाओं की निब को कुंटित बना डाला था वहीं गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रतापप्रान्त में किसानों के कंधे से कंधा मिलाकर डट कर लड़ने में जुटा था।

अवध किसान आंदोलन की संजीवनी बने गणेशः

जब अकाल के कगार में पूरा अवध घाँस पड़ा था तब वहां का किसान त्राति-त्राति करने लगा। ऊपर से ताल्लुकेदारों का कहर उन पर काल सा मंडराने लगा था। ऐसे में किसानों के पास आंदोलन के सिवाय कोई और विकल्प न रह गया था। बाबा रामचंद के नेतृत्व में किसानों का हुजूम रायबरेली के मुशीगंज बाज़ार के पश्चिमी फाटक पर उमड़ पड़ा। यद्यपि विकल्प शून्य हो चुकी किसानों की भीड़ बलिदान के संकल्प से अनुप्राणित थी तथापि हिंसात्मक आचरण के लिए भी वे कटिबद्ध थे। अंततः ताल्लुकेदार वीरपाल सिंह के इशारों पर अंग्रेज़ों ने किसानों पर एकबारगी गोलियां तड़तड़ा दी और देखते ही देखते मुंशीगंज की धरती किसानों के रक्त से सराबोर हो लाल हो उठी। पूरा मैदान आड़ी-तिरछी लाशों से पट गया।

तानाशाही का आलम यह रहा कि इस घटना का ज़िक्र करने वाले समाचार पत्र-पत्रिकाओं को धमकियां मिलीं और जिसने कुछ लिखा-पढ़ा तो उसे माफ़ी मांगनी पड़ी थी। इलाहाबाद से प्रकाशित नेहरू का द इंडिपेण्डेण्ट भी माफ़ी मांगने वाले अख़बारों में शामिल रहा। लेकिन विद्यार्थी जी ने अपने प्रताप में इस घटना की तुलना जलियांवाला बाग़ से करके डायरशाही नामक शीर्षक के साथ प्रमुखता से छापा और दबाव मिलने पर उल्टे अपने एक विशेष रिपोर्टर को इसकी छानबीन के लिए नियुक्त कर दिया। इसके चलते उन पर मुक़दमें हुए। अपने पैसों से ही गणेशजी को मुक़दमा भी लड़ना पड़ा। इस मुक़दमे में वे आर्थिक रुप से टूट गए और उन्हें जेल भी जाना पड़ा। बावजूद इसके अवध के किसानों द्वारा खड़े किये गए इस आंदोलन के मूर्छित होने पर गणेशजी के अडिग नेतृत्व ने इसे संजीवनी प्रदान की और आज लोग मुंशीगंज गोलीकाण्ड की क्रूरता से परिचित हैं एवं वहां शहीद हज़ारों हुतात्माओं को याद कर उनके बलिदान को नमन करते हैं। 

किसानों के बिजोलिया आंदोलन के बीजों को दिया पल्लवनः

राजस्थान के बिजोलिया किसान सत्याग्रह के नेता विजय सिंह पथिक जब चारो तरफ दौड़-भाग करके थक-हार कर अकुला गए तो उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि वो करें तो क्या करें। फिर उन्हेने आंदोलन के प्रभाव को शिथिल जानकर गणेश शंकर विद्यार्थी का साहारा लेना उचित समझा। पथिक ने गणेशजीको पत्र लिखा कि आप अपने समाचार पत्र प्रताप में बिजोलिया किसान आंदोलन के लिए लिखें। पत्र के जवाब में गणेशजी ने पथिक जी को लिखा था कि बिजोलिया किसान आंदोलन के लिए प्रताप के दरवाजे हमेशा के लिए खुले हैं। विद्यार्थी जी ने किया भी यही। वे व्यक्तिगत रुप से इस आंदोलन में शामिल हुए और मेवाड़ राज्य के प्रतिबंध के बावजूद किसानों पर अत्याचारों के संदर्भ में लगातार छापते रहे।

इतना ही नहीं, गणेशजी ने किसान सभा में सक्रिय भूमिका निभाई और कांग्रेस व अन्य विभिन्न मंचों से भी बिजोलिया किसान आंदोलन को उठाया। इसके अलावा दिल्ली में पथिक जी, गणेश शंकर विद्यार्थी और हर विलास शारदा के द्वारा राजपूताना मध्य भारत सभा की स्थापना भी हुयी।

चंपारन सत्याग्रह के श्रीगणेश में गणेशः

चंपारन सत्याग्रह की जड़ माने जाने वाले राजकुमार शुक्ल को गांधी से मिलाने वाले और चंपारन में पूरे मीडिया प्रोपेगेंडा के कर्ता-धर्ता स्वयं गणेश शंकर विद्यार्थी ही थे। इसके अलावा साल 1910 में पीर मोहम्मद मुनीस इलाहाबाद शहर में सर सुंदरलाल के घर रुके थे। तभी उनकी भी मुलाकात गणेशजी से हुई और उन्होंने गणेश जी से चंपारन में नील के किसानों के ऊपर हो रहे अत्याचार के विषय में विस्तृत जानकारी दी। इसके बाद गणेश शंकर विद्यार्थी ने गांधी जी को विवश किया कि वह चंपारण जाएं और शोषक निलहों से वहां के किसानों का उद्धार करें। गीतकार व कवि गिरजेश गरारा की निम्नलिखित पंक्तियां इस सन्दर्भ में सटीक जानकारी देती हैं-
राजकुमार शुक्ल जब आये ढिग माहिं
अपनी बिडंबना का आपसे सुनाये थे।
चंपारन सत्याग्रह का श्रीगणेश करिके
तौ गणेश गांधी का बिहार पहुंचाय थे।।

इस दफ़ा किसानों, मजदूरों और देश की ग़रीब जनता के आर्तनाद ने विद्यार्थी जी को अपनी ओर चुंबक की तरह खींच लिया था। चाहे देशी रियासतों के राजाओं द्वारा जनता के प्रति अत्याचार हो अथवा किसी जमींदार के द्वारा किसी किसान को सताया जा रहा हो, विद्यार्थी जी सब का सामना करने के लिए तैयार रहते थे। हालांकि उन्हें अपने समकालीन और आगे के पत्रकारों के मूल्यों और क्रिया कलापों के बारे में बड़ी चिन्ता थी। उन दिनों वे पत्रकारिता के भविष्य से इतने व्यथित थे कि उन्होने कहा- इस देश में भी समाचार पत्रों का आधार धन हो रहा है। धन ही से वे निकलते हैं। धन ही के आधार पर चलते हैं और बड़ी वेदना के साथ कहना पड़ता है कि उनमें काम करने वाले बहुत से पत्रकार भी धन ही की अभ्यर्थना करते हैं। अभी यहां पूरा अंधकार भी नहीं हुआ है किन्तु लक्षण वैसे ही हैं। कुछ ही दिन पश्चात यहां के समाचार पत्र भी मशीन के सदृश हो जाएंगे और उन में काम करने वाले पत्रकार केवल मशीन के पुर्जे। व्यक्तित्व न रहेगा, सत्य और असत्य का अंतर न रहेगा, अन्याय के विरुद्ध डट जाने और न्याय के लिए आदतों को बुलाने की चाह न रहेगी, रह जाएगा केवल खींची हुई लकीर पर चलना। मैं तो उस अवस्था को अच्छा नहीं कह सकता।

फ़तेहपुर कांग्रेस के ब्रह्माः

कानपुर में रहकर औपचारिक राजनीति करने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपने गृह जनपद फ़तेहपुर में कांग्रेस की स्थापना के लिए आगे आए। इन्होंने ही अपनी अगुवाई में यहां कांग्रेस का स्वरूप विकसित किया। गणेशशंकर विद्यार्थी जी के प्रबल प्रयासों से तिलक जी की मृत्यु 1 अगस्त, 1920 ई. को उनकी श्रृद्धांजलि सभा के अवसर पर प्रथम बार ज़िला फ़तेहपुर कांग्रेस कमेटी की स्थापना की गयी। इस प्रकार फ़तेहपुर मेंकांग्रेस का रचना का सम्पूर्ण श्रेय विद्यार्थी जी को जाता है। यहां हज़ारी लाल के फाटक में कांग्रेस का दफ्तर बनाया गया। इस ज़िला कांग्रेस फ़तेहपुर में गणेश जी के अंशपात्र श्याम लाल पार्षद को अध्यक्ष, विद्यार्थी जी के दूर के रिश्तेदार, कृपापात्र और सहयोगी एडवोकेट बाबू वंशगोपाल को मंत्री तथा अवध बिहारी को ज़िला कांग्रेस कमेटी का प्रथम कोषाध्यक्ष बनाया गया था। फ़तेहपुर कांग्रेस की स्थापना के बाद विद्यार्थी जी की राजनीतिक हलचलें कानपुर के साथ-साथ फ़तेहपुर में भी बहुत तेज़ हो गयीं। गणेश जी को तीसरी बार और सबसे चर्चित जेल की सज़ा सन् 1923 ई. में इसी फ़तेहपुर में ही एक राजनीतिक भाषण के दौरान हुयी थी।

विद्यार्थी जी की प्रेरणा का प्रतीक है झण्डा-गीतः

जब कांग्रेस ने निश्चय किया कि हम कांग्रेसियों को एक मंच व एक छांव देने के लिए उसका एक ध्वज तैयार करेंगे और इस ध्वज के तले समाज के लगभग हर वर्ग को एकत्रित कर देश की आज़ादी के लिए क़दम बढ़ाने का प्रोत्साहन देने का प्रयास करेंगे। तब कांग्रेस को अपने इस ध्वज के लिए एक गीत की कमी खल रही थी। ऐसे में कांग्रेस के तत्कालीन आला कमान ने अपने तिरंगे ध्वज के लिए गीत को लिखवाने और उसके चुनाव की ज़िम्मेदारी पत्रकार प्रवर गणेशशंकर विद्यार्थी को दे दी। अब कांग्रेस का झण्डा गीत कैसा हो, उसमें कितने पद हों और उसकी भाषा और प्रवाह आदि सब कुछ तय करने का काम विद्यार्थी जी पर ही था।

