Friday, 1 May 2015

अन्तर समझो मियां...


अभी प्राइम टाईम में एक पत्रकार साथी नेपाल के भूकंप पीड़ित युवा से अस्पताल में पूछ रहे थे, कि आप ख़िर बचे कैसे...? और उस कराह रहे नौजवान ने टूटी हुयी व्यंग्यात्मक हंसी में उस रिपोर्टर से कुछ कहना चाहा, लेकिन उसने रिपोर्टर को बक्ष दिया। साहब स्मार्ट चैनल में ही हैं।
अब मुझे याद आता है कुछ महीने पहले का एक वाकया, जब एक सज्जन ने मुझसे पूछा था कि बेटा आखिर पत्रकारिता में ऐसी कौन सी पढ़ाई पढ़ रहे हो तुम दिल्ली में। भला पत्रकारिता की भी कोई पढ़ाई होती होगी क्या..?

अब समझ में आ गया मुझे कि हमने क्या पढ़ाई कर ली है। कम से कम हमें 'कैसे बच गए' और 'कैसे बचाव किया' में का अन्तर और सहूलियतें तो पता होती हैं। इस तरह से पत्रकारिता में भाषा और शैली का अपना महत्व है, जो एक शैक्षिक प्रक्रिया से मज़बूत होती है। अतः देश में इन मूल्यों से विहीन पत्रकारों को छुट्टी दे देनी चाहिए। हमारें यहां नवकोपलों की कमी नहीं है।  

Wednesday, 29 April 2015

स्नेह/सेवा...


आज देश की कुछ महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियां संभाल रहे एक कद्दावर राजनेता के सरकारी आवास पर जाना हुआ, मुलाकात की और लम्बे समय तक रुकना हुआ। देखा कि उनके 4-5 साल के मृदुल बच्चे ने उन्हें स्टेचू कर दिया और भाई साहब सहसा रुक गए। हम ताकते रहे कि वो अब सिथिल हो रहे हैं, लेकिन वो चुपचाप खड़े के खड़े रहे, वो भी पूरे अनुशासन के साथ। देखकर लगा जैसे उस नन्हें बालक ने एक ही झटके में पूरे युवा मोर्चा और बीसीसीआई को स्टैण्डबाई में डाल कर छोड़ दिया हो। मैं एक पल असहज भी हुआ था।
थोड़ी देर बाद पता चला कि वो अपने दोनों बच्चों से काफी कम मिल पाते हैं। इसलिए काम से जब भी थोड़ी फुरसत मिलती वो बड़ी शिद्दत से अपने बच्चों को समय देते हैं। सेवा और स्नेह का ये समन्वय देखकर दिल एकबारगी स्वस्थ हो उठा, जो आजकल थोड़ा sick है।


Thursday, 23 April 2015

किसान मरा है...


इन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया वालों से कह दो कि सीधे-सीधे रीजनीति में घुस जाएं, बाहर से ही भौकने से शायद इनकी राजनैतिक कुण्ठा नहीं तृप्त न हो। हालांकि ये सब उस किसान की स्थिति से वाकिफ हैं कि वो राजस्थान का रहने वाला है और अपनी बर्बाद फसल व गृह-निस्कासन के भारी अवसाद में डूबा एक आशा में दिल्ली के चक्कर काटता रहा। वो दर-दर भटकता रहा और सब देखता रहा कि यहां तो हर जगह किसान-किसान खेला जा रहा है। लेकिन किसी ने उसकी सुध न ली। न तो पूरे राजस्थान के पच्चीसों सांसदों नें और न ही दिल्ली में बैठे किसानों और किसानी पर उनके हित की राग अलापने वाले हितैसियों नें।
राजनीति में बैठे लोग आम आदमी पार्टी को दोष नहीं दे रहे, वो जनते हैं कि ये सबके लिए शर्मशार होने की बात है। सर इस घटना को केजरीवाल तक सीमित कर देना ठीक नहीं है, वैसे भी इस घटना में उन पर दोष मढ़ना फिजूल है। यदि लोग एसी के इर्द-गिर्द घूमते रहे तो कल किसी और की रैली में कोई किसान फिर मरेगा। इसलिए इसे राजनैतिक रूप न देकर किसान हित की बात के लिए आवाज़ उठाना ज्यादा उचित होगा। वो किसान किसी की भी रैली में मौजूद हो सकता था, तुम सबसे उसका जी भर उठा था। तुम्हारे फरेब ने ही उसे आत्महत्या करने की हिम्मत दे दी। लेकिन टीवियानी पत्रकारों को बस कोई पार्टी ही नज़र आती है. इन टीवी वाले पत्रकारों की तो...
भाई उस किसान की स्थिति को सही से भांपते तो सब को एक साथ गरियाते तुम। जय किसान कहने वाली सरकार को। महायोग से लौटे किसान विशेषज्ञ राजकुमार को और आप पीर्टी को बुला के ही गरिया देते तो वो गाली खा लेती आकर भाई। 
मियां आप लोग भी अपने को गरिया सकते थे, क्योंकि स्टूडियो में चेहरे पर भारी फाउंडेशन लगा कर किसान संवेदना प्रगट करने के चक्कर में किसी को भी चांपने की तुम्हारी कला मज़ेदार है।
मशाला लेने का इतना ही शौक है तो स्टूडियों में एक पतुरिया बुला कर मशाला दिखाते रहा करो। एक दिन बाद ही सही, हम सुबह अख़बार पलटकर सही सूचना ले लेंगे, बग़ैर मशाले के ही।


