Monday, 28 December 2015

साक्षात्कार...



यूं तो भारत और योग का संबंध हज़ारों साल से भी ज़्यादा पुराना है। लेकिन हाल के कुछ दशकों में इसकी लोकप्रियता तथा स्‍वीकार्यता तेज़ी से बढ़ी है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि पुरातन प्रयासों के समानान्तर आज भी भारतीय ज्ञान की वर्षा सम्पूर्ण विश्व-जगत में हो रही है, भले ही औसतन उसका प्रतिशत कम हो किन्तु निःसंदेह रूप से हमारे योगियों, ज्ञानियों, ऋषियों और महात्माओं के द्वारा आज भी उसके पोषण के प्रयास निरन्तर जारी रहते हैं। ऐसे ही प्रयासों में लगातार ख़ुद को समर्पित करने वाले हैं योग व समाज-सेवा के क्षेत्र में भारत के राष्ट्रपति व देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं द्वारा सम्मानित योगी अरुण तिवारी जिन्होने भारत के अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ सहित दुनिया के अनेक देशों जैसे श्रीलंका, यूरोप, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, फिनलैंड, लुथवेनिया, अमेरिका और कनाडा आदि में योग-सुधार कार्यक्रम के माध्यम से हज़ारों लोगों तक योग को सही रूप में पहुँचाया है। योग को लेकर दुनिया भर में उनके प्रयासों की पड़ताल कर रहे हैं अमित राजपूत-


आप योग में पार्श्व कुण्डलिनी योग के स्वामी हैं। योग के छः प्रमुख आयामों राजयोग या आष्टांग योग, हठयोग, लययोग, ज्ञानयोग, कर्म योग और भक्ति योग में से पार्श्व कुण्डलिनी योग किसके अंतर्गत समाहित है?

जवाब- आपने जो योग की अलग-अलग विधाएं बतायी हैं, उनसे भिन्न है कुण्डलनी योग। इसके भी कई योग-गुरू हुए हैं जो अपनी अलग-अलग विधाओं के ज्ञान से लोगों को कुण्डलिनी योग का ज्ञान अनुभव कराने के लिए आगे आये हैं। लेकिन जो पार्श्व कुण्डलिनी योग है, एक जैन मत के अनुसार भगवान पार्श्वनाथ ने कुण्डलिनी योग के द्वारा ही निर्वाण प्राप्त किया, तब से इस कुण्डलिनी योग को हम पार्श्व कुण्डलिनी योग के नाम से जानते आ रहे हैं जिसे हमारे पूज्य गुरुदेव महाराज आचार्य श्री रूपचंद्र जी महाराज ने आध्यात्मिक रुप से निखारा है और इसे हम मिलकर जन-जन तक पहँचा रहे हैं।


योग की क्रियाओं के नाम यथा पशुवत आसन, वस्तुवत आसन, प्रकृति आसन, अंग एवं अंगमुद्रासन और योगीनाम आसन उनको वेशभूषित करने के लिए रखे गए हैं या फिर कोई और कारण हैं?