विद्यार्थी जी ऐसा झण्डा गीत लिखाना चाहते थे जो जन-जन की भाषा में हो और वीरत्वपूर्ण देशभक्ति का संचार कर सके। वे राष्ट्र के अन्तिम जन द्वारा भी गुनगुनाया जा सकने वाला हो और उसी लहजे में अपनी बात कह पाने वाला हो।

झण्डा गीत के लिए जन भाषा की चाह रखने वाले गणेशजी उस दौर के जितने भी प्रस्थापित, प्रसिद्ध और क्लिष्ट रचना करने वाले बड़े-बड़े लेखक थे उनसे दूर ही रहना चाहते थे। वे अपने लेखन से प्राप्त प्रसिद्धि और उसके वैभवानन्द में लम्बे समय तक विचरण करने वाले जटिल लेखकों से भी दूर रहना चाहते थे। इस तरह से विद्यार्थी जी की तलाश जटिल होती जा रही थी। फिर एक दिन चिराग तले अँधेरा वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए गणेश शंकर विद्यार्थी को फ़तेहपुर कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष श्याम लाल गुप्त पार्षद का नाम इसके लिए सूझा और उन्होने पार्षद जी को ही कांग्रेस का झण्डा गीत लिखने की ज़िम्मेदारी दे दी। अन्त में पार्षद जी ने विद्यार्थी जी के सामने पूरे देश को प्रिय विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झण्डा ऊँचा रहे हमारा को रच कर प्रस्तुत कर दिया। पार्षद जी के द्वारा रचे मूल गीत में 7 पद (कुल 37 पंक्तियां) थे।

खादी के उत्थान के अगुवा बनें गणेशः

महात्मा गाँधी के बरक्स गणेशशंकर विद्यार्थी ने भी खादी और ग्रामोद्योग की पौध को सींचने के लिए नरवल में 29 मई सन् 1929 में खादी और स्वदेशी के लिए नरवल सेवा आश्रमनाम से एक केन्द्र खोला था। केन्द्र के खुल जाने के बाद वहां पाठशाला और पुस्तकालय अधिक खोले गए, चरखा लगने लगे तथा खद्दर भी तैयार होने लगे।

गणेशजी ने जिस सेवा आश्रम की स्थापना की थी उसे पार्षद जी ने आज़ादी के बाद गणेश सेवा आश्रम का नाम देकर उस खादी ग्राम उद्योग केन्द्र को आगे चलाया। इसके 13 अन्य केन्द्र फ़तेहपुर सहित अन्य पड़ोसी ज़िलों में खोले गये। इन सभी केन्द्रों पर अब तेल, साबुन, ऊनी, सूती, रेशमी वस्त्र, सूत, चरखे व संबंधित यंत्रों का उत्पादन, विक्रय आदि कार्य बड़े स्तर पर होने लगे। ऐसे ही प्रयत्न यह दर्शाते हैं कि गणेशजी ने खादी और स्वदेशी के उत्थान के लिए अविस्मरणीय काम किये हैं जोकि आज भी दृष्टया हैं।

सद्भावना के दधीचिः

हिन्दू-मुस्लिम एकता के ज़बरदस्त हामी होने के साथ-साथ सद्भावना के साक्षी रहे प्रेरणामूर्ति विद्यार्थी जी ने सामाजिक समरसता और सद्भावना के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। भगत सिंह की फांसी के दूसरे ही दिन मंगलवार 24 मार्च, सन् 1931 ई. (चैत्र, सुदी-5, संवत्-1988) को कानपुर में हिन्दू-मुस्लिम दंगा शुरु हो गया।

24 की रात और 25 को प्रातः दंगे का रूप और भी भीषण हो गया। चारों तरफ से लोगों के मरने, घायल होने, दुकानों के जलाये जाने और लूटे जाने के समाचार मिलने लगे। यद्यपि गणेशजी की तबीयत पहले से ही ख़राब थी बावजूद इसके इन रोमांचक समाचारों को सुनकर उनका दयापूर्ण एवं परोपकारी हृदय अपने को संभाल न सका और वे 9 बजे प्रातः केवल थोड़ा सा दूध पीकर लोगों को बचाने के लिए चल दिये। लेकिन ये तो 20वीं सदी में जी रहे इस दधीचि के परीक्षा की घड़ी थी। उन्हें इस दंगे में अपने प्राणों को बलिदान करना पड़ा। उस दिन विद्यार्थी जी के इस बलिदान से भारत की धरती गौरवांवित हो उठी। गणेश जी बलिदान के बाद बाबू बनारसी दास चतुर्वेदी ने लिखा कि आज उस दीनबंधु के लिए किसान रो रहा है। अब कौन उनके उदर ज्वाला को शांत करने के लिए स्वयं आग में कूद पड़ेगा?”


वास्तव में अपने समय के लगभग सभी आयामों में प्रेरणा के स्रोत रहे गणेश शंकर विद्यार्थी के न रह जाने और उनके असमय चले जाने से इतिहास के कुछ सुनहरे और श्रेष्ठता का अनुभव कराने वाले पन्ने कोरे ही रह गये।

Thursday, 7 September 2017

गौरी लंकेश की लाश पर लबादे



∙ अमित राजपूत

किसी विशेष विचारधारा वाले राजनेता की मृत्यु के बाद भी ऐसी अस्पृश्यता नहीं देखी जाती जैसा कि कन्नड़ पत्रकार गौरी लंकेश की मृत्यु के बाद देखने को मिल रही है। लंकेश भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से 1983-84 बैच की पासआउट निर्भीक पत्रकार हैं। 5 सितम्बर को कर्नाटक में उनके आवास पर गोली मारकर हुई उनकी हत्या के बाद पूरे राष्ट्रीय मीडिया में ख़ासकर उस तबके में जो राजनीति में दिलचस्पी रखते हैं, निखिल दधीच नाम के शख़्स के दो आपत्तिजनक ट्वीट के कारण एक शोर सा मच गया उनकी मौत का। इसमें सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस निखिल नाम के व्यक्ति को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ट्वीटर पर फॉलो करते हैं। यही कारण रहा है कि भाजपा और संघ विरोधी लोगों ने गौरी की हत्या का ठीकरा कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार की बजाय केन्द्र की भाजपा सरकार पर फोड़ना शुरू कर दिया।

इसका सबसे पहले प्रकटीकरण दिल्ली के प्रेस क्लब में देखने को मिला जहां जेएनयू में देशद्रोही नारों के मामलों से चर्चा में आए कन्हैया कुमार ने पत्रकारों के बीच अपना वक्तव्य रखा। इससे तमाम पत्रकारों को नाराजगी हुई कि गौरी लंकेश की निर्मम हत्या पर एक विशेष धड़ा राजनीति पर आमदा है। वह उसको केन्द्र की भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ भुनाने की कोशिश में लगे हैं। इस पर स्वयं आईआईएमसी में गौरी लंकेश के जूनियर रहे वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा का मानना है कि जो लोग प्रेस क्लब में थे उसमें से ज़्यादातर ने गौरी लंकेश को पढ़ने की बात तो दूर उनका नाम भी पहली बार सुना होगा। वो हत्या के विरोध में कम.. मोदी के विरोध में ज़्यादा इकट्ठा हुए थे। हमारी संवेदना गौरी लंकेश के परिजनों के लिए है, इन पक्षकारों के लिए क़तई नहीं।

वास्तव में यह बड़ा हास्यास्पद है कि निखिल दधीच नाम के उस जन की लिखी बात को कोई पूरे दक्षिण पंथ का बयान मानकर कैसे हल्ला कर सकता है। यद्यपि सरकार की ओर से सूचना और प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी और उससे पहले इसके राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने अपनी संवेदना अपने ट्विटर अकाउण्ट पर दे दी थी। इसके अलावा भी तमाम लोगों को गौरी की हत्या पर दुख है और उन्होने इसे जताया भी। हालांकि उन लोगों को जिन्होने पूर्वाग्रह में ही लंकेश की हत्या के गुनहगारों को चुन लिया है, उनको इस पर भी विरोधाभास दिखा। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि ये वही लोग हैं जिनको गौरी लंकेश की हत्या पर किसी की प्रतिक्रिया में विरोधाभास दिखाई दे रहा है, जो उनकी लाश को सच में अपनी-अपनी विचारधारा की चटनी लगाकर चाटना चाहते हैं.. उनकी लाश पर अपनी-अपनी विचारधाराओं और राजनीतिक हथकण्डों का लबादा ओढ़ाना चाहते हैं।

एक बात गौर करने लायक है कि गोरी की हत्या से एक दिन पूर्व ही दिल्ली के प्रेस क्लब से बाहर निकलते समय भड़ास मीडिया के पत्रकार यशवंत सिंह पर हमला हुआ और उनको ज़ोरदार ढंग से पीटा गया। उसके दूसरे दिन लंकेश की हत्या। इस घटनाक्रम में तो पत्रकारों की जमात को एक सुर में पत्रकार सुरक्षा के वास्ते कोई कारगर क़दम तत्काल उठा लिए जाने की सरकार से पुरजोर मांग करनी चाहिए। किन सब के सब एक और पत्रकार की लाश पर अपना-अपना लबादा अलंकृत कर देना चाहते हैं। सच पूछो तो प्रेस क्लब टाइप वाले इन पत्रकारों को शिवानी भटनागर से गौरी लंकेश तक, इस बीच राजदेव, दाभोलकर, पंसारे और कुलबर्गी जैसों की हत्याओं का कोई रंज नहीं। वरना ये उस दिन प्रेस क्लब में बुलाकर कन्हैया की राजनीतिक बंसी की धुन नहीं सुन रहे होते, बल्कि इतनी तीव्रता वाली चीत्कार फाड़ते कि सत्ता से कोई मज़बूत सुरक्षा का कवच बनकर इनके आवरण में ढल जाता।

हालांकि नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (इण्डिया) के राष्ट्रीय महासचिव रतन दीक्षित की माने तो इसकी राज्य इकाइयों ने कई स्थानों पर पत्रकारों के हित मे पत्रकार सुरक्षा कानून निर्माण की मांग को प्रमुखता से उठाते हुए गौरी लंकेश की हत्या की निंदा की और पूरे प्रकरण की जांच को सीबीआई को सौंपने की मांग भी की है। उनका मानना है कि इससे जो भी लोग इस दुखद घटना का अपने राजनीतिक हितों की स्वार्थ साधना करने के लिए कुप्रचार कर पत्रकारों की एकता को खंडित करने की कुत्सित कोशिश मे लग गए हैं, उनकी भी साजिश देश के सामने आ जाएगी।