Friday, 10 April 2015

nightout...

कितना अन्तर है तहजीबों में, 
कभी वहां चांदनी रातों में निकलते थे खेतों के लिए कबड्डी मचती थी।
आज नाईट-आउट के अंदाज़ ही निराले हैं।
वहां हर दांव में चाहते थे कोई देख ले हमे,
देखे न कोई दांव यहां हम चाहते हैं।

Thursday, 5 March 2015

बीबीसी, हद है...

निवेदन है प्रधानमंत्री कैमरन अपने चैनल को कुछ ब्रितानी मूल्य सिखा दें। वो तो किसी ऐसी अप्रिय घटना के मोमेण्टो के ख़िलाफ़ रहते हैं.... जलिया वाले बाग़ में तो यही सुना है भारतियों ने। अब क्यूं भारत में घटी एक दुर्भाग्यपूर्ण और अप्रिय घटना को कुरेदते हैं वो ये कहके कि इससे लोगों में चेतना आएगी। बीबीसी के कर्मयोगियों.... ज़रा जाकर उस दामिनी के घर का हाल ले लो, जब से आपने अपनी सर्जना दिखाई है, घर में चूल्हा बंद पड़ा है उसके। क्यूं उस बिटिया की रूह को समझने की कोशिश नहीं करते आप। हो सके तो सरकार के साथ मिलकर न्यायिक प्रक्रिया पर दबाब डाले, ताकि उसकी रूह को शान्ति मिले। उल्टे आप उस घिनौने अपराधी को अभिव्यक्ति की आज़ादी दे रहे हैं, जिस पर फांसी की सज़ा है। क्या पता है आपको कि उसकी बेबाकी से कितने लोग मज़बूत होंगे और कितनों में मौलिक सुधार आएगा।
कुछ महानुभाव और हमारे पत्रकार बन्धुओं ने अपने चैनल पर कहा है कि सरकार को वीडियो पर बैन लगाना चाहिए या फिर सोच पर...? पूछता हूं ऐसे बुद्धिजीवियों से कि क्या ये वीडियो सोच पर बैन लगा पाएगा जो आप सरकार से अापेक्षित हैं। अरे आप तो अपनी सोच पर काबू नहीं पा पा रहे हैं, तो फिर ये कैसे ख्याल कर सकते हो कि सरकार एक साथ सबकी सोच पर काबू ला सकती है। हां, किन्तु सरकार को ही ये करना है और वो उस पर काम कर रही है। कोई बीबीसी इसे नहीं कर सकता, सिवाय दर्द को कुरेदने के। इसलिए हर काम ज़रूरी नही, पहले उसकी उपयोगिता को भी रेखांकित किया जा सकता है।
एक बात और इस वीडियो को सिर्फ़ वही लोग देखेंगे, जो संचार माध्यमों से जुड़े हैं और ये सारे लोग खुद को चैतन्यावस्था में मानते हैं, तो फिर वीडियो किसके लिए...। क्या ये माना जाए कि आप दुनिया के सामने भारत की छवि को अपने तरीके से दर्शाना चाहते हैं।
शर्म करो........।।।

Wednesday, 25 February 2015

हंगामा है क्यूं बरपा...