जवाब- ये प्रश्न हमारे सामने बहुत बार आता है और सबसे पहला प्रश्न आता है कि आसन कितने हैं, तो मैं यही कहता हूँ कि यदि आप हज़ार-दस हज़ार यानी संख्या में अगर देखें तो ये संख्या में नहीं हैं, क्योंकि हमारे ऋषियों-मुनियों ने पशुओं को देखा तो उनकी मुद्राओं को, उनके आसनों को मानव शरीर में उतारने की कोशिश की। मान लीजिए मोर को कुछ क्रियाएं करते देखा तो उन्होने इससे मयूर आसन की धारणा ली। किसी कीड़े को देखा, जैसे सांप को ही ले लीजिए वो कोई आसन बना रहा है तो उसकी क्रियाओं को देखकर सर्पासन या भुजंगासन की धारणा मिली। फिर उसको हमारे ऋषियों ने धारण कर शरीर में ढालने की कोशिश की। ऐसे ही वृक्षों के नाम पर आसनों के नाम पड़े, वस्तुओं के नाम पर नाम पड़े, जैसे धनुरासन। ऐसे ही तमाम मुद्राओं और बिम्बों को समझकर और चिन्तन के बाद उससे होने वाले लाभ को समझकर बड़े वैज्ञानिक रूप से शोधपरक ढंग से इनके नामकरण किए गए हैं।
इनके प्रमाण समझिए, जैसे मयूर है वो सांप को भी पचा लेता है, विष को भी पचा लेता है। तो उस आसन को करने से उसी की तरह हम शक्तिवान भी हो जाते हैं। हमारी पाचक क्षमता बढ़ जाती है। बाद में जब शोध हुआ तो ये साबित भी हुआ कि मयूरासन करने से सबसे ज़्यादा प्रभाव पेट पर पड़ता है। इसे करने से हमारे पेट के अन्दर जो ऑर्गन्स हैं वो सब स्वस्थ हो जाते हैं। मयूर आसन करने से हमारा फेफड़ा बहुत मज़बूत हो जाता है, इससे हमारी पाचक क्षमता बढ़ जाती है। तो हमारे योग ऋषियों ने कहा कि मयूर आसन करने वाला व्यक्ति कुछ भी पचा सकता है, यहां तक कि यदि कोई साधना करे तो वह विष को भी पचा सकता है। इसी तरह भुजंग की आयु का कुछ पता नहीं है, हज़ारों साल तक सांप जीता है। तो भुजंग आसन करने की कोशिश ऋषियों-मुनियों ने की और उसको साधा। और फिर जो परिणाम सामने आया वह यह कि आपकी आयु लम्बी होगी क्योंकि भुजंग आसन करने वाले का हृदय, फेफड़ा और मस्तिष्क इतना मज़बूत हो जाता है कि वह शक्तिशाली अनुभव करता है।


भारतीय योग को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता मिलते हुए आरम्भिक विश्व योग दिवस को आप किस रूप में देखते हैं?


जवाब- हमारे योग-इतिहास के लिए बड़े गौरव का प्रश्न हैं। ये हमारे देश के गौरव का विषय हैं। मुझे ख़ुद अपने आप पर ख़ुशी होती है, गर्व होता है कि सन् 2013 में मैने संयुक्त राष्ट्र संघ में पूरे एक घण्टे का योगाभ्यास और व्याख्यान किया जहाँ लगभग 40-45 राष्ट्राध्यक्ष भी उपस्थित थे। योग को लेकर यह यूएनओ के इतिहास में पहली बार था। तभी मैने देखा कि उन दिनों योग को लेकर यूएनओ में भी एक हवा थी और इसी बीच भारत से प्रधानमंत्री मोदी जी का प्रस्ताव आया जिसे सभी ने सहर्ष स्वीकार किया और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रुप में हर भारतीय को गौरवान्वित होने का मौका मिला। और इसके साथ ही एक बात यह भी है कि पूरी दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में योग को पेटेण्ट कराने की होड़ में लगे हुए लोगों के गाल पर ये एक तमाचा भी सिद्ध हुआ। अब पूरी दुनिया में एकमत से यह स्वीकार्यता अवश्य बनेगी कि योग भारत की आत्मा की प्रबलता है। 


आपके अनुभवों के आधार पर हमें दुनिया के दूसरे देशों के लोगों की दृष्टि में बताएं कि वह योग को किस तरह से देखते हैं और हमारी दृष्टि उनसे किस तरह भिन्न है?