इसके अलावा तमाम विचारधाराओं को दरकिनार करते हुए मात्र अपनी एलुमनी के नाते आईआईएमसी एलुमनी एसोसिएशन (इम्का) ने गौरी की हत्या पर हैरानी जताते हुए एसआईटी के गठन की मांग की जोकि पूरी हो गई है। इसके राष्ट्रीय महासचिव मिहिर रंजन ने इस मामले में एक पत्र भी जारी किया है। इसके अलवा इम्का की तरफ से देश के अलग-अलग हिस्सों में शोक सभाएं भी आयोजित हो रही हैं।


इसी तरह से ही देश के अन्य पत्रकारों से भी अपेक्षा की जानी चाहिए कि वे गौरी लंकेश की हत्या की कड़ी से कड़ी निंदा करें न कि किसी ख़ास विचारधारा में ख़ुद को समेटकर उनकी हत्या पर जश्न का सा माहौल बनाएं और न ही उनकी धधकती लाश पर राजनीति की राल धुरकें जिससे कि नफरत की लपटें दूर तलक जाकर हरे-भरे पत्रकारों की एकता वाले विशाल वृक्ष की ख़ूबसूरत लताओं को झुलसा दें।

Monday, 4 September 2017

गोडसे बनाम अनाम


∙ अमित राजपूत

यहां हमारे सामने दो पात्र हैं जो भारत के ऐसे दो हस्ताक्षरों से सरोकार रखते हैं जिनके न रह जाने पर उस समय भारत की दिशा और दशा बदल गयी थी। आज दुर्भाग्यवश देश इनको कुछ इस तरह से जानता है- पहला, नाथूराम गोडसे जिसे कथित प्रगतिशील  और सेकुलर जमात एक हिन्दू हत्यारा के रूप में व्याख्यायित करती है जिसने प्रार्थना करते समय असंतोषवश महात्मा गांधी की हत्या कर दी थी। यद्यपि गोडसे हत्या के समय सिर्फ गोडसे ही था, हिन्दू विशेष नहीं; और आज भी लोग उसे गोडसे के रूप में ही जानते हैं। वहीं गोडसे के बरक्स यहां पर जो दूसरा पात्र है वो अनाम है। वो महान पत्रकार और तत्कालीन संयुक्त प्रान्त की कांग्रेस के अध्यक्ष गणेश शंकर विद्यार्थी का हत्यारा है। वही प्रगतिशील लोग विद्यार्थी जी की हत्या को सांप्रदायिक दंगे का परिणाम कहते हैं। यद्यपि तब से लेकर अब तक उनके इस हत्यारे को लोग सिर्फ और सिर्फ इसी परिचय से जानते हैं कि वो एक मुसलमान था जिसने गणेशजी को अकारण ही बिना किसी वाद या विचार के ही कारसेवा सेवा करते हिये उन्हें मौत के घाट उतार दिया।

कांग्रेसी नेता गणेशजी की हत्या गांधी की तरह किसी असंतोष का कारण न थी। उनकी ये हत्या दंगे के स्वरूप में लिपटी हुयी सोची-समझी इरादतन हत्या थी जिसकी पड़ताल 25 मार्च, 1931 को उनकी हत्या से लेकर आज तक कांग्रेस करा ही न सकी या यूं भी कह लें कि कराना मुनासिब ही न समझा। गणेश शंकर विद्यार्थी हिन्दू-मुस्लिम एकता के ज़बरदस्त हामी थे। बावजूद इसके कि वो हिन्दू जमात से ताल्लुख़ रखते हैं इस इरादे से मुसलमानों द्वारा घेरकर उनकी हत्या कर दी गयी और फिर भी उनका हत्यारा सिर्फ़ हत्यारा है न कि मुस्लिम हत्यारा। वहीं गांधी की हत्या जोकि उनकी ही नीतियों से उपजे बहुसंख्यक असन्तोष का कारण थी, उनका हत्यारा गोडसे आज़ादी के 70 सालों बाद भी एक हिन्दू हत्यारा कहा जाता है जबकि गांधीजी की हत्या के विषय की परिधि में सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति श्री कपूर के नेतृत्व में एक आयोग बिठाया गया जो यह बताती है कि गांधी की हत्या उनकी नीतियों के कारण होना सम्भव था, गोडसे के ही शब्दों में देखें तो गांधी जी ने देश को छल कर देश के टुकड़े किये हैं, क्योंकि ऐसा न्यायालय या कानून नहीं था जिसके आधार पर ऐसे अपराधी को दण्ड दिया जा सकता। इसलिए मैंने गांधी जी को गोली मारी उनको दण्ड देने का केवल यही एक तरीका रह गया था। इसलिए हम कह सकते हैं कि फिर गोडसे नहीं तो कोई और...। निर्वासन का दंश झेल रहा मदन लाल पहवा इसका साफ उदाहरण है जिसने गांधी की हत्या के पूर्व ही प्रार्थना सभा में हमला किया और बम दागे लेकिन उसे फौरन गिरफ़्तार कर लिया गया।

जस्टिस कपूर के प्रतिवृत्त के खण्ड 2, पृष्ठ-177, अनुच्छेद 21/217 पर यह भी साफ है कि किसी की भी यह इच्छा नहीं थी कि कोई गांधीजी को बचावे। इसकी जानकारी भी बहुत लोगों को पहले से थी कि गांधी जी की हत्या होने वाली है। उनकी हत्या का तत्कालीन बम्बई राज्य के मुख्य सचिव जयप्रकाश और हरीश समेत तमाम नेता गणों को पूर्व ज्ञान था किन्तु वे सब बेशक उदासीन बनकर गांधी की हत्या का इंतजार करते रहे। इसका आशय यह है कि वह सभी उस समय गांधी की नीतियों के विरोध में ही रहे।

श्री पुरुषोत्तम त्रिकमदास ने गांधी की हत्या के कारणों पर कपूर आयोग के समक्ष गवाही भी दी थी कि मुसलमानों का अनुनय अथवा संतुष्टि, कोलकाता और नोआखाली में गांधी जी द्वारा किए हुए शान्ति प्रतिस्थापना के प्रयोग और पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलाने का उनका हठ जो उनके अनशन के दबाव से कार्यान्वित करना पड़ा और हिन्दू सभा की गांधीजी के प्रति धारणा; ये कारण गांधी जी की हत्या के लिए पर्याप्त थे। वास्तव में यहां सिर्फ गांधी की नीतियों का विरोध हुआ और यह विरोध हिंसक हो गया। इसका आशय यह नहीं है कि वह हिंसा करने वाला बार-बार हिन्दू के रूप में पहचाना जाये। यद्यपि ऐसा ही होता आया है और देश को अंधेरे में रखकर हिन्दू-मुस्लिम के बीज बोते रहा गया है। हालांकि गोडसे ने हिन्दू मानसिकता को व्याप्त करके गांधी की हत्या नहीं की थी, यह इसलिए भी नहीं माना जा सकता है कि ऐसी मानसिकता वाले का एक हिन्दू की ही हत्या करना कैसे उचित होगा। दूसरा प्रमाण स्वयं गोडसे द्वारा 14 नवंबर, 1949 को अपने भाई चि. दत्तात्रेय गोडसे को लिखा गया मृत्यु-पत्र है जिसमें वह लिखता है कि अपने भारत वर्ष की सीमा-रेखा सिन्धु नदी है जिसके किनारों पर वेदों की रचना है। वह सिन्धु नदी जिस शुभ दिन में फिर भारतवर्ष के ध्वज की छाया में स्वच्छंदता से बहती रहेगी उन दिनों में मेरी अस्थियों का हिस्सा उस सिन्धु नदी में बहा दिया जाए। यह मेरी इच्छा सत्य सृष्टि में आने के लिए शायद और भी एक-दो पीढ़ी का समय लग जाए तो भी चिंता नहीं, उस दिन तक वह अवश्य वैसा ही रखो और आपके जीवन में वह शुभ दिन न आए तो आप के वारिसों को यह मेरी अंतिम इच्छा बतलाते जाना। इससे साफ समझ में आता है कि गोडसे की इच्छा मात्र अखण्ड भारत की थी। वो विभाजन के ख़िलाफ़ था मुसलमानों के नहीं, क्योंकि सिन्धु के भारत में मिलने से वहां के मुसलमान भी तो भारत के ही हो जाएंगे। अतएव उसने कभी मुसलमानों को घृणा भाव से देखा हो यह स्पष्ट नहीं।

दूसरी ओर, जब दंगे में गणेशजी लोगों को बचाने निकले थे तो उनके साथ दो हिन्दू और एक मुस्लिम स्वयंसेवक थे। मुस्लिम आततायियों ने उनके ऊपर लाठी, छूरे, भाले और न जाने किन-किन अस्त्रों के पशुवत वार किए। मुसलमान स्वयंसेवक कुछ देर बाद मुसलमान समझ कर छोड़ दिया गया। दोनों हिन्दू स्वयंसेवक बुरी तरह घायल हुए। इनमें से ज्वाला दत्त नामक एक स्वयंसेवक तो ख़ून ले लथलथ होकर वही स्वर्गवासी हुये पर दूसरे की जान बच गयी। शंकर राव टाकलीकर नामक हिन्दू सज्जन जो स्वयंसेवकों में बच गए थे उनका बयान इस प्रकार है- मुसलमान स्वयंसेवक पर मुसलमान होने के कारण थोड़ी ही मार पड़ी, वह छोड़ दिया गया। विद्यार्थी जी के सिर पर लाठी पड़ी। खून निकलने लगा। मुझे चक्कर आ गया। मैं विद्यार्थी जी का नाम लेकर चिल्ला पड़ा। इस पर किसी ने पीछे से आवाज़ दी- गणेश जी जहन्नुम में गए... ।