•अमित राजपूत





 पिछली मनमोहन सरकार का भूमि आधिग्रहण बिल, जिसे संशोधित करने पर बीते दिनों से संसद से सड़क तक हंगामा मचा हुआ है, आख़िर इसकी असल वजह है क्या? ज़मीन एक ऐसा पेचीदा मामला है जिसके लिए लोग भाई-भाई का ख़ून बहा देते हैं। तमाम फसाद और मुटावों की जड़ होती है यो ज़मीन। तब ऐसे में निश्चित ही इससे संबंधित कोई भी पहलू हो हंगामा तो होना ही है। लेकिन, क्या इस हंगामें को सिर्फ हुंआ-हुंआ का राग दिया जाना ठीक है। मै समझता हूं, कि किसानों की ज़मीन से जुड़े मुद्दे पर किसी भी तरह की राजनीति, प्रलोभन, मातहती और अनायास धरने की निन्दा करनी चाहिए।
वास्तव में हम आज की बदलती परिस्थितियों के एवज में व्यवस्था को पुराने चश्म से नहीं देख सकते हैं, हमें अपने दीद का तरीक़ा और दृष्टिकोण दोनो बदल लेने चाहिए। देश की वर्तमान बनावट और गतिशीलता के मद्देनज़र हम राज्य के आधुनिकीकरण और ढांचागत आधारभूत संरचना की बनावट को अस्वीकार नहीं सकते हैं। ऐसे में हमें राष्ट्र-राज्य का सहयोग करना होता है, यही नीति है।
पेंच यहां पर फंसा है कि सरकार ने विधेयक के सेक्शन 10(ए) में संशोधन किया है। इससे सरकार किसी व्यक्ति या कंपनियों को भूमि अधिग्रहण के पहले वहां के 80 फीसदी लोगों से हरी झंडी लेने की ज़रूरत नहीं होगी। पूरा विपक्ष इसी बिंदु पर सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में है। हलांकि भूमि आधिग्रहण और पुनर्वास के लिए जो मसौदा तैयार किया गया है, उसके प्रावधानों के मुताबिक मुआवजे की राशि शहरी क्षेत्र में  निर्धारित बाज़ार मूल्य के दो गुने से कम नहीं होनी चाहिए, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में ये राशि बाज़ार मूल्य के चार गुने से कम नहीं होनी चाहिए।
साफ़ है कि ज़मीन अधिग्रहण और पुनर्वास के मामलों को सरकार ऐसे भूमि अधिग्रहण पर विचार नहीं करेगी, जो या तो निजी परियोजनाओं के लिए निजी कंपनियां करना चाहेंगी या फिर जिनमें सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बहुफसली ज़मीन लेनी पड़े। यानी अगर ये अध्यादेश कानून बनता है तो बहुफसली सिंचित भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकेगा।
तो फिर आख़िर हंगामा किस चीज़ का है, जबकि देश में किसानों की बदहाली भूमि अधिग्रहण की वजह से नहीं है, बल्कि उपज का सही मूल्य न मिलने, जोत का आकार छोटा होने, उन्नत तकनीक न मिलने, सिंचाई और बिजली न मिलने की वजह से है। फैक्ट्री की वजह से कोई किसान ग़रीब नहीं होता, वो इस वजह से गरीब होता है कि पिछले 60 साल में उसकी तीन पीढियों को ठीक से पढ़ाया नहीं गया और परिवार बढ़कर 44 लोगों का हो गया और जोत का आकार घट गया। वह इस वजह से ग़रीब होता है कि सरकार ने आसपास अस्पताल नहीं खोले और उसे कानपुर, इलाहाबाद या दिल्ली के डॉक्टरों ने घेरकर लूट लिया।
दरअसल, किसानों को असली समस्या भूमि अधिग्रहण से नहीं, मुआवजा और पुनर्वास में भ्रष्टाचार से है। एक आकलन के अनुसार सन् 1947 से लेकर 1990 तक देश में करीब 3.5 करोड़ लोग विस्थापित हुए थे जिनके पुनर्वास और मुआवजे में भारी गड़बड़ी हुई। बाद में भी गड़बड़ी हुई होगी, ये संदर्भ राम गुहा की किताब ‘इंडिया ऑफ्टर गांधी’ में मिल जाएगी।
‘इंडिया ऑफ्टर गांधी’ के अनुवादक प्रखर पत्रकार सुशांत झा इस विषय पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए इसे एकाध आपत्ति के अलावा पूर्णतः स्वीकार करते हैं। वह कहते हैं कि “इस बिल में जिन पांच बिंदुओं में किसानों की सहमति न लेने की बात कही गई है उसमें सिर्फ एक पर या ज्यादा से ज्यादा डेढ़ पर मेरी आपत्ति है, वो भी स्पष्टता के संदर्भ में। इंडस्ट्रियल कॉरीडोर पर ख़ासतौर पर। मान लिया जाए कि पटना से दरभंगा इंडस्ट्रियल कॉरीडोर विकसित करने को मंजूरी दी जाती है, (माफ़ करें संदर्भ हमेशा मैं अपने ही इलाके का सोच पाता हूं, रुस या पोलैंड जेहन में नहीं आता) तो उस कॉरीडोर में अधिग्रहित ज़मीन सिर्फ़ सरकार उपयोग करेगी या कोई और..? बाद में वह औने-पौने दाम पर औद्योगिक घरानों को तो नहीं दे देगी? तो यह एक नया SEZ टाइप मामला भी हो सकता है। सरकार को इस पर स्पष्टीकरण देने की जरूरत है। बाकी सुरक्षा, ग्रामीण विकास, सस्ते आवास और पीपीपी प्रोजेक्ट में आप चाहें तो पीपीपी पर आपत्ति कर लें और स्पष्टीकरण मांग ले। लेकिन पीपीपी प्रोजेक्ट भी अंतत: सरकार और समाज के लिए ही होते हैं, चाहे वो दिल्ली मेट्रो हो या कोई मेगा सड़क परियोजना।”