जवाब- सबसे बड़ा अन्तर है सोच का। यहाँ हम जिसेको भी बोलते हैं कि आप आसन कीजिए और इससे आपको फ़ायदा होगा तो उसमें प्रश्न नहीं आता कि क्यूँ फ़ायदा होगा, कैसे होगा, कितनी देर में होगा और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। भेंड़चाल है। अग़र हमने दो हज़ार लोगों को यहाँ योग कराया तो उसमें प्रश्न करने वाले सिर्फ़ दस लोग होंगे। वहीं दूसरे देशों में हमने देखा कि दो हज़ार लोगों में ही लगभग अठारह सौ लोग प्रश्न पूछने वाले वहां हैं। अगर मैने वहाँ हार्ट के लिए योग बताया तो लोग पूछते हैं कि मुझे बैक-पेन है तो क्या मैं हार्ट का योग करूँ? यहाँ ऐसा नहीं है, किसी को हार्ट-पेन है तो वह पूँछेगा नहीं। वहाँ लोग प्रत्येक आसन का आधार जानना चाहते हैं, लोग तभी कोई योग करते हैं जब वो लगभग उसके वैज्ञानिक पक्ष को समझते है। इसके अलावा पश्चिमी देशों में लोग पैदल चलनें में भी सहज हैं। लोग दस किलोमीटर तक पैदल ही चले जाते हैं, जोकि हमारे यहां पहले होता था लेकिन अब भारत में लोगों ने पैदल चलना कम कर दिया है।

योग को आध्यात्म से जोड़कर देखना कितना उचित होगा?

जवाब- देखिए, वास्तव में योग आध्यात्म के बिना सिद्ध नहीं होता है। इसलिए योग आध्यात्मिक ही है, आसन एक पड़ाव है। यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और फिर समाधि ये योग के चरण हैं। जिन्होंने भी योग प्रस्तुत किया सब समाधि तक अपनी बात को ले गए। तो योग शरीर की यात्रा करके समाधि तक जाता है। सबसे पहले है आचरण इसलिए यम की स्थापना हुयी। फिर नियम में व्रत को धारण करना है, जिससे हमारी दिनचर्या दुरुस्त रहे। इसी तरह आसन से हम अपने तन-मन को साधते हैं। फिर इसी तरह हम क्रमशः प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान के माध्यम से समाधि में विलीन होते हैं। तो ये सब पड़ाव पार कर पाना बिना आध्यात्म के सम्भव ही नहीं है। तभी हमें आत्मबोध हो पाता है। पूरी दुनिया में लोगों ने माना है कि आध्यात्म के बिना न मन में शान्ति हो सकती है और न हमें लक्ष्य का पता चल सकता है। इसीलिए सभी धर्मों और संप्रदायों ने आध्यात्म को स्वीकार किया है जिसे वास्तविक मायने में योग ने पूर्ण किया हु्आ है। आप देखिए, योग ने हमें जो दिया है वह एक सम्प्रदाय-मुक्त योग दिया है। योग भारतीय-संस्कृति का हो सकता है किसी धर्म का नहीं और इतनी स्वच्छंदता आध्यात्म के अलावा पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं और नहीं है।


आज लोगों में योग की उपयोगिता के प्रति नज़रिया क्या है? क्या वो कुछ बदल गया है?


जवाब- योग का जो नज़रिया है वह अभी सिर्फ स्वास्थ्य तक रह गया है। पहले योग साधना-परक होता था। आज योग के नाम पर एक तरह से जैसे व्यापार सा हो रहा है और दिखावापन आ रहा है। पहले एक गुरू एक शिष्य को योग सिखाता था। अभी गुरू नहीं सिखा रहा है, एक व्यापारी योग को बेंच रहा है, बाँट रहा है और बाज़ार में दूसरे ख़रीददार उसे ख़रीद भी रहे हैं। पैसे देकर योग हो रहे हैं, जिनमें गुणवत्ता भी नहीं है। लोग दिखावेपन में भूल गए हैं कि योग से शरीर ही नहीं जीवन भी सधता है। आसन का अर्थ मात्र शरीर को तोड़ना-मरोड़ना ही नहीं है, इससे हमारी चिति भी स्वस्थ होती है। आज योग के क्रम बदल गए हैं। निःसंदेह योग के प्रति लोगों का नज़रिया बदला है। मै तो यही कहूँगा कि आज यह दिशाहीन हो रहा है। इसलिए हमें इसके प्रसार के साथ-साथ योग के सही प्रचार की ओर भी ध्यान देना होगा।


पश्चिमी देशों से 1990 में योग का विकसित रूप भारत आया, जिसे पॉवर-योग कहा गया। यह योग हर योगगुरु अपने मुताबिक कराता है। इसे आप कितना उपयोगी मानते हैं?