इससे यह बड़ा साफ है कि गणेश जी के हत्यारे को इसका पूरा भान था कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान। उसने इसी बिनाह पर गणेश जी के साथ गये मुसलमान स्वयंसेवक को भाग जाने को कहा और अन्य सभी पर जान की आफत बन गए। विद्यार्थी जी की हत्या पर उनकी पुत्री विमला विद्यार्थी की तत्कालिक टिप्पणी भी इसे पूर्ण दंगा नही मानती वे इसे सुनियोजित हत्या कहती हैं। वे मानती हैं कि यह एक सुनियोजित दंगा था, ब्रिटिश सत्ता का मक़सद दो समुदायों में दंगा कराना था और उससे भी अहम चीज़ विद्यार्थी जी को, जो इस सत्ता का अमूल-चूल परिवर्तन करना चाहते थे सदैव के लिए अपने रास्ते से हटाना था।

ऐसे में देश को स्वयं तय करना चाहिए कि गांधीजी का हत्यारा हिन्दू था या सिर्फ हत्यारा। विद्यार्थीजी का हत्यारा मुसलमान था कि सिर्फ एक हत्यारा। यद्यपि गांधीजी के हत्यारे ने उच्च न्यायालय से पुनः आवेदन कर अपनी दोष सिद्धि का आह्वान नहीं किया। उसने हत्या के बाद भी अपनी बात रखी। वो कहता है कि वास्तव में मेरे जीवन का उसी दिन अंत हो गया था जब मैंने गांधी पर गोली चलाई थी। मैं मानता हूं कि गांधी जी ने देश के लिए बहुत कष्ट उठाए जिसके कारण मैं उनकी सेवा के प्रति एवं उनके प्रति नतमस्तक हूं, किन्तु देश के इस सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि के विभाजन का अधिकार नहीं है। अपने देश के प्रति भक्ति भाव रखना यदि पाप है तो मैं स्वीकार करता हूं कि वह पाप मैंने किया है, यदि वह पुण्य है तो उससे जनित पुण्य पद पर मेरा नम्र अधिकार है। मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा कार्य नीति की दृष्टि से पूर्णतया उचित है। मुझे इस बात में लेशमात्र भी संदेह नहीं कि भविष्य में किसी समय सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेंगे तो वह मेरे कार्य को उचित ठहराएंगे।

Sunday, 6 August 2017

फ़िल्म का अनुभव संसार है ‘टॉयलेट’




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम स्वच्छ भारत मिशन के तहत हर घर में शौचालय बनवाने के प्रयासों में एक प्रयास अभिनेता अक्षय कुमार का है उनकी फ़िल्म टॉयलेट ..एक प्रम कथा। इस फ़िल्म का टाइटल ट्रैक ही इस फ़िल्म का सार है- ये कहना है इस टाइटल ट्रैक को अपने शानदार संगीत से सजाने, संवारने और इसके संदेश को अपनी उंगलियों से अनुभव कराने वाले युवा संगीतकार विक्की प्रसाद का। उन्होने इस फ़िल्म के कई और बेहद चर्चित गानों में अपना संगीत दिया है। उन तमाम गीतों और विक्की के उतार-चढ़ाव भरे स्ट्रगल के बारे में अमित राजपूत ने उनसे सीधी बातचीत की है। प्रस्तुत हैं अंश-

∙ इतनी छोटी ही उम्र में टॉयलेट ..एक प्रेम कथा जैसी बड़ी फ़िल्म के संगीतकार बन गये। क्या कहेंगे ?
(हंसकर...) मेहनत रंग ले आयी। बहुत ही बढ़िया महसूस हो रहा है। यही सोच कर आये थे मुम्बई। मुझे लगता है हर किसी म्यूजीशियन का यही सपना होता है कि उसे एक बड़ी एण्ट्री मिल जाये तो क्या कहने। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मुझे नीरज पाण्डेय जी की फ़िल्म के टाइटल ट्रैक सहित कई गानों के साथ अच्छी शुरुआत करने का मौका मिला। इसे मैं क़िस्मत ही मानता हूं क्योंकि इससे अच्छी तो शुरूआत नहीं हो सकती थी। मुझे ऐसी शुरूआत करके ख़ुशी हो रही है।


∙ संगीत के साथ आपका जुड़ाव कब और कैसे हुआ ?
मैने सबसे पहले तीन साल से गाना शुरू किया था। उसे ही संगीत से मेरा जुड़ाव कहा जा सकता है। तब मेरे एक सर थे उनकी फेयरवेल पार्टी में मैंने एक गीत गाया था- चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना। तब उन्होंने ख़ुश होकर मुझे पाँच रुपये ईनाम में दिये थे। तब मैं इससे बहुत मोटीवेट हुआ और फ़िर उसके बाद लगा रहा बहुत कुछ सीखने में। लेकिन सीखने से ज़्यादा मैने सुना बहुत अधिक है।

∙ किस सिंगर के साथ ज़्यादा अच्छी केमिस्ट्री रही आपकी ?
सभी के साथ मेरा अच्छा रहा फिर चाहे वो सोनू जी हों, श्रेया मैम हो गयीं या सुनिधि जी हो या फिर चाहे सुखविन्दर जी ही हो। हाँ, सुखविंदर जी और सोनू जी के साथ काफी अच्छा रहा मेरा। उन लोगों से बातें भी होती हैं मेरी। सुखविन्दर जी तो मतलब बहुत मानते हैं मुझे। काफी अच्छे से बात करते हैं वो।

∙ सॉन्ग बखेड़ा.. ये आपका गाना बहुत ज्यादा पसन्द किया जा रहा है। हर वर्ग के लोग इसे खूब सराह रहे हैं !
बखेड़ा मेरे दिल के बहुत ही करीब है। इसके साथ मेरे इमोशन्स भी जुड़े हुए हैं। जब मैं इसे बना रहा था तो इसका मुखड़ा बन गया था। अन्तरें में थोड़ा दिक्कत आ रही थी। कई बार अटका ये गाना। मैं अन्तरा बार-बार करके दे रहा था हर बार वो रिजेक्ट हो जा रहा था। ऐसी भी स्थिति आ गयी थी कि शायद गाना रिजेक्ट भी हो जाता और इसके साथ मैं नहीं जुड़ पाता। लेकिन अन्त में थोड़ा मैं रुका और इस पर फिर से काम किया। इसके बाद जो है वो आप सबके सामने हैं. अच्छा लग रहा है कि लोग इसे सराह रहे हैं। लेकिन फ़िल्म डायरेक्टर के द्वारा जो मुझे पहला टास्क दिया गया था वो टाइटल ट्रैक था। फिर भी बखेड़ा ही सबसे पहले सेलेक्ट हुआ। इसके बाद मुझे हंस मत पगली भी करने का मौका मिला।  

∙ फ़िल्म का टाइटल ट्रैक टॉयलेट इतनी देरी से क्यों लाया गया ?
ये तो ख़ैर मैं नहीं बता सकता हूं कि इतनी देर से क्यों लाया गया। पर हां, हो सकता है कि फ़िल्म की अपनी प्रमोशनल स्ट्रैटजी रही हो। प्रमोशन के प्वाइंट ऑफ़ व्यू से भी इसे फ़िल्म रिलीज़ के दस दिन पहले ही रिलीज़ किया गया होगा क्योंकि वैसे भी ये गाना टॉयलेटऔरों से एकदम अलग है जोकि फ़िल्म का सार है। आप ये भी कह सकते हैं कि फ़िल्म का अनुभव संसार है टॉयलेट। इसके जितने भी पहलू हैं जैसे कि इसमें संदेश है, इसमें समस्याएं भी हैं, तमाम मुद्दे हैं और सीख भी है। ये फ़िल्म और इसका टाइटल ट्रैक दोनो ही लोगों में जागरुकता लाने के लिए एक कम्प्लीट मैसेज़ पैकज है। मैं तो इस ट्रैक को फ़िल्म के मुद्दे का एंथम मानता हूं।

∙ बॉलीवुड में आकर आप किस तरह के गाने करने की ज़्यादा तमन्ना रखते हैं ?
देखिए, पहले तो अगर मुझे एक म्यूज़िक कम्पोज़र के तौर पर आगे काम करना है तो मैं किसी टाइप को लेकर नहीं चल सकता। मैं टाइप्ड होकर कोई अपना जॉनर नहीं सेट करना चाहता कि मुझे यही करना है। मैं करके सीख रहा हूं और मैं यही चाहता हूं कि मुझे सबके साथ तरह-तरह का काम करने को मिले। वैसे भी मुझे सभी टाइप्स के गाने पसन्द हैं। अलग-अलग सिचुएशन में काम करना मुझे पसन्द है। बस हां, मुझे किसी भी जॉनर की म्यूज़िक करना है तो मैं डिफरेण्ट करना चाहूंगा जोकि मेरा हो, यूनिक हो। यही मेरी तमन्ना है।
 
इससे पहले क्या किया था ?
वैसे टॉयलेट मेरी पहली ही बॉलीवुड फ़िल्म है। इससे पहले मैने ध्रुव हर्ष की ऑनरेबल मेन्शन की थी। ध्रुव मेरे कॉलेजमेट हैं। उनकी ये मूवी आधे घण्टे की शॉर्ट फ़िल्म थी। उन दिनों भी मैं मुम्बई में था। वो ये फ़िल्म इलाहाबाद में कर रहे थे। ध्रुव ने कहा कि मैने एक शॉर्ट फ़िल्म बनाई है। बहुत मेहनत हुई है इसमें। मैने कहा ठीक है, करते हैं भेजो। फिर उसकी थीम पर काम करके ध्रुव के साथ बहुत मज़ा आया। फ़िल्म ने अमेरिका में 2 और हैदराबाद, कोलकाता, इलाहाबाद और नई दिल्ली में 1-1 अवॉर्ड हासिल किये हैं। आगे भी हम साथ काम करने वाले हैं।

विक्की आपको कब ऐसा लगा कि अब आपको मुम्बई निकलना चाहिए ?
 ग्रेजुएशन के बाद साल 2010 में मैं सबसे पहले दिल्ली गया था। वहां मैने साउण्ड इवेण्ट और म्यूज़िक प्रोडक्शन का कोर्स किया। वो कोर्स एक साल का था, 2011 में खत्म हो गया। लेकिन मैने दिल्ली नहीं छोड़ा था, वहां छोटे-मोटे इवेण्ट करता रहा। अन्त में सितम्बर 2012 में मैने मुम्बई का रुख किया और तब से लेकर बिना रुके आज तक मैने यहां जमकर स्ट्रगल किया और काम करता रहा।