महत्वपूर्ण है कि अण्णा हजारे के आन्दोलन के मूड में आते ही सारा माहौल गरमा गया है। अण्णा हजारे जो बात कर रहे हैं उस पर सुशांत जी का कहना है कि “अगर अन्ना हजारे की बात मान ली जाए तो देश में नई सड़क और विद्यालय तो दूर की बात है, सरकार एक कुंआ तक नहीं खोद पाएगी। वो वैसी बात है कि ज़मीन पर किसानों का 'शाश्वत' या 'अध्यात्मिक' हक है। यह किसी पंचतंत्र की कहानी के वक्त सा लगता है, जबकि आधुनिक राष्ट्र-राज्य में ज़मीन पर वास्तवकि हक 'स्टेट' का है जिसका नेतृत्व एक संप्रभु संसद का हिस्सा होता है। गांधी और बिनोवा ने भी कहा था कि 'सभै भूमि गोपाल की...' यहां गोपाल का मतलब गाय चरानेवाला नहीं, गांधी का ईश्वर (या सामूहिक विवेक?) था और लोकतंत्र में 'सार्वभौम सत्ता' है। लेकिन अन्ना कह रहे हैं कि जमीन पर असली हक किसान का है और वो हक वो किसी कीमत पर उससे छीना नहीं जा सकता। कई बार यह बात तो परले दर्जे की पूंजीवादी सोच लगती है जिसमें जो मेरा है वो मेरा है, कोई छीन नहीं सकता। हालांकि मैं किसानों की तुलना पूंजीवादियों से यहां नहीं कर रहा।”
फिर भी कुल मिलाकर मै इस बिल को स्वीकार करता हूं और भरोसा करता हूं कि ये राष्ट्रहित में होगा।
हलांकि कुछेक बिंदुओं पर वास्तव में सरकार को एक मर्तबा फिर से विचार कर लेना चाहिए। जैसे भूमि अधिग्रहण के ‘अरजेन्सी प्रावधान’ की काफी आलोचना हुई है। इसके तहत सरकारें ये कहकर किसानों की ज़मीने बिना सुनवाई के तुरत-फुरत ले लेती हैं कि परियोजना तत्काल शुरू करनी चाहिए। दूसरा, अधिग्रहण से जीविका खोने वालों का निर्वाह-भत्ता और समयावधि दोनो कम हैं और सीधी दी गई रकम अनुपयोगी है। इस विषय पर भी सुशांत जी थोड़ा अलग तरह से बात कहते हैं, जिस पर विचार करने की ज़रूरत है। उनका मानना है कि “किसान एकमुश्त इतना पैसा लेकर करेंगे क्या? उन्हें शेयर बाजार में लगाना या फ्लैट ख़रीदना आता नहीं, उनका हाल वहीं होगा जो नोएडा के किसानों का हुआ। 10-12 साल में दारू पीकर फूंक देंगे। इसका उपाय ये है कि सरकार सिर्फ पैसा न दे, बल्कि परिवार में लोगों को सरकारी नौकरी भी दे। वह ज्यादा ठोस उपाय है।”
भूमि अधिग्रहण का एक पहलू यह भी है कि जब किसी इलाके में उद्योग लगाए जाने की योजना आती है तो उस इलाके के आसपास के शहरों में बसे धन्ना सेठ गिद्ध की तरह गाँव की ज़मीन पर झपट पड़ते हैं।
सूचना हासिल करने में आगे ये तबका किसानों को उद्योग के आने की भनक भी नहीं लगने देता और दलालों के माध्यम से उनकी ज़मीन को सस्ते दामों में ख़रीद लिया जाता है।
अगर बचे-कुचे किसान अपनी ज़मीन बचाने का आंदोलन करें तो उसमें तोड़-फोड़ करने वाले भी यही लोग होते हैं। और अंत में सारे मुआवजे-नौकरी का फायदा इन्हीं धन्ना सेठ दलालों को जाता है। इसलिए इस अध्यादेश पर इतना हंगामा मचाने की कोई ख़ास ज़रूरत नही है, जितनी की किसानो को सताने वाले, उनको प्रत्यक्ष उपेक्षित करने वालों के आचरणों में  सुधार के लिए हंगामा मचाने की है।
  

 
 



Saturday, 21 February 2015

बेदर्दी मौसम...

इस बेदर्दी मौसम में हम जाएं कहां,
किस डाली के हम बैर चुने?
सो तड़प के मारे निकल पड़े...

अब आफत थी कि कहां रुकें..??