जवाब- (थोड़ा सोचकर)  देखिए, पॉवर-योग भी होता है और एक हॉट-योग भी होता है। पॉवर-योग से मतलब है हमारा जो हठ योग है। वास्तव में पॉवर-योग आष्टांग-योग का ही एक प्रकार है। और हॉट-योग जो है वह बंद कमरे में तक़रीबन चालीस डिग्री सेण्टीग्रेट के तापमान में, जहाँ सांस लेना भी दुर्लभ है वहां किया जात है। पश्चिमी देशों में योग को इंट्रेस्टिंग बनाने के प्रयास के चलते ये सब विकृतियां आयी हैं। जब ये इंट्रेस्टिंग होता गया तो युवाओं को बड़ा आकर्षित करने लगा। हॉट-योग करेंगे तो पसीना निकलेगा यही उन युवाओं की धारणा रहती है। योग से आन्तरिक शान्ति प्राप्त करना है, रोग-मुक्त होना है ये सब सरोकार उनसे छूटते जा रहे हैं। सही मायने में इसके कोई लाभ नहीं हैं। ये तनिक भी उपयोगी नहीं हैं। ऐसे ही तमाम योग हैं- ड्रामा-योग होता है। पिलाटे-योग होता है और हास्य-योग भी होता है। सच में इन्हें योग कहना ही व्यर्थ है, योग से तो तन के साथ-साथ मन, समाज, राष्ट्र और समस्त विश्व स्वस्थ होता है।


छोटे बच्चों के प्रति योग को लेकर तमाम भ्रांतियाँ रहती है। बच्चे कितने साल की अवस्था से योग का आरम्भ कर सकते हैं?


जवाब- जैसे ही बच्चा जन्म लेता है, किलकारी भरता है तो वह सबसे पहले ब्रीदिंग ही करता है। वह हाथ-पैर हिलाता है तो कभी अंगूठे को चूसता है, यानी वह अपने और माँ के वियोग के तुरन्त बाद ही योग से जुड़ जाता है। थोड़ा बड़े होने पर उनको खिंचाव के आसन और स्थिरता वाले आसन जैसे- वृक्षासन, एकपादासन आदि करवाएं। बच्चे लम्बी-गहरी साँसें लें और कठिन आसनों को थोड़ा हड्डियाँ मज़बूत होने के बाद करें। ऐसे आसनों से हल्की उम्र में थोड़ा बचना चाहिए, पाँच साल तक तो रुकें ही। मयूरासन न करें, भुजंग आसन आदि से बचें।


जिस तरह राम के निशान इस भारतीय उपमहाद्वीप में जगह-जगह बिखरे पड़े है उसी तरह योगियों और तपस्वियों के निशान जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में आज भी देखे जा सकते है। उस परम्परा को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य में आपके क्या प्रयास हैं?


जवाब- जैसे पार्श्व कुण्डलिनी योग की विधा को लोग नहीं जानते थे, जबकि यह विधा बहुत वैज्ञानिक है। अमेरिका के अस्पतालों में वहां के डॉक्टरों के साथ मिलकर हम ख़ासकर कैंसर के मरीजों पर इसका शोध कर रहे हैं। हमें बहुत अच्छे इसके परिणाम मिल रहे हैं। इसके साथ-साथ अन्य विधाओं को भी हम साथ लेकर उसमें भी शोध कर रहे हैं। अग़र ग़लत रूप में कहीं कोई ग़लत नाम में योग का प्रसार-प्रचार हो रहा है तो हमारा उन पर भी ध्यान हैं क्योंकि अग़र इनका मूल रूप लोगों तक नहीं पहुँचेगा तो हम जैसे योगियों का रहना ही व्यर्थ है। और ये सुधार ही इन ऋषियों-मुनियों के पदचिन्हों पर चलना, उनकी परम्परा को आगे बढ़ाने में और उन्हें बनाए रखने के लिए आवश्यक है। इसके अलावा मेरा व्यक्तिगत प्रयास सेना के जवानों को योग का प्रशिक्षण देना है। मै अब तक अपने भारत देश के दस हज़ार जवानों को योग का प्रशिक्षण देकर स्वयं गौरव का अनुभव कर रहा हूँ और मैं मानता हूँ कि इससे मेरा एक योगी होना सिद्ध हो गया।