रिकॉर्डिंग्स के दौरान के अनुभव कैसे रहे ?
जैसा कि मेरी शुरुआत थी और सोनू निगम जी, सुखविन्दर जी जैसे बड़े दिग्गज मेरा गाना कर रहे थे तो वाकई मैं बड़ा ऑनर फ़ील कर रहा था उस वक़्त। अक्षय कुमार जी के साथ रिकॉर्ड करने में सबसे ज़्यादा मज़ा आया। वो बड़े मस्त इन्सान हैं। हमेशा ख़ुश रहते हैं। एक पॉज़िटिव माहौल बना देते हैं। खूब हंसी-मज़ाक करते हैं। वो बहुत ही ज़्यादा एनर्जेटिक हैं, उनको देखकर आप ऑटोमैटिक डेडीकेटेड हो जाते हो।

अपने घर-परिवार के बारे में भी हमें कुछ बताइए !
मेरे फादर नहीं हैं। परिवार के अधिकतर लोग असम में ही रहते हैं। फादर की डेथ के बाद मेरी नानी जी ने मेरी परवरिश की। वो आर्मी में हैं। मेरा जन्म भी असम राइफल्स में ही हुआ है। पूरे नॉर्थ-ईस्ट में ही घूम-घूमकर उनका ट्रान्सफर होता रहता और वैसे ही घूम-घूमकर मेरी पढ़ाई चलती रही। 2005 तक मैं वहीं था। इस तरह से मेरी पूरी परवरिश आर्मी एटमॉसफियर के बीच ही हुई।

तब तो एक डिफेन्स के कथानक वाली फ़िल्म करने में आपकी ज़्यादा दिलचस्पी देखने को मिल सकती है !
आर्मी का जो वातावरण है, बेशक वो मेरे रोम-रोम में है। वो हर पल मेरे जहन में रहता है। सिविल से बिल्कुल डिफरेण्ट होता है वहां का माहौल। सीरियसली मुझे 2005 के बाद ही जब मैं असम से निकला तभी मुझे सिविल लाइफ़ के बारे में पता चला। बहुत ही अन्तर है दोनो में। ऐसे में आर्मी बैकग्राउण्ड वाली फ़िल्में करके डेफेनेटली मुझे बहुत ख़ुशी होगी। मैं शायद ऐसी फ़िल्मों में और भी इनवॉल्व होकर काम कर पाउंगा क्योंकि बचपन से ही मैने वहां की हर छोटी-छोटी चीज़ें तक देखी हैं।

विक्की टॉयलेट ..एक प्रेम कथा के बाद किन प्रोजेक्टस पर काम कर रहे हैं ?
ध्रुव हर्ष की ही फ़िल्म हर्षित करने वाला हूं। वो वर्ल्ड सिनेमा के बड़े अच्छे फ़िल्मकार हैं। हर्षित हेमलेट पर बेस्ड फ़िल्म है। इसके अलावा मैने एक फ़िल्म कम्प्लीट कर ली है, उसका नाम है- चेन्ज ऑफ़ वर। ये बड़ी फनी मूवी है। हालांकि इनमें फ़न के अलावा बहुत अच्छा ड्रामा है, इमोशन है और काफ़ी ख़ूबसूरत सी फ़िल्म है। संजय मिश्रा जी इसमें लीड रोल कर रहे हैं। इसके अलावा भी काफ़ी अच्छे-अच्छे कलाकारों से सजी मूवी है ये। ये फ़िल्म मथुरा पर बेस्ड है। इससे भी मुझे बड़ी उम्मीदे हैं। बहुत जमकर काम हुआ है इसमें भी। इसके अलावा 2-3 प्रोजेक्ट्स पर बात फाइनल होने वाली है मेरी।

टॉयलेट कैसे मिली, इसके स्ट्रगल के बारे में कुछ बातें साझा कीजिए ?

12वीं से ही मुझे पता था कि अल्टीमेटली एक दिन मुझे बॉलीवुड में ही काम करना था। इसलिए यही कारण रहा कि सबसे पहले मैं नॉर्थ-ईस्ट से निकलकर इलाहाबाद पहुँचा। वहां रहकर मैने पढ़ाई की और बहुत सारी चीज़े तभी से सीखने लगा। फिर मुम्बई आ गया। यहां मुम्बई में मेरी कोई जान-पहचान भी नहीं थी कि कोई मुझे कहीं काम दिलवाता। मैंने ख़ुद से कई जगह हाथ-पैर मारे पर कोई बात बनी नहीं। अब तक मेरे सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। फिर मजबूरी में मुझे कोई जॉब करनी पड़ी और मैने की थी। लेकिन चूंकि मैने तय ही कर रखा था कि मुझे जीवन में जॉब नहीं करनी। एक पैसा भी कमाना है तो वो म्यूज़िक से कमाना है। इसलिए मैने जॉब छोड़ दी और म्यूज़िक अरेंजमेण्ट का काम करने लगा, वहीं से अब मेरे रहने खाने का जुगाड़ चलता रहा। वास्तव में ये सब भी मैं करना नहीं चाह रहा था लेकिन मजबूरी थी। मैं म्यूज़िक कम्पोज करना चाहता था। साल 2013-14 का जो पीरियड था वो मेरे लिए बड़ा मुश्किल भरा था। कुछ प्रोजेक्ट छूट गये थे, मेरे पास कोई काम भी नहीं था। रेण्ट देने के पैसे नहीं थे, जो पैसे थे बिल्कुल ख़तम होने वाले थे। उन दिनों मैं इधर कांदीवली में रहता था, रेण्ट डिपॉज़िट के दिए हुए पैसे से ही मैं सर्वाइव कर रहा था। कोई उधार देने वाला भी अब न था, सबसे ले चुका था। अब मेरे पास खाने के लिए भी पैसा नहीं था। 10 रुपये रहते तो उसी से दिन में पाव खाकर रहता था। बड़ा मुश्किल हो गया था उन दिनों। सारे रास्ते बंद थे। अन्त में अचानक से एक दिन मेरे कॉलेज फ़्रेण्ड आशुतोष त्रिपाठी ने मुझे कॉल कर दी। उसने मेरी हालत समझी और फिर 2500 रुपये खाते में डाल दिया। उसी पैसे से मैं वापस घर गया। मॉम से मिले भी चार साल से ज़्यादा हो गए थे।

घर जाते ही 10-15 दिन बाद मुझे एक क्लाइंट का फोन आता है और वो मुझसे कुछ काम लेना चाहते थे। मैने उन्हें काम करने की शर्त यही दे दी कि मेरे रहने का जुगाड़ कर पाओ तभी मैं आउंगा। वो राजी हो गये और मैं जल्दी ही मुम्बई वापस आया। उन्हीं की बदौलत मैं वापस मुम्बई में स्टैण्ड कर गया। आज वो मेरे बड़े अच्छे दोस्त हैं, अजय आर्य नाम है उनका। तब से लेकर 2016 तक मेरा संघर्ष जारी था।

इसके बाद मेरे मेण्टॉर मनोजराज दत्त मेरे लिए टर्निंग प्वाइंट बने वो टॉयलेट में एसोसिएट डायरेक्टर हैं। मनोज सर को मैं अपना बड़ा भाई मानता हूं। उन्होने पहले भी मेरी बहुत बार मदद की थी। इस बार उनका मुझे कॉल आता है और वे मुझसे बोले कि विक्की जिस हालत में हो वैसे ही भागकर नीरज पाण्डेय जी के प्रोडक्शन हाउस में आ जाओ। (ज़ोर देकर) यकीन मानिए, मैने कैप्री पहन रखी थी और ज़ोरों की बारिश हो रही थी। लेकिन मैने जैसा मनोज सर ने कहा था वैसा ही किया। मैं भीगते ही प्रोडक्शन हाउस पहुंचा और फ़िल्म टॉयलेट ..एक प्रेम कथाके डायरेक्टर श्रीनारायण सिंह से मिला। उनको नए लोगों के साथ काम करने में कोई दिक्कत नहीं थी। वहां मेरी उनसे बातचीत हुयी और उनसे टेस्ट प्रोजेक्ट मिले मुझे। अन्त में मैं पास हुआ और ये फ़िल्म मेरे हाथ लग गयी।

नये लोग जो फ़िल्मों में म्यूज़िक करना चाहते हैं उनको क्या सलाह है आपकी ?

मैं अभी किसी को सीख देने के क़ाबिल खुद को नहीं मानता। लेकिन मेरी जो सोच है मैं उसे साझा कर सकता हूं। आप किसी भी विधा में काम करे हों सबसे पहले तो आपको अपनी आइडेण्टिटी बनाने की ज़रूरत होगी। उसे ही लेकर आप चलते रहो वरना उसके बिना आप भीड़ का हिस्सा हो जाते हो और फिर आपको कोई नहीं पूछता है। भीड़ कब हट जाती है पता भी नहीं चलता आपको, हताशा होती है। इसलिए मेहनत के साथ सकारात्मक रहकर डटे रहना हर किसी के लिए बहुत ज़रूरी है। इसके अलावा धैर्य एक बहुत ज़रूरी चीज़ है, उसके बिना कुछ सम्भव नहीं।

Saturday, 29 July 2017

दस्तावेजः खागा का वीर बालक

अपनी अर्धांगनी श्रीमती धुन्नू कुँवर के साथ 'वीर बालक' बृजलाल

खागा के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल पुत्र नारायण उर्फ मुन्नू गड़रिया को 15 अगस्त, 1972, 24 श्रावण, 1894 शकाब्द को स्वतंत्रता के 25वें वर्ष के अवसर पर स्वतंत्रता संग्राम में स्मरणीय योगदान के लिए सन् 1913 में जन्मे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल को राष्ट्र की ओर से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने आनन्द भवन, इलाहाबाद में ताम्र-पत्र और एक चांदी का मेडल भेंट किया।

