Sunday, 29 November 2015

सिगरेट


• अमित राजपूत


उड़ा दो धुएँ से अतीत को
टूट कर गिरी है जो भद्दी राख
आज की आबोहवा के हल्के झोंके में
ऐश-ट्रे से उड़ जाने दो उसे।

हलक तक जाए जो ये काला धुआँ
तो खींच लो शौक से
आहिस्ता-आहिस्ता...
फिर खाँसो इस क़दर
कि झोंझ भर बलगम गिरे
खींच लाया हो जो नासूर सारे,
जख़्म बनकर
कोशिकाओं को जो छलनी कर रहा है आज भी

आसमान सारा सूना पड़ा है तुम्हारे लिए
भरो रंग जो सुकूँ दे ख़ुद को
उड़ा दो...
उड़ा दो धुएँ से अतीत को
उड़ा दो।

Saturday, 31 October 2015

आधी आबादी की पूरी आज़ादी...


शाम का वक़्त। तक़रीबन सात बज रहे हैं। चिरचित्त भाव से पूरे कम्पार्टमेण्ट में सन्नाटा है। लोग जिज्ञासाशून्य भाव से एक-दूसरे को देख रहे हैं और बार-बार बिखरे चिन्तन-पाश में ख़ुद को बांधने की कोशिश कर रहे हैं। साफ़ लफ़्ज़ों में हमें सुनाई पड़ रहा हैं- ‘अगला स्टेशन.. राजीव चौक, है। दरवाज़े दायीं ओर खुलेंगे।’
दरवाज़े दायीं ओर खुल गये। कुछ और लोग सहयात्रा के लिए उस कम्पार्टमण्ट के हिस्सेदार हो गए। वो सभी अन्दर आये और उनके ही साथ अन्दर आयी पूरी आज़ादी। जी हां, पूरी आज़ादी का बिम्ब बनी आधी आबादी का एक प्रतिनिधि मण्डल उस कम्पार्टमेण्ट में प्रवेश कर चुका था।
अगला स्टेशन कौन सा है, इसकी उद्घोषणा के स्वर कहीं किसी अनन्त में से विलुप्त हो चुके थे। लोगों की जिज्ञासाशून्यता रसपूर्ण हो गयी। सभी के चिन्तनविहीन मस्तिष्क में चिन्तन की क्रिया प्रारम्भ हो गयी। ये सब हमारी आधी आबादी की क्रियाशीलता के परिणाम स्वरूप सम्भव हो पाया था।
चार नवयुवतियों का एक समूह मेट्रो के इस कम्पार्टमेण्ट में है। ये मात्र चार युवतियां ही न थीं, बल्कि ये तो अपने अन्दर धर्म के प्रतीक चार स्तम्भों को समाहित किये थीं, इनका ये दल हमारे भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति का द्योतक है। इनकी आज़ादी और इनकी ही ग़ुलामी व अभिव्यक्ति के नियमन से ही हमें फौरन पता चल जाता है कि हमारे समाज में महिलाओं की वास्तविक स्थिति क्या है। उनका दशा क्या है। वह किस हाल में जी रही हैं। आज के समाज में वह कितनी आज़ाद हैं हमें इनकी ही अभिव्यक्ति से साफ़ पता चल जाता है।
इनमें से एक युवती को मैने दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कंवेन्शन में बोलते सुना था। विषय था- आधी आबादी और उनकी पूरी आज़ादी। ये युवती मुखर वक्ता थी। वो ख़ुद में किसी अदृश्य परतंत्रता से मुक्त होने की किसी ज़बरदस्त झुंझलाहट में  नज़र आती है जो कहीं और कभी नज़र भी न आ रही है और न ही कभी आयेगी, किन्तु यह स्वीकार्य है कि उनमें कोई परतांत्रिक पुट अवश्य है।
देखो न, पूरे कम्पार्टमेण्ट में सन्नाटा ही सन्नाटा बिसरा पड़ा है। न कोई कुछ चीं.. कर रहा हैं और कोई कुछ पूं...। लोग नज़रे भी मिलाने से एक-दूसरे से मोहताज हैं क्योंकि कम्पार्टमेण्ट में आज़ादी तैर रही है..। चारों एक-दूसरे को पूरी स्वच्छंदता से ज़ोर-ज़ोर गालियां बक रही हैं और खिलखिला उठ रही हैं। एक कहती है कि तू साली इतनी तो बहनचो# न थी बे। तो सभी ठहाके लेतीं। फिर दूसरी बोलती कि कुतिया फलां से ठो#वा के ही इतनी बहनचो# हो गयी है गाइज़। एक ठहाका और लगता।
सिलसिला यहीं न रुका। नीरस और मानसिक ग़ुलामी वाले लोगों के झुंड से भरे कंपार्टमेण्ट में ये हमारी नयी महिला ब्रिगेड जो हमारी भावी पीढ़ी और सभ्याता की नई इबारत लिख रही हैं एक-दूसरे के होठों का पाश बना रही हैं। कंपार्टमेण्ट में ही खड़े-खड़े पूरी आज़ादी से, जिसे देख बाकी ढीठ लोग मुंह फेर लिये, जिनके दिमाग़ में ग़ुलामी का जाला लगा था। मुझे हमारे देश की इस आधी आबादी की पूरी आज़ादी देखकर गौरव की अनुभूति होती रही है। वो आन्दोलन जो भारत में नारी-उत्थान के लिए पिछले समय से चल रहा था उससे जुड़े लोगों ने बड़ी जल्दी ही इस पर विजय पा ली है। मुझे इससे जुड़े लोगों पर अभिमान है। वास्तव में सुकून मिल रहा है कि हमारे समूचे देश की नारियां इतनी सशक्त हो गयीं हैं कि यूरोप भी पार न पाए। आधी आबादी की इस पूरी आज़ादी का यह प्रमाण आंकड़ेगत हमारे गौरव का प्रतीक है।

अगला स्टेशन आ चुका है। कम्पार्टमेम्ट में ग़ुलामी का अनुभव कर रहे कुछ संकुचित और रूढ़िवादी मानसिकता के लोग अब प्लेटफॉर्म पर थे जो कुछ भुनभुनाते से सीढ़ियों की ओर बढ़ रहे हैं...। 

Thursday, 22 October 2015

रावण दहन v/s विजय दशमी...