आप अपनी प्रसिद्धि को किस रूप में स्वीकारोक्ति देंगे- भारतीय योगगुरू के रूप में, विश्व प्रसिद्ध युवा योगी के रूप में अथवा एक एनआरआई योगी के रूप में?


जवाब- (मुस्कुराते हुए) एनआरआई नहीं..। मैं हमेशा और कभी भी ये बात कहूँगा तो यही कहूँगा कि मैं एक भारतीय योगाचार्य ही हूँ। गुरू के आदेश और अपनी परम्परा के वशीभूत होकर मैं विश्व के दूसरे हिस्सों में योग पर शोध, उसको सही रूप में पहुँचाने के अपने प्रयासों और योग के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हूँ। इसके पीछे हमारे ऋषियों-मुनियों का अनुकरण, मेरे गुरू का आशीर्वाद, मेरे बड़े भाई श्री अवधेश तिवारी का स्नेहिल सहयोग और मेरे सभी भारतीयों की प्रेरणा सदा अपने साथ लिये रहता हूँ।


 

Sunday, 29 November 2015

सिगरेट


• अमित राजपूत


उड़ा दो धुएँ से अतीत को
टूट कर गिरी है जो भद्दी राख
आज की आबोहवा के हल्के झोंके में
ऐश-ट्रे से उड़ जाने दो उसे।

हलक तक जाए जो ये काला धुआँ
तो खींच लो शौक से
आहिस्ता-आहिस्ता...
फिर खाँसो इस क़दर
कि झोंझ भर बलगम गिरे
खींच लाया हो जो नासूर सारे,
जख़्म बनकर
कोशिकाओं को जो छलनी कर रहा है आज भी

आसमान सारा सूना पड़ा है तुम्हारे लिए
भरो रंग जो सुकूँ दे ख़ुद को
उड़ा दो...
उड़ा दो धुएँ से अतीत को
उड़ा दो।

Saturday, 31 October 2015

आधी आबादी की पूरी आज़ादी...