बृजलाल पाल की पत्नी श्रीमती धुन्नू कुँवर ने बातचीत में बताया कि हेमवती नंदन बहुगुणा समेत तमाम बड़े कांग्रेसी नेताओं का हमारे यहां लगातार आना-जाना लगा रहता था। धन्नू कुँवर को बड़ा स्पष्ट याद है और वह बताती हैं कि एक बार जब हेमवती नंदन बहुगुणा हमारे यहां आये थे तब हम कच्चे मकान में रहते थे और मैंने छप्पर के नीचे अपने चूल्हे में एक पतीली पर गुड़ चाय बनाकर उन सबको पिलाया था।
इन्दिरा गांधी जब खागा आती थीं तो गंगा पांडे के घर में बैठकी होती थी जिसमें बृज लाल पाल आदि लोगों का बढ़ चढ़कर मीटिंग के लिए बुलावा होता था।

(स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल के छोटे पुत्र हरिशंकर ने लेखक अमित राजपूत को बताया।)
29 मई, 1993 को 80 वर्ष की अवस्था में बृजलाल पाल का निधन हो गया।

बृजलाल पाल के बड़े लड़के रामचंद्र पाल बताते हैं कि जब जब मैं 10 साल का था तो सन् 1962 के चुनाव के समय नेहरू जी को शुकदेव कॉलेज की बड़ी फील्ड में अपनी जनसभा करनी थी। इसके लिए उनको बहादुरपुर खागा हो करके ही नई बाजार मोहल्ले के रास्ते बड़ी फील्ड को जाना था। तब वह हमारे घर के पास जनहितकारी इंटर कॉलेज के बगल में प्राइमरी स्कूल के सामने से होकर अपनी एम्बेस्डर कार से गुगर रहे थे। तब बप्पा (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल) ने मुझे और मेरी छोटी बहन शकुंतला (तब वह साढ़े सात साल की रही हैं) को एक-एक गेंदे के फूल के माला देकर नेहरु जी के गले में डालने को दे दिया। हम दोनों ने नेहरू जी को एंबेसडर कार में बैठे-बैठे ही माला पहनायी थी। उधर से जवाब में नेहरू जी ने हमें पहले से ही अपने गले में पहली तमाम मालाओं मे से एक-एक उतार कर मुझे और मेरी बहन को पहना दी। मेरे गले में नेहरू जी द्वारा पहनायी गयी माला कपड़े के फूलों की बनी थी जिसे मैंने सहेजकर एक बड़े बक्से में रख दिया था। लेकिन सन् 1970 में जब खागा में गंगा-जमुना एक होकर बहने लगीं और भीषण बाढ़ आयी तब यहां नावें भी चलने लग गयी थीं। हमारे घर गिरने लगे। तब उसी बाढ़ में हमारा मिट्टी का बना हुआ घर भी गिरकर ढह गया था और वह बक्सा जिसमें मैने नेहरू जी द्वारा दिया गया माला रक्खा था, बाढ़ में डूब गया। हम घर छोड़कर चले गये और इसी के साथ नेहरू जी के द्वारा दी गयी वो निशानी सदा के लिये खो गयी।

लेखागार (न्याय) 15 विविध, 71, 72 के अनुसार बृज लाल पाल दिनांक 21 जनवरी, 1932 को फतेहपुर के कस्बा गाजीपुर में दफा-144 का उल्लंघन करते हुए कांग्रेस का जुलूस निकालने के अभियोग में श्री रमाकांत मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी द्वारा दिनांक 23 जनवरी, 1932 को धारा-143 तथा 188 ता. हि. के अंतर्गत तीन-तीन माह की सख्त कैद और 15-15 रुपए जुर्माना अथवा एक-एक माह के अतिरिक्त कैद की सजा का आदेश दिया गया। दोनो ही सजायें क्रमवार चलने का आदेश हुआ था। इनसे कोई जुर्माना वसूल नहीं हुआ। वह सजा भुगतकर  27 अगस्त, 1932 को जेल से छूटे गये। उनके द्वारा क्षमा याचना करना नहीं पाया गया।
(मुकदमा नंबर- 38 सन् 1930; थाना-गाजीपुर, सरकार बनाम बैकल आदि।)

सन् 1929 में कानपुर के फूल बाग में उन्होंने सत्याग्रह किया था जिस पर अंग्रेजों ने उन्हें 3 माह की सख्त कैद और तीन बेत मारने की सजा दी थी। इस सजा के बाद बाद बृजलाल अंग्रेज़ों के चंगुल से बैकल (पागल) बनकर किसी तरह से बचकर निकल आये थे। तब से अंज्रेज़ों और पुलिस वालों के बीच से बैकल की पहचान के साथ ही पेश आते रहे और इसी पहचान से इनको सजायें भी दी जाने लगीं तथा इन पर मुक़दमें चले।
(स्वतंत्रतता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल के मांझिल पुत्र रविशंकर से लेखक अमित राजपूत की सीधी बातचीत)

साल 1924 में जब झंडा गीत कानपुर में गाया गया तब बृजलाल पाल छात्र थे। वे बहुत तेज़-तर्रार स्वभाव के थे। इस समय इनकी उम्र मात्र 11 वर्ष की थी। वे फतेहपुर के तमाम कांग्रेसियों के साथ कानपुर जाकर के झंडा गीत गाने में सम्मिलित हुये थे। इसी के बाद से इनमें देश की आज़ादी के लिये काम करने का भारी जुनून पैदा हुआ और वे अपने स्कूल की पढ़ाई छोड़कर पूरी तरह से स्वतंत्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे।
(स्वतंत्रतता संग्राम सेनानी बृजलाल पाल के मांझिल पुत्र रविशंकर से लेखक अमित राजपूत की सीधी बातचीत)

खागा नगर के इकलौते स्वतंत्रता सेनानी बृजलाल पाल 12 वर्ष की उम्र में पढ़ाई छोड़कर इंडियन नेशनल कांग्रेस के दफ्तर में जाकर विभिन्न आंदोलनों में हिस्सा लेने लगे थे। उनके साहस को देखकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें वीर बालक की उपाधि तक दे डाली थी।

आजादी की लड़ाई के दौरान सन् 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में खागा नगर निवासी बृजलाल पाल ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। इस आंदोलन के दौरान कानपुर के फूल बाग में इन्होने आजादी का प्रतीक तिरंगा झंडा भी फहराया था। इसमें भाग लेने पर इन्हें एक सप्ताह की सजा मिली थी। इसमें अंग्रेजो के जुल्मों को ताक में रखते हुए इस धरती मां के लाल ने अंग्रेजो के खिलाफ कड़ा मोर्चा लिया।

नमक क़ानून तोड़ने पर बृजलाल पाल को 2 माह, 13 दिन की कैद वर्धा जेल में काटनी पड़ी थी।
कानपुर में विदेशी कपड़ा जलाने के आरोप में इन्हें तीन सप्ताह की जेल हो गयी और ये पकड़कर कारागार में डाल दिये गये।
(दोआबा-वार्ता-फतेहपुर, 15 सितम्बर, 1995, पेज़-1)


कांग्रेस के उत्साही कार्यकर्ता बृजलाल सन् 1930 के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में भी थोड़ी अवधि के लिये जेल गये थे। (सूचना विभाग-उत्तर प्रदेश सरकार, पेज़-568)

Tuesday, 25 July 2017

यात्रा-वृतान्त : सनातनी अपमान का भीटा


∙ अमित राजपूत

चंपारन सत्याग्रह का सौवाँ साल चल रहा है। इसके शताब्दी वर्ष में मैं एक विशिष्ट दृष्टिकोण के साथ क़िताब लिख रहा हूं, नाम है- चंपारन सत्याग्रह का गणेश। ये क़िताब चंपारन सत्याग्रह की नीव डालने वाले पत्रकार शिरोमणि गणेश शंकर विद्यार्थी जी को केन्द्रित करके लिखी जा रही है और इसी सिलसिले में मैं गणेश जी के पैतृक ग्राम हथगांव (उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर ज़िले की खागा तहसील में) और कर्मभूमि कानपुर में शोध और विश्लेषण की सहजता के लिए फ़तेहपुर जनपद की खागा तहसील में ही रुका हुआ हूं। काम ज़ोरों पर है। लेकिन मेरे सह-लेखक अजीत प्रताप सिंह चौहान ने मुझे पञ्चाक्षर पञ्चश्वरों (लोधेश्वर, थवईश्वर, तांबेश्वर, जागेश्वर और आधेश्वर) में से एक जागेश्वर महादेव के दर्शन करने की इच्छा जताई। यद्यपि मैने कुछ आनाकानी की, लेकिन अगले ही पल मैं चलने के लिए हां कर बैठा। एक घण्टे बाद ही हमने दुपहिया निकालकर हर हर महादेव कहकर जागेश्वर महादेव के दर्शन के लिए निकल पड़े।

सावन का महीना है। दो-चार दिन पहले ही यहां जमकर पानी बरस चुका है और आज धूप है। धूप भी ऐसी कि न तो ढंग की धूप ही है और न ही बदली। कुल मिलाकर फसफसी गरमी और उमस भरा मौसम है। खागा से निकल कर हम विजयीपुर के रास्ते जागेश्वर महादेव के धाम जा रहे हैं। वास्तव में हम दोनो लोग चूंकि बीते तीन-चार महीनों से शोध के सिलसिले में इतने रम गए हैं कि यहां भी जागेश्वर महादेव की ओर बढ़ते समय भक्त कम शोधार्थी और मुसाफ़िरी का अंदाज़ ही भरा है। मतलब साफ यह है कि हम कहीं भी ठहर सकते हैं और फुल टंकी पेट्रोल वाली हमारी काली रंग की दुपहिया हीरो-पैशन किसी भी तरफ मुड़ सकती हैं। फिर भी हम मुसाफ़िर की तरह ही सही, बाबा जागेश्वर महादेव के धाम की ओर हमारी दुपहिया गनगनाती चली ही जा रही है।
जागेश्वर महादेव का मन्दिर