आज का रावण दहन। तमाम आतिशबाजियों के बीच धूल-धूषित कथित रावण के झूठे विनाश के जश्न में गर्दा फांकते रामभक्त।
अधिकाधिक हानिकारक रसायनों से बने बारूद से लिपटी ध्वनि व पावन समीर को प्रदूषित करने वाले बारूद के विस्पोट से उठते धुएं के ग़ुबारों को सूंधते रामभक्त।
रावण यातना देता था। रामभक्तों को जीने नहीं देता था। उसके निरंकुश शासन में लोगों की सांसे चलती थीं लेकिन रुक-रुक कर और वो भी न जाने किस पल उखड़ जाए, ठीक आज के प्रदूषण भरे वातावरण में जीने के बरक्स।
रावण यही तो चाहता था कि लोग उसके सरोकार में घुट-घुट कर जियें।
जब वो ज़िन्दा था तब भी लोग ऐसे जीते थे...
अब वो नहीं रहा तो लोगों को अपने विनाश के जश्न में इस क़दर डुवोकर चला गया कि लोगों को भान ही न रह गया कि वो कर क्या रहे हैं।
सच में, इन रामभक्तों को हुआ क्या...???
जो चाहा..वो पाया। तो जीत भी उसी की।
रावण जीत गया है।
तय करो ये विजय की दशमी आख़िर हम किसकी मना रहे हैं...?
हम वास्तविक विजय दशमी मना सकते हैं, लेकिन वास्तविक मायनों में। ख़ुद को भारी प्रदूषण से बचाकर जो आपका किया हुआ सबको भोगना पड़ता है।
इसलिए जागो..! और जीतो...!

शुभ विजयदशमी।

Sunday, 18 October 2015

प्रयाग का सनद...


किसी इन्सान के लिए एक तरफ विजय-जश्न व तमाम चैतन्य से भरे आनन्द का उत्सव हो और दूसरी तरफ़ ग़म-ए-मातम का दिन तो कोई क्या चुनना चाहेगा। ज़ाहिर है कि वो चाहेगा कि जीवन के रंगों में उत्साह ही उत्साह भरा रहे। चूंकि इलाहाबाद के लगभग हर मुसलमान घर में दशहरे का पर्व बड़ी धूम धाम से मनाया जाता है। वे देवी विसर्जन में भी झूमते हुए जाते हैं और रात को निकलने वाली चौकियों में मुसलमान के घर पैदा हुए जाने कितने ही तमाम लड़के-लड़कियां राम-सीता, शिव-पार्वती और हनुमान के पात्र बनते हैं और हिन्दुओं के घर से उनके बच्चे मोहर्रम के मातम में शामिल होते हैं। (मेरे बड़े भाई का सगा साला भी मोहर्रम का मातम मनाता है।)
ऐसी अनूठी और गंगा-जमुनी तहजीब का शहर है इलाहाबाद। इस बार मोहर्रम और दशहरे की चौकियों का समय लगभग समान है। एस बाबत शहर के गणमान्य मुसलमानों ने ये निर्णय लिया है कि मोहर्रम में ताज़िये नहीं निकाले जायेंगे, ताकि शहर अमन से एक त्यौहार को मुकम्मल कर लिया जाए और चूंकि हर जगह पहले से दुर्गा पंडाल लग चुके हैं इसलिए मुसलमान भाईयों ने निर्णय लिया कि ताज़िये नहीं निकाले जायेंगे।
प्रयाग एक बार तुमने फिर से अपने बाशिंदों का सनद पूरे अवाम के सामने रख दिया। तुम्हे प्रणाम प्रयाग।
तुम्हे प्रणाम..।।।


हे दुर्लभ...!


सत्यधर्म पक्षधर भारत के अगुवा
सरदार सरोवर, राष्ट्र शिल्पी
रियासत-ए-हिन्द
रत्नजड़ित मणिका
हे दुर्लभ!
सरदार वल्लभ।
आनन्द औ वैभव के दाता
एकता के साक्षी

सरदार वल्लभ।

वो पतवार कहां हैं...


तहजीबें बदल गयीं
दरख़्तों की छांव बदल गयी
बदला है देखो ये कितना ग़ैरत ज़माना
हैरत है...
हम औ हमारा वतन कहां है
कहां हो!
सरदार....
जो देकर गये थे

वो पतवार कहां है?.

कहां हो सरदार...?


रत्नजड़ित मणिका हे दुर्लभ!
सरदार वल्लभ।
सरदार सरोवर में ये बहता नीर नहीं
रक़्त है तुम्हारा।
रियासत-ए-हिन्द
एकता के साथी
तुम ही हो भारत के सत्यधर्म पक्षधर
अवाम को वैभव, तहजीब और आनन्द तुम्हारी छांव से
तुम ही थे मांझी तुम ही पतवार

कहां हो सरदार...?