शाम का वक़्त। तक़रीबन सात बज रहे हैं। चिरचित्त भाव से पूरे कम्पार्टमेण्ट में सन्नाटा है। लोग जिज्ञासाशून्य भाव से एक-दूसरे को देख रहे हैं और बार-बार बिखरे चिन्तन-पाश में ख़ुद को बांधने की कोशिश कर रहे हैं। साफ़ लफ़्ज़ों में हमें सुनाई पड़ रहा हैं- ‘अगला स्टेशन.. राजीव चौक, है। दरवाज़े दायीं ओर खुलेंगे।’
दरवाज़े दायीं ओर खुल गये। कुछ और लोग सहयात्रा के लिए उस कम्पार्टमण्ट के हिस्सेदार हो गए। वो सभी अन्दर आये और उनके ही साथ अन्दर आयी पूरी आज़ादी। जी हां, पूरी आज़ादी का बिम्ब बनी आधी आबादी का एक प्रतिनिधि मण्डल उस कम्पार्टमेण्ट में प्रवेश कर चुका था।
अगला स्टेशन कौन सा है, इसकी उद्घोषणा के स्वर कहीं किसी अनन्त में से विलुप्त हो चुके थे। लोगों की जिज्ञासाशून्यता रसपूर्ण हो गयी। सभी के चिन्तनविहीन मस्तिष्क में चिन्तन की क्रिया प्रारम्भ हो गयी। ये सब हमारी आधी आबादी की क्रियाशीलता के परिणाम स्वरूप सम्भव हो पाया था।
चार नवयुवतियों का एक समूह मेट्रो के इस कम्पार्टमेण्ट में है। ये मात्र चार युवतियां ही न थीं, बल्कि ये तो अपने अन्दर धर्म के प्रतीक चार स्तम्भों को समाहित किये थीं, इनका ये दल हमारे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति का द्योतक है। इनकी आज़ादी और इनकी ही ग़ुलामी व अभिव्यक्ति के नियमन से ही हमें फौरन पता चल जाता है कि हमारे समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति क्या है। उनका दशा क्या है। वह किस हाल में जी रही हैं। आज के समाज में वह कितनी आज़ाद हैं हमें इनकी ही अभिव्यक्ति से साफ़ पता चल जाता है।
इनमें से एक युवती को मैने दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कंवेन्शन में बोलते सुना था। विषय था- आधी आबादी और उनकी पूरी आज़ादी। ये युवती मुखर वक्ता थी। वो ख़ुद में किसी अदृश्य परतंत्रता से मुक्त होने की किसी ज़बरदस्त झुंझलाहट में  नज़र आती है जो कहीं और कभी नज़र भी न आ रही है और न ही कभी आयेगी, किन्तु यह स्वीकार्य है कि उनमें कोई परतांत्रिक पुट अवश्य है।
देखो न, पूरे कम्पार्टमेण्ट में सन्नाटा ही सन्नाटा बिसरा पड़ा है। न कोई कुछ चीं.. कर रहा हैं और कोई कुछ पूं...। लोग नज़रे भी मिलाने से एक-दूसरे से मोहताज हैं क्योंकि कम्पार्टमेण्ट में आज़ादी तैर रही है..। चारों एक-दूसरे को पूरी स्वच्छंदता से ज़ोर-ज़ोर गालियां बक रही हैं और खिलखिला उठ रही हैं। एक कहती है कि तू साली इतनी तो बहनचो# न थी बे। तो सभी ठहाके लेतीं। फिर दूसरी बोलती कि कुतिया फलां से ठो#वा के ही इतनी बहनचो# हो गयी है गाइज़। एक ठहाका और लगता।
सिलसिला यहीं न रुका। नीरस और मानसिक ग़ुलामी वाले लोगों के झुंड से भरे कंपार्टमेण्ट में ये हमारी नयी महिला ब्रिगेड जो हमारी भावी पीढ़ी और सभ्याता की नई इबारत लिख रही हैं एक-दूसरे के होठों का पाश बना रही हैं। कंपार्टमेण्ट में ही खड़े-खड़े पूरी आज़ादी से, जिसे देख बाकी ढीठ लोग मुंह फेर लिये, जिनके दिमाग़ में ग़ुलामी का जाला लगा था। मुझे हमारे देश की इस आधी आबादी की पूरी आज़ादी देखकर गौरव की अनुभूति होती रही है। वो आन्दोलन जो भारत में नारी-उत्थान के लिए पिछले समय से चल रहा था उससे जुड़े लोगों ने बड़ी जल्दी ही इस पर विजय पा ली है। मुझे इससे जुड़े लोगों पर अभिमान है। वास्तव में सुकून मिल रहा है कि हमारे समूचे देश की नारियां इतनी सशक्त हो गयीं हैं कि यूरोप भी पार न पाए। आधी आबादी की इस पूरी आज़ादी का यह प्रमाण आंकड़ेगत हमारे गौरव का प्रतीक है।

अगला स्टेशन आ चुका है। कम्पार्टमेम्ट में ग़ुलामी का अनुभव कर रहे कुछ संकुचित और रूढ़िवादी मानसिकता के लोग अब प्लेटफॉर्म पर थे जो कुछ भुनभुनाते से सीढ़ियों की ओर बढ़ रहे हैं...। 

Thursday, 22 October 2015

रावण दहन v/s विजय दशमी...