यह हमारी कोई बड़ी यात्रा नहीं है, बल्कि यह तो रगड़ती-ठहरती मुसाफ़िरी है हमारी, जो रास्ते के पानी से भरे लबालब खेतों का आनन्द भी लेती जा रही है और कहीं-कहीं ठहर कर गाड़ी रोककर किसी सज्जन से बतियाने और झलने भी लगती है। वास्तव में यह कोई रोमांचक सफ़र भी नहीं है जिसमें बड़ी-बड़ी खांइयों से होकर हम गुजर रहे हों। यहां देवदार और चीड़ के वृक्षों की उत्तुंगता भी तो नहीं है और न ही बादलों से घिरे काले, सुनहरे और सफ़ेद पहाड़ ही हैं। यहां न गर्त है न कगार, इधर झरने भी नहीं हैं और न ही समुद्र की विशालता ही कहीं नज़र आ रही है। इस सफ़र में रूहानी ठण्ड भी तो नहीं है और न ही यहां सुन्दरवन सा जंगल ही हमें कहीं दिखा ; यहां तो सब समतल है... एकदम सपाट। बिल्कुल यथार्थ की तरह। इस वक़्त यहां के मौसम में लड़ाई है। बारिश की आहट है। घाम चटख है। गर्मी की उलझन में जी घबरा रहा है। प्रकृति में भी कोई रोमांस नहीं नज़र आ रहा है। काम से भरपूर काममुक्त ओस है, खर हैं, पानी और हवाएं भी। आज इधर प्रकृति बिल्कुल अलग ही मिज़ाज में है। एकदम चित्रलेखा में वर्णित यथार्थ-प्रकृति की तरह जैसा कि भगवती चरण वर्मा ने अपने उक्त उपन्यास में प्रकृति का वर्णन किया है। प्रकृति अपने वास्तविक स्वरूप में हैं। इसे स्पर्श करके मखमली ओट नहीं मिल रही है, बल्कि यह तो मेरे कोमल हाथों में चुभ सी रही है। पानी और हवाएं मुझे रोमांस से नहीं भर रहे हैं, बल्कि ये तो मन में चिड़चिड़ेपन को और भी बढ़ा रहे हैं। वास्तव में यहां की प्रकृति तो वही अनुभव दे रही है जो सत्य है। मतलब यह सपाट, समतल इलाका हमें यथार्थ बने रहने के लिए प्रेरित-कम-मजबूर कर रहा है। शायद यही कारण है कि इस इलाके के लोगों में भी सपाटपन और साफगोई यहां की इसी प्रकृति की देन है। वैसे प्रकृति को एक ही भाव में हमसूस करने की मेरी और भगवती चरण वर्मा की चिति का कारण यह हो सकता है कि हम दोनो ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हॉलैण्ड हाल छात्रावास के अपने-अपने ज़माने के अंतःवासी रहे हैं। वहां प्रकृति से साखी होना लगभग हर अंतःवासी का सौभाग्य भी है।

हम विजयीपुर चौराहे पहुंच गए। वहां से बिना रुके ही हमने दाहिने मुड़कर असोथर रोड धर लिया। इस रास्ते पर कहीं रुकने का मन नहीं किया हमारा। सफ़र कुछ ख़ासा लम्बा भी नहीं है, इसके अलावा रुकने पर उमस अपना चरम छूने लगती है। लिहाजा हम चलते ही गए। अगले ही झटके में हम पौन घण्टे का सफ़र तय करके असोथर क़स्बे को क्रॉस करने लगे। इसके बाद शुरू हुआ ऊबड़-खाबड़ भरा रास्ता, जो यूपी की योगी सरकार के सड़कों को गड्ढा-मुक्त कर देने के हवाहवाई अरमान जोकि अनुमान ही था शायद, कड़क तमाचा जड़ रहा है। असोथर की सड़कों से ही दे-लबालब कीचड़ है। हमारी दुपहिया गाड़ी के टॉयर उससे ऐसे लदे कि जैसे यूपीए-2 पर भ्रष्टाचार आ चिपका हो और यह सब नियति का खेल मान लिया गया हो बिल्कुल इस कीचड़ की तरह जो हमारी गाड़ी के टॉयरों में आ लपटा है। लेकिन करते भी क्या गाड़ी तो आगे बढ़नी ही है, जागेश्वर धाम की ओर जाने वाली हमारी भी और भ्रष्टाचार से युक्त सरकार का भी; कल भी और आज भी।
हम असोथर से  गाजीपुर की सड़क पकड़कर आगे बढ़ने लगे। यहां रास्ते के अगल-बगल मौजूद खेतों में धान रोपा जा रहा है। इधर असोथर क्षेत्र के धान की बेड़ के भी दिलचस्प क़िस्से हैं। पहले तो इधर जो किसान अपनी ब्याड़ लेकर गुजरते हम बड़े असरज से उन्हे रोकते और उनकी ब्याड़ को हैरानी से निहारने लगते, फिर उसके बारे में चर्चा भी करते। हमारी हैरानी को देखकर वो किसान हमसे ज़्यादा अचरज भरी नज़रों से हमें देखते और पूंछते कि भइया कउन गांव के अहिव तुम कहां रहत हो?” हम पर उनका ये संदेह भरी नज़रों से देखकर सवाल उछालना, हमें वहां से फौरन फुर्र काटने को मज़बूर कर देता और हम बाबा जागेश्वर के धाम के और नज़दीक पहुंचते जाते।
जागेश्वर महादेव मन्दिर द्वार
पाँच श्वरों में एक जागेश्वर :
गाजीपुर से तकरीबन सात किलोमीटर पश्चिम चलने पर हमें बाँए हाँथ पर सड़क से सौ मीटर से भी कम दूरी पर ही विराजमान दिखे जागेश्वर महादेव। पीले रंग का भव्य शिवाला। शिवाले के द्वार पर टंगीं सैकड़ों घण्टियाँ और उन घण्टियों पर टिकीं हज़ारों भक्तों की मिन्नतों की गूंज हमें शान्ति स्वर में साफ सुनाई पड़ने लगी। हमने अपनी गाड़ी खड़ी की और कुछ देर रुककर मन्दिर के पास में लगे हैण्डपम्प से हाथ-मुंह धुला। हैण्डपम्प के बगल में खड़े बेला के पेड़ से भगवान शिव को अर्पण करने के लिए कुछ फूल चुने। मन्दिर के बाहर एक उसके ठीक सामने और दूसरी उसके बिल्कुल बगल में नारियल और प्रसाद की दो दुकाने हैं। मेरी किताब चंपारन सत्याग्रह का गणेश में मेरे सह-लेखक अजीत भइया (अजीत प्रताप सिंह चौहान बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के शोधार्थी हैं जोकि मेरे बड़े हैं और सीनियर भी, इसलिए मैं उन्हें अपने आदि से ही भइया कहकर पुकारता आ रहा हूं) ने शिवालय के बगल वाली दुकान से ही प्रसाद और नारियल ख़रीदा क्योंकि उसका विक्रेता एक नौजवान लड़का है। अजीत भइया को मैने अक्सर नौजवान कमासुतों से ही खरीदारी करते देखा है।

ख़ैर, हम दोनो ने जागेश्वर महादेव के अद्भुत शिवालय में प्रवेश किया। नारियल तोड़कर उसके जल से शिवलिंग का हमने अभिषेक किया और फिर क्रमशः रूद्र-सूक्तम् और शिवाष्टक का पाठ करके महा-मृत्युञ्जय मन्त्र का उच्चारण करते हुये वहीं आसन् जमाकर विराज गये। हमने करीब-करीब चालीस मिनट का समय उस शिवालय के भीतर ही बिताया। शिवालय के भीतर मंत्रों के जाप से निर्गत महानाद जोकि हमारे ही उच्चारण से हुआ था, हमें सुनकर आध्यात्मिकता का बोध हो रहा है। यह नाद वास्तव में शिवालय की बनावट और उसके गुम्बद की कारीगरी की वैज्ञानिकता का कमाल था। अद्भुत था। आनन्ददायी था। शक्तिदाता था।
असोथर का क़िला
राजा असोथर के यहां :
जागेश्वर महादेव के दर्शन करके हम वापस असोथर आये। असोथर महाभारत-कालीन अश्वस्थामा की प्रचीन नगरी है। हम यहां असोथर के राजा के महल पहुंचे। आज उनके महल में फिलहाल कोई नहीं था। पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि राजा असोथर के वर्तमान वारिस राजा विश्वेन्द्र पाल सिंह आज कानपुर चले गए हैं। लेकिन हम कुछ देर वहीं रुककर महल की भव्यता निहारने लगे, तभी एक सज्जन वहां पधारे और हमसे हमारे आने का कारण जाना। हमने उन्हे अपना परिचय देते हुए राजा से मिलने की इच्छा जताई। उस भद्र व्यक्ति ने खेद प्रकट करते हुए हमें यह बताया कि राजा साहब तो आज कानपुर में हैं लेकिन कुँवर साहब अपनी हवेली में आज मौजूद हैं। हमने फौरन ही उस जन से कुँवर तक हमारा संदेशा देने को कहा। अंत में हम राजकुँवर मनोज सिंह के साथ उनकी हवेली के भीतर थे। कुँवर मनोज सिंह के साथ अजीत भइया और मैने घण्टे भर बातचीत की। इस बातचीत में उन्होनें असोथर के राजा और अपने पूर्वजों राजा दुनियापत महाराज से लेकर राजा लक्ष्मण प्रसाद तक की ढेरों बातें हमसे साझा की। फिर उसी बीच कुँवर ने हमें जलपान कराया और अपना महल दिखाने लगे।

असोथर के राजा दुनिपत राय महाराज
कुँवर मनोज सिंह हमें बेहद तेज़तर्रार और नेक दिल वाले इंसान लगे। वो हमसे फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे। उन्होने अपने सभी पूर्वज़ों की तस्वीरें हमें दिखलाईं और महल के भीतर मौजूद पुराने मन्दिर और कूप के दर्शन भी कराये। राजा असोथर के इस महल से गाजीपुर तक की सुरंग भी महल में मौजूद है। क़रीब-क़रीब दो घण्टे से ऊपर का वक़्त हमने राजा असोथर के यहां बिताया और फिर हम वापस होने लगे।

असोथर से निकलने के बाद दोपहर ढल चुकी थी। सूरज की तपन का तीखापन भी पहले से कमतर हो आया था। लेकिन यह बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उमस और फसफसापन भी कुछ कम हुआ था। हम विजयीपुर की तरफ वापस बढ़ चले। रास्ते में कुछ दूर निकलने के बाद बाँयी तरफ एक पुराना पक्के जगत का कुँआ दिखाई पड़ा। वहां पर कुछ लाल रंग की झण्डियां भी नज़र आ रही थीं। कुँए की बाट मन को इतना मोह रही थी कि हमसे रहा न गया। हम रुके और रुककर कुँए को झांकने लगे। आश्चर्य तो यह देखकर था कि चार हाथ नीचे ही कुँए में लबालब पानी भरा है। कुँए के पास की मिट्टी गीली थी। उस इलाक़े में जगह-जगह ढेरों गहरे बिल बने हुए थे। अजीत भइया ने मुझे बताया कि ये ज़हरीले साँपों के बिल हैं, इसलिए यहां देर तलक रुकना ख़तरा भरा है। मैने अजीत भइया की बात मानकर तत्काल वहां से चलने को कहा। हम जैसे ही वहां से निकले मैने पीछे मुड़कर देखा तो दो साँप एक साथ तेजी से ठीक उसी जगह पर रेंगते नज़र आये जहां पर अभी-अभी हम खड़े थे। मैं एकदम से काँप उठा और सोचने लगा कि अगर एक मिनट पहले हम वहां से न निकले होते तो क्या होता!!!


सनातनी अपमान का भीटा :
कुछ दूर और चलने के बाद यानी असोथर से देखें तो तक़रीबन 6-7 किलोमीटर आगे विजयीपुर की ओर बढ़ने पर हमें पता चला कि यहां एक बड़ा पुराना भीटा है और उससे हज़ारों साल पुरानी मूर्तियां निकलती है। यह जानकर निश्चय ही तत्काल हम तीनों का मन उस भीटें की ओर मुड़ने का हो चला। मेरा, अजीत भइया का और हमारी हीरो-पैशन का। हम दोनों को लेकर पैशन उस भीटें की ओर दाहिने हाँथ मुड़ पड़ी।

विजयीपुर रोड से दाहिने हाँथ अन्दर घुसने पर लगभग 3-4 किलोमीटर अन्दर जाने पर पुर बुज़ुर्ग ग्रामसभा के अंतर्गत बायीं ओर एक बहुत बड़ा करीब 10 से 12 एकड़ में फैला हुआ विशाल टीला अपना सीना चौड़ा किए हुए खड़ा है। यह ससुर खदेरी- नं. 02 नदी के किनारे बसा हुआ एक बहुत बड़ा भीटा है। अच्छे डामर (तारकोल) की सड़क उस भीटे के मध्य में ऊपर बने हुए एक मन्दिर तक जाती है। हम इसी सड़क के सहारे टीले के बीचोबीच पहुंचे।
विष्णु के सर्वावतार वाली विखण्डित मूर्ति

वहां पहुंचते ही बड़ी फुर्ती के साथ हम दोनों ने ही सबसे पहले मन्दिर के बाएं हाँथ पर भगवान श्रीहरि विष्णु के सर्वावतार वाली एक भव्य मूर्ति को देखा। यद्यपि मूर्ति इतनी भव्य थी कि उसकी आभा को देख कोई भी इस ओर खिंचा चला आए, लेकिन वह खण्डित मूर्ति थी जिसका सिर और शरीर के मध्य भाग का पूरा हिस्सा नदारद था। भगवान विष्णु के एक-एक करके सभी अवतारों का व्यक्तिगत खण्डन उस मूर्ति में साफ देखा जा सकता है।

सर्पगाँठ वाली गुर्लभ कलाकृति
इसी के साथ मूर्ति की कारीगरी के बारे में कुछ कहना मतलब कला का अपमान करने जैसा है मेरे लिए। मुझे तो अभी भी उस मूर्ति के आधार में बनी सर्पगाँठ हैरान कर रही है। अब तक ऐसी बेजोड़ कारीगरी नहीं देखी थी मैने और न ही अजीत भइया ने।

टीले के मध्य में एक मन्दिर बना है जो आधुनिक है। लेकिन इसके गर्भग्रह में विराजे शिवलिंग की मूर्ति अपने ही समय की है। वहां तीन सन्त मौजूद थे। मैने उनसे उनके ताम्रपात्र में भरे जल को पीने की इच्छा जतायी। जल ग्रहण करने के बादे हमने उन साधुओं से बातचीत की तो उन्होने बताया कि यह धाम आज फिलहाल रहिमालेश्वर (रहिमल बाबा) धाम के नाम से प्रचलित है, लेकिन इसके अतीत के बारे में उन्हें कुछ भी नहीं पता था।

घण्टों बातचीत के बाद उन सन्तों से हमें जो पता चला वह यह है कि यहां पौधा रोपने के लिए भीटे की कुछ मिट्टी हटाने मात्र से ही यहां वाकई पुरानी-पुरानी मूर्तियां निकल आती हैं। मतलब इस टीले पर जहां पर भी खुदाई की जा रही है वहां पर से कोई न कोई प्राचीन छोटी-बड़ी मूर्ति निकल आ रही है। वैसे भी इस भीटे को देखकर ही कोई भी आम जन इसके पुरातन का अन्दाज़ा आसानी से लगा लेगा।
प्राप्त भग्नावशेष

यह सब जानकर और वहां धरी हज़ारों खण्डित मूर्तियों और भग्नावशेषों को देखकर हम दोनो चकित ही खड़े रहे। पहली बार एक साथ एक ही स्तान पर इतनी ज़्यादा संख्या में खण्डित मूर्तियां हम दोनों ने ही पहली दफ़ा अपनी-अपनी नंगी आँखों से देखा था। वास्तव में हम सन्न थे और हारे हुए से भी।

उन साधुओं में से एक ने हमें दिखाया कि मन्दिर की बायीं दीवार के एकदम बाट (आधार) पर जहां से शिवलिंग पर जल चढ़ाने के वह निर्गत होता है, एक पत्थर था जोकि उसके बचपन में एकदम छोटा सा ही था। लेकिन आज वह कच्छप के आकार में आधा बाहर निकला हुआ है जोकि धीरे-धीरे इस आकार में आया है। हकीक़त में मैने भी इस पत्थर को देखा और उसमें कच्छप के पैरों के स्पष्ट आकारों को भी।

कच्छप की आकृति का निकने वाला पत्थर
इस जगह का वर्णन कैसे करूँ! समझ में नहीं आ रहा है कि यहां की शान्ति का बखान करूं कि यहां के तालाबों और मन्दिर के पीछे से गुजरती ससुर खदेरी नदी के कलरव का! यहां पीपल के तमाम वृक्ष हैं और खूब हरियाली भी। मन्दिर में खड़े होकर चारों दिशाओं में किसी भी तरफ दृष्टिपात कीजिए विस्तार ही विस्तार नज़र आ रहा है जो महानता का स्पष्ट एहसास कराती है। काले-काले पत्थरों की टूटी हुई दिखाई दे रही मूर्तियों के भग्न गूढ़ता का मर्म बताने का प्रयास कर रहे हैं और भयभीत भी कर रहे हैं। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष से भी पुराना है।

आगे की बातचीत में यह साफ हो चला कि उत्तर प्रदेश के फ़तेहपुर जनपद के इस विशालकाय मन्दिर को तोड़ने वाला कोई और नहीं बल्कि महाक्रूर शासक औरंगज़ेब ही था। उसी ने इन महाप्रताती शिलाओं को चकनाचूर कर खंडहर बना दिया। यह पुरातात्विक दस्तावेज यह बताने के लिए काफी हैं कि फतेहपुर जिले के प्राचीन मंदिरों को सबसे ज्यादा औरंगजेब ने ही ध्वस्त किया। इसी का परिणाम है कि वर्तमान समय में इस जनपद में एक भी ऐसा दुर्लभ प्राचीनतम और विशाल मंदिर कहीं नहीं बचा है।

इतिहास भी बताता है कि औरंगज़ेब ने राजगद्दी की लड़ाई में अपने भाई शहजादा शुजा को फ़तेहपुर के खजुहा नामक स्थान पर 5 फरवरी, 1659 ई. को युद्ध करके हराया और उसकी हत्या कर दी। इसी विजय की ख़ुशी में औरंगज़ेब ने खजुहा में बाग़-बादशाही, तालाब और सराँय आदि बनवाए थे जोकि अब भी मौजूद हैं।
लेखक के साथ अजीत चौहान


औरंगज़ेब के शासनकाल में प्रसिद्ध खत्री कुल में जन्में सन्त कवि चन्ददास ने हँसवा में रहकर अपनी भक्तिपूर्ण काव्य की अमृत-वाणी प्रवाहित की। इस तरह से खजुहा के बाद इसी जनपद में निकट मौजूद इस मन्दिर के औरंगज़ेब द्वारा ही विखण्डन के प्रमाण भी लोग सत्य बताते हैं। इसके अलावा मूर्तियां जिस ढंग से विखण्डित हैं वह भी चीख-चीखकर औरंगज़ेब के क्रूरता की सबसे बड़ी गवाही दे रही हैं।

अब तक लगभग शाम ढलने लगी थी और उसी के साथ हमारा मन भी। अब हम अपने इतिहास, धर्म और संस्कृति की इतनी क्रूर उपेक्षा के प्रतीकों के चश्मदीद हो चुके हैं। यह हमारे लिए एक हृदयविदारक घटना है। निश्चित रूप से यह खण्ड हिन्दू और हिन्दुत्व के प्रतीकों पर अपमानित प्रहार का प्रतीक है। ऐसे में भला समस्त हिन्दू प्रखर होकर अपने अपमान के लिए सक्रिय होवें तो भला इसमें क्या अतिशयोक्ति!!!

लेखक अमित राजपूत
हम अपने पीछे जिस भीटे को छोड़कर चले आ रहे हैं अब दोबारा इसे देखने का मन नहीं हो रहा है। मैं कोसता हूं खुद को कि आख़िर कैसे हमारी हीरो-पैशन उस ओर उत्साह से मुड़ चली थी। देखो न, अब तो ये भी अपना पैशन खोकर कैसे हारी और थकी हुई चल रही है।

यह जो भीटा अभी तक हमें हैरान कर रहा था अब हारा हुआ महसूस करा रहा है मुझे। यह तो वास्तव में सनातनी अपमान का भीटा सा प्रतीत हो रहा है अब मुझे।

हम विजयीपुर कब डाँक (पार कर) गये पता भी नहीं चला। अब तो सभी मौन हैं- प्रकृति, उमस, हवा, अजीत भइया, मैं और निर्जीव हमारी हीरो-पैशन।

(इति।)