आज का रावण दहन। तमाम आतिशबाजियों के बीच धूल-धूषित कथित रावण के झूठे विनाश के जश्न में गर्दा फांकते रामभक्त।
अधिकाधिक हानिकारक रसायनों से बने बारूद से लिपटी ध्वनि व पावन समीर को प्रदूषित करने वाले बारूद के विस्पोट से उठते धुएं के ग़ुबारों को सूंधते रामभक्त।
रावण यातना देता था। रामभक्तों को जीने नहीं देता था। उसके निरंकुश शासन में लोगों की सांसे चलती थीं लेकिन रुक-रुक कर और वो भी न जाने किस पल उखड़ जाए, ठीक आज के प्रदूषण भरे वातावरण में जीने के बरक्स।
रावण यही तो चाहता था कि लोग उसके सरोकार में घुट-घुट कर जियें।
जब वो ज़िन्दा था तब भी लोग ऐसे जीते थे...
अब वो नहीं रहा तो लोगों को अपने विनाश के जश्न में इस क़दर डुवोकर चला गया कि लोगों को भान ही न रह गया कि वो कर क्या रहे हैं।
सच में, इन रामभक्तों को हुआ क्या...???
जो चाहा..वो पाया। तो जीत भी उसी की।
रावण जीत गया है।
तय करो ये विजय की दशमी आख़िर हम किसकी मना रहे हैं...?
हम वास्तविक विजय दशमी मना सकते हैं, लेकिन वास्तविक मायनों में। ख़ुद को भारी प्रदूषण से बचाकर जो आपका किया हुआ सबको भोगना पड़ता है।
इसलिए जागो..! और जीतो...!

शुभ विजयदशमी।

Sunday, 18 October 2015

प्रयाग का सनद...


किसी इन्सान के लिए एक तरफ विजय-जश्न व तमाम चैतन्य से भरे आनन्द का उत्सव हो और दूसरी तरफ़ ग़म-ए-मातम का दिन तो कोई क्या चुनना चाहेगा। ज़ाहिर है कि वो चाहेगा कि जीवन के रंगों में उत्साह ही उत्साह भरा रहे। चूंकि इलाहाबाद के लगभग हर मुसलमान घर में दशहरे का पर्व बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। वे देवी विसर्जन में भी झूमते हुए जाते हैं और रात को निकलने वाली चौकियों में मुसलमान के घर पैदा हुए जाने कितने ही तमाम लड़के-लड़कियां राम-सीता, शिव-पार्वती और हनुमान के पात्र बनते हैं और हिन्दुओं के घर से उनके बच्चे मोहर्रम के मातम में शामिल होते हैं। (मेरे बड़े भाई का सगा साला भी मोहर्रम का मातम मनाता है।)
ऐसी अनूठी और गंगा-जमुनी तहजीब का शहर है इलाहाबाद। इस बार मोहर्रम और दशहरे की चौकियों का समय लगभग समान है। एस बाबत शहर के गणमान्य मुसलमानों ने ये निर्णय लिया है कि मोहर्रम में ताज़िये नहीं निकाले जायेंगे, ताकि शहर अमन से एक त्यौहार को मुकम्मल कर लिया जाए और चूंकि हर जगह पहले से दुर्गा पंडाल लग चुके हैं इसलिए मुसलमान भाईयों ने निर्णय लिया कि ताज़िये नहीं निकाले जायेंगे।
प्रयाग एक बार तुमने फिर से अपने बाशिंदों का सनद पूरे अवाम के सामने रख दिया। तुम्हे प्रणाम प्रयाग।
तुम्हे प्रणाम..।।।


हे दुर्लभ...!


सत्यधर्म पक्षधर भारत के अगुवा
सरदार सरोवर, राष्ट्र शिल्पी
रियासत-ए-हिन्द
रत्नजड़ित मणिका
हे दुर्लभ!
सरदार वल्लभ।
आनन्द औ वैभव के दाता
एकता के साक्षी

सरदार वल्लभ।

वो पतवार कहां हैं...


तहजीबें बदल गयीं
दरख़्तों की छांव बदल गयी
बदला है देखो ये कितना ग़ैरत ज़माना
हैरत है...
हम औ हमारा वतन कहां है
कहां हो!
सरदार....
जो देकर गये थे

वो पतवार कहां